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Book Discussion: जीत के उपाय बताती कविताएं

infopost October 4, 2025
Book Discussion

01

Book Discussion: वीरेंद्र जी का संपूर्ण जीवन आशावादी दृष्टिकोण का साक्षी रहा है। वह प्राय: दैनिक राशिफल के बारे में कहते रहे हैं कि जो राशिफल अच्छा लिखा होता है, मैं उसी को ठीक मानता हूं। प्रतिकूल राशिफल को इग्नोर कर देता हूं। जाहिर है कि उनकी कविताओं पर इसका प्रभाव पड़ना ही था। जनता किस भाव की कविता पसंद करती है, इसे वीरेंद्र वत्स ने अच्छी तरह से चित्रित किया है। कविता के क्षेत्र में अनावश्यक प्रयोग वीरेंद्र जी को पसंद नहीं है। उनका एकमात्र लक्ष्य है जन—जन के दिल तक पहुंच बनाना। उनकी कुछ कविताएं ऐसी हैं, जिनसे लगता है कि वह परकाया प्रवेश करके कविताएं लिखते हैं। कहा जाता है कि 100 दार्शनिक सिद्धांतों को कंठस्थ करना आसान है, लेकिन एक को भी समझना कठिन। और इसी प्रकार 100 दार्शनिक सिद्धांतों को समझना आसान हो सकता है, लेकिन किसी एक पर जीवन जीना कठिन। आपने इन कविताओं को जीवन में उतारा तो कोई भी ऐसी ताकत नहीं है जो इस बात को खारिज कर सके कि तू जीत के लिए बना।

Book Discussion: हर इंसान एक ही परिवार का सदस्य

श्रीकांत सिंह


Book Discussion: कवि वीरेंद्र वत्स की कुछ प्रतिनिधि रचनाओं पर नज़र डाली तो ऐसा लगा कि उनके मानस पटल पर एक ऐसा दार्शनिक सिद्धांत काम करता है, जिसे हर किसी की फिक्र होती है। इसी सिद्धांत को संक्षेप में वसुधैव कुटुंबकम् कहा जाता है। मतलब पृथ्वी का हर इंसान एक ही परिवार का सदस्य है।

लेकिन आज के नफरती माहौल में इस सिद्धांत को समझना और उसे समझा पाना बहुत कठिन है। फिर भी मैं पूरी कोशिश करूंगा कि वीरेंद्र वत्स की आध्यात्मिक भावनाओं को यथावत आप तक पहुंचा सकूं। उन्हें समझने की जो कठिनाई आम आदमी को महसूस होती है, वही कठिनाई पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को समझने में पेश आती थी।

एकात्म मानववाद

Book Discussion: एक बार किसी ने पंडित दीनदयाल से कहा, पंडित जी आपका ये एकात्म मानववाद समझ में नहीं आता। क्या आप उसे सरल भाषा में समझा सकते हैं? पंडित जी ने कहा, दार्शनिक सिद्धांतों को उदाहरण से ही समझा जा सकता है। और मैं एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूं।

एक बार एक नौकरीपेशा व्यक्ति अपनी ड्यूटी पर जा रहा था। रास्ते में उसने देखा कि चौराहे पर भीड़ लगी हुई है। पता किया तो पता चला कि कोई एक्सीडेंट हुआ है। किसका हुआ है, यह पता नहीं चल पा रहा था। क्योंकि भीड़ बहुत ज्यादा थी। उसने सोचा, इतना ज्यादा क्या पता करना। सड़क पर दुर्घटनाएं तो होती ही रहती हैं। ज्यादा रुकूंगा तो ड्यूटी पर लेट हो जाऊंगा। इसलिए निकल लेता हूं।

फिर भी उसकी जिज्ञासा ने साथ नहीं छोड़ा। उसने तय किया कि पता ही कर लेता हूं कि कौन है दुर्घटना का शिकार। भीड़ को चीरते हुए जब वह घायल के नजदीक पहुंचा तो पाया कि दुर्घटना में घायल व्यक्ति कोई और नहीं, उसी का सगा भाई है। इस परिस्थिति में अपने भाई को लहूलुहान देख कर उसके मन में जो फिक्र, जो करुणा, जो आत्मीयता से भरा भाव पैदा हुआ अगर वही भाव किसी भी इंसान का किसी भी इंसान के प्रति पैदा हो जाए तो उस भाव को एकात्म मानववाद कहा जाता है।

Book Discussion: अब इसी भाव को देखते हैं, वीरेंद्र वत्स की कविताओं में।

उठो-उठो अब जागो-जागो
खुला द्वार पिंजरे से भागो
किसने तुमको भांग पिलाई?
समझो अपनी ताकत भाई!!

