SIR Voter Roll: चुनाव आयोग के Special Intensive Revision (SIR) के तीसरे चरण की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों ने राजनीतिक और संवैधानिक बहस को तेज कर दिया है। तीसरे चरण में शामिल 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट सूची में 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में मतदाताओं की संख्या में करीब 15.7 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जिससे विवाद पैदा हुआ है।
SIR Voter Roll: अशोक लवासा ने निष्पक्षता पर सवाल उठाया
SIR Voter Roll: ड्राफ्ट आंकड़ों के अनुसार इन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या 2024 के लगभग 35.50 करोड़ से घटकर करीब 29.93 करोड़ रह गई है। तीसरे चरण के ड्राफ्ट आंकड़ों में कुल मिलाकर करीब 6.15 करोड़ नाम पिछली सूची की तुलना में ड्राफ्ट रोल में नहीं हैं।
- लगभग 1.11 करोड़ मतदाताओं को “मृत” श्रेणी में डाला गया है।
- करीब 4.52 करोड़ नाम अनुपस्थित, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत या अन्य संबंधित श्रेणियों में रखे गए हैं।
- लगभग 3 लाख नाम अन्य कारणों से हटाए जाने की जानकारी सामने आई है।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भिन्नता
आंकड़ों में राज्यों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। महाराष्ट्र में करीब 1.59 करोड़ मतदाताओं की कमी दर्ज की गई, जो लगभग 17.08 प्रतिशत है। वहीं दिल्ली में मतदाता संख्या में करीब 35.89 प्रतिशत और चंडीगढ़ में करीब 31.84 प्रतिशत की गिरावट बताई गई है।
ड्राफ्ट सूची में इस बड़े बदलाव पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की टिप्पणियों ने बहस को और तीखा कर दिया है। वीडियो में उद्धृत टिप्पणियों के अनुसार एसवाई कुरैशी ने मतदाता सूची में इतने बड़े बदलाव पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि करीब 15 प्रतिशत आबादी के नाम किसी कृत्रिम प्रक्रिया के जरिए हटना लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। उन्होंने मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर दिया है।
3 सितंबर को आयोजित जगदीप छोकर मेमोरियल लेक्चर में अशोक लवासा ने कहा कि SIR कानूनी हो सकता है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह निष्पक्ष भी है। लवासा ने यह तर्क भी रखा कि किसी प्रक्रिया का कानूनी होना अपने आप में उसे न्यायसंगत या निष्पक्ष साबित नहीं करता और संवैधानिक व वैधानिक संस्थाओं को कानून के अक्षर के साथ उसकी भावना का भी ध्यान रखना चाहिए।
प्रक्रिया और आगे का महत्व
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची से नाम का हटना अंतिम रूप से मताधिकार समाप्त होना नहीं है। जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उन्हें दावा या आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया जाता है और अंतिम मतदाता सूची जांच और सुनवाई के बाद प्रकाशित की जाएगी।
क्योंकि अंतिम सूची जांच के बाद ही प्रकाशित होगी, मौजूदा आंकड़ों का अंतिम अर्थ तभी स्पष्ट होगा जब यह पता चले कि कितने वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे थे और कितने नाम जांच के बाद वापस जोड़े जाते हैं।
SIR की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और अपील की प्रभावी व्यवस्था के साथ लागू की गई है। यही SIR की सफलता की कसौटी होगी कि कोई भी पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रहे और मृत, डुप्लीकेट या अपात्र नाम मतदाता सूची में न रहें।


