Skip to content
Primary Menu
  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल
Logo300

INFOPOST NEWS

The power of information

September 7, 2026

Connect with Us

  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल

Categories

  • INFOPOST PDF
  • sports
  • Uncategorized
  • अंतरराष्ट्रीय
  • आलेख
  • कारोबार
  • ख़ास ख़बर
  • तकनीक
  • दिल्ली एनसीआर
  • बोलती तस्वीरें
  • मनोरंजन
  • राज्यों से …
  • राष्ट्रीय
  • शिक्षा
  • सत्ता की सियासत
  • संस्कार
  • साहित्य
  • स्वास्थ्य
An error has occurred, which probably means the feed is down. Try again later.

  • आलेख
  • ख़ास ख़बर

जब राजग की हार हुई और यूपीए की सरकार बनी

August 22, 2020
A2

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

हमने गुजरात-कांड पर ‘गुजरात के सबक’, 2002) और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विचारधारा और शैली पर ‘जानिए योग्य प्रधानमंत्री को’, 2002) पुस्तिकाएं प्रकाशित की थीं। संकलित अभी लेख अखबारों में छापर हुए थे। सेकुलर साथियों, जिनमें सोनिया के सेकुलर सिपाही भी शामिल थे, ने काफी उत्साह से उन पुस्तिकाओं का स्वागत और प्रचार किया था।

पहुंच वाले साथियों ने उन्हें कांग्रेस के प्रचार-प्रकोष्ठ और प्रवक्ताओं तक पहुंचाया था। 2004 में राजग की हार हुई और यूपीए की सरकार बनी। लेकिन 2009 के चुनाव के पहले प्रकाशित हमारी पुस्तिका ‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ के प्रकाशन पर उन सब ने चुप्पी साध ली। उसमें मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की, विशेष तौर पर भारत-अमेरिका परमाणु करार के हवाले से, साम्राज्यवादपरस्ती का उद्घाटन है।

साथियों ने उस पुस्तिका का न स्वागत किया, न प्रचार। इससे स्पष्ट पता चलता है कि सेकुलर खेमे की चिंता केवल सांप्रदायिकता को लेकर है, नवउदारवाद के खिलाफ वह नहीं है। जबकि सांप्रदायिकता की आड़ में नवउदारवाद फलता-फूलता है।

भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसक संघर्ष चलाने वाले अतिवामपंथी समूह कहते हैं कि वे भारत के संविधान को नहीं मानते। उन्हें देखना चाहिए कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत का शासक-वर्ग भी भारत के संविधान को नहीं मानता है।

यह ठीक है कि भारत का शासक-वर्ग कारपोरेट पूंजीवाद की पुरोधा वैश्विक संस्थाओं के आदेश पर काम करता है। लेकिन अपने को माओवादी बताने वाले भी जिन आदेशों को मानते और लागू करना चाहते हैं, वे भारत की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की धारा से नहीं निकले हैं; जिसका कुछ आधार लेकर भारत का संविधान बनाया गया था।

बल्कि आजादी के संघर्ष को वे मान्यता ही नहीं देते। उनकी पूर्वज पार्टी सीपीआई ने देश की आजादी को अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का परिणाम माना था, न कि जनता के संघर्ष और बलिदान का। आजादी की पूर्व-संध्या पर उसने भारत छोड़ो आंदोलन और उसके क्रांतिकारियों के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन किया था।

आजादी अधूरी है, यह अंबेडकर ने भी स्वीकार किया था। लेकिन उनके स्वीकार में अवमानना का भाव नहीं था। उनका संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर उसे पूर्ण करने का सपना था। कांग्रेस के भरोसे वे भी नहीं थे।

समता का लक्ष्य हासिल करने का रास्ता लोकतंत्र को मानते थे। लोकतांत्रिक अहिंसक संघर्ष में अंत तक उनकी आस्था रही। इसका अर्थ यह भी बनता है कि आजादी के बाद, गांधी की तरह, अंबेडकर भी कांग्रेस की उपयोगिता नहीं देखते थे। उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और सोशलिस्ट पार्टी के साथ चुनाव लड़ा। भविष्य की राजनीति के लिए सोशलिस्ट पार्टी के साथ तालमेल का प्रयास भी उनके दिवंगत होने के पहले हुआ।

लेकिन कम्युनिस्टों ने अधूरी आजादी का ठीकरा कांग्रेस और उसके नेताओं के सिर फोड़ा। अधूरी आजादी से भी ज्यादा उनकी बड़ी शिकायत यह है कि साम्यवादी क्रांति क्यों नहीं की गई; उनकी नजर में भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और उनके साथ जुटने वाली जनता का यह दोष था। आजादी के अधूरेपन में उन्होंने न अपना कोई साझा या दायित्व स्वीकार किया, और, जाहिर है, न उसे पूरा करने के लिए संविधान का रास्ता स्वीकार किया।

कम्युनिस्टों की अंतर्राष्ट्रीयता में ‘पिछड़े, दकियानूसी, सामंती, सांप्रदायिक, जातिवादी भारत’ को छोड़ कर सब कुछ हो सकता था। आज के आधिकारिक मार्क्संवादियों के लिए भी संविधान और संसदीय लोकतंत्र मजबूरी का सौदा है।

About Author

See author's posts

Post navigation

Previous: शानदार Nokia 5.3 स्मार्टफोन की कीमत और फीचर्स
Next: जानें ऋषि पंचमी और सप्त ऋषि पूजन व्रत के बारे में

Related Stories

Social Politics
  • ख़ास ख़बर
  • दिल्ली एनसीआर

Social Politics: नोएडा के युवा नेताओं में तेजी से उभरता नाम संदीप अवाना

infopost September 5, 2026 0
Ram Mandir Trust Controversy
  • ख़ास ख़बर
  • राष्ट्रीय

Ram Mandir Trust Controversy: राम मंदिर ट्रस्ट पर उठे सवाल

infopost June 27, 2026
Narendra Modi IVLP Program
  • ख़ास ख़बर
  • राष्ट्रीय

Narendra Modi IVLP Program: क्या 1993 का अमेरिकी कार्यक्रम आज भी खड़ा करता है सवाल?

infopost June 27, 2026

Copyright © All rights reserved. | MoreNews by AF themes.