मतलब, हर इंसान के प्रति भाई का भाव। दरअसल, यह आत्मा का भाव है। पर आत्मा हमारे अंदर नहीं होती, हम आत्मा के अंदर होते हैं। ऐसा कुछ ज्ञानवान लोग मानते हैं। फिर भी कुछ लोग कह देते हैं कि अमुक व्यक्ति की आत्मा मर गई है। आखिर अजर और अमर आत्मा मर कैसे सकता है? आत्मा के मरने की बात जिस अवस्था के लिए की जाती है, उसे कहते हैं जागरूकता का अभाव। यानी स्लीप मोड। हमारा कंप्यूटर भी जब स्लीप मोड में चला जाता है तो वह तब तक काम नहीं करता जब तक कि कोई उसे झकझोर कर जगा न दे। कवि किसी को स्लीप मोड से बाहर लाने का ही काम करता है।

स्लीप मोड के पिंजरे में कैद इंसान

शायद, इसीलिए वीरेंद्र जी लिखते हैं, उठो-उठो अब जागो-जागो। जिस प्रकार स्लीप मोड में जाने के बाद कंप्यूटर अपनी सारी शक्तियां खो देता है भले ही वह खराब न हुआ हो। ठीक उसी प्रकार इंसान में जागरूकता का अभाव होता है यानी उसका अपनी आत्मा से संवाद टूट जाता है तो वह स्लीप मोड के पिंजरे में कैद हो जाता है। ऐसे में लगता ही नहीं कि इंसान जिंदा है या मुर्दा।वीरेंद्र वत्स की कविताओं में निश्चित रूप से मुर्दा को जिंदा कर देने की ताकत है। क्योंकि उनकी कविताएं तमाम दार्शनिक सिद्धांतों से लैस होती हैं। और जीत के लिए सिद्धांत यानी धर्म ही भूमि तैयार करते हैं। यतो धर्मः ततो जयः। यानी जहां धर्म है वहीं विजय है। रामायण और महाभारत की कथाएं इसी सिद्धांत को बल प्रदान करती हैं। इसलिए तू जीत के लिए बना।

जनता किस भाव की कविता पसंद करती है, इसे वीरेंद्र वत्स ने अच्छी तरह से चित्रित किया है। कविता के क्षेत्र में अनावश्यक प्रयोग वीरेंद्र जी को पसंद नहीं है। उनका एकमात्र लक्ष्य है जन—जन के दिल तक पहुंच बनाना। उनकी कुछ कविताएं ऐसी हैं, जिनसे लगता है कि वह परकाया प्रवेश करके कविताएं लिखते हैं। उदाहरण देखिए।

कविता नारा—कथा—गद्य—इतिहास नहीं है
कविता कोरा व्यंग्य हास परिहास नहीं है
कविता प्रबल प्रवाह सत्य के भाव पक्ष का
वशीभूत होता जिससे जड़ भी समक्ष का
कविता जो मन की ऋतु का परिवर्तन कर दे
कभी स्नेह कभी आग अंतर में भर दे

मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के पात्र

वीरेंद्र जी की कविताओं में मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के पात्र भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। कहा जाता है कि प्रेमचंद समाज के दबे कुचले लोगों के बीच अपनी विषयवस्तु तलाशते थे। तभी उनकी कहानियां सहज और स्वाभाविक लगती थीं। यही होमवर्क आपको कविता के इस अंश में नजर आएगा।

महंगू—सहतू चोथू—मोथू दयानंद—गिरधारी
व्यर्थ अश्रु की धार, करो अब आगे की तैयारी

आशावादी दृष्टिकोण

वीरेंद्र जी का संपूर्ण जीवन आशावादी दृष्टिकोण का साक्षी रहा है। वह प्राय: दैनिक राशिफल के बारे में कहते रहे हैं कि जो राशिफल अच्छा लिखा होता है, मैं उसी को ठीक मानता हूं। प्रतिकूल राशिफल को इग्नोर कर देता हूं। जाहिर है कि उनकी कविताओं पर इसका प्रभाव पड़ना ही था। उनकी कविता का एक अंश देखिए।

अंत नहीं यह, इसी जगह से नई राह खुलती है
बड़े लक्ष्य की ओर वही आगे चल कर मुड़ती है

वियोगी होगा पहला कवि। आह से उपजा होगा गान। यानी जिस कवि ने पर पीड़ा को महसूस नहीं किया और उसे अपनी कविताओं में व्यक्त नहीं किया, उसके काव्य लेखन का कोई समष्टिगत मतलब नहीं होता है। लेकिन वीरेंद्र जी ने जन—जन की पीड़ा को महसूस किया है और उसे सटीक रूप से व्यक्त भी किया है। एक उदाहरण देखिए।

मैं जन की पीड़ा का गायक
जन का सेवक जन का नायक
पथ के कंटक देख अभी से
इतना क्यों अकुलाया
मुझे टूटना भाया

देश द्रोहियों की छाती पर चढ़ो तुम्हारी जय हो

तू जीत के लिए बना कविता संग्रह में जगह जगह मानसिक कारागार और बंधन तोड़ने का आग्रह है। जब तक मनुष्य अपने ही बनाए कारागार से मुक्त नहीं होता, तब तक वह खुले आसमान में उड़ान भरने की क्षमता हासिल नहीं कर सकता। इसीलिए लिखा है—

भ्रम की कारा तोड़ आन पर बढ़ो तुम्हारी जय हो
देश द्रोहियों की छाती पर चढ़ो तुम्हारी जय हो

समाज का कटु यथार्थ भी कविताओं का विषय बना है। ऐसा यथार्थ जो समाचारों के जरिये आए दिन हमारे सामने से गुजरता है। एक ऐसी कविता है जो सामाजिक पागलपन पर तंज कसती है। उदाहरण देखिए।

उन्हें है धर्म से मतलब, उन्हें है जाति की चिंता
दरकती डालियां हैं और हम हैं
कहीं डाका, कहीं दंगा, कहीं आतंक का साया
लहू की नालियां हैं और हम हैं

चुनावी हथकंडों पर तंज

चुनावी हथकंडों पर भी खूब तंज कसा है वीरेंद्र जी ने। एक कविता में वह मतदाताओं की आंख खोलते नजर आते हैं।

वही गरीब बनाते हैं आम लोगों को
वही नसीब के मारों की बात करते हैं
वतन का क्या है, इसे टूटने—बिखरने दो
वो बुतकदों की, मजारों की बात करते हैं

वीरेंद्र जी की हर कविता आपको नई प्रेरणा देती है। पूरा कविता संग्रह उनकी शानदार कविताओं का जीवंत दस्तावेज है। इसे साहित्य जगत में एक मील का पत्थर भी कहा जा सकता है। इसमें आपको उम्मीद से कुछ ज्यादा ही मिलेगा। उन कविताओं की कोई आलोचना नहीं की जा सकती जो जन भावनाओं का दरिया पार करके आपके सामने आ रही हो। इस कविता संग्रह में ऐसी ही कविताएं हैं।

Book Discussion: कुल 94 पृष्ठ की इस पुस्तक में लगभग 62 कविताएं हैं। हर कविता किसी न किसी दार्शनिक सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करती है। कहा जाता है कि 100 दार्शनिक सिद्धांतों को कंठस्थ करना आसान है, लेकिन एक को भी समझना कठिन। और इसी प्रकार 100 दार्शनिक सिद्धांतों को समझना आसान हो सकता है, लेकिन किसी एक पर जीवन जीना कठिन। आपने इन कविताओं को जीवन में उतारा तो कोई भी ऐसी ताकत नहीं है जो इस बात को खारिज कर सके कि तू जीत के लिए बना।

पुस्तक: प्रतिनिधि रचनाएं तू जीत के लिए बना
रचनाकार: वीरेंद्र वत्स
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, 4695, 21—ए, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य: 295 रुपये

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