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Operation Delimitation: मोदी का ‘ऑपरेशन डीलिमिटेशन’

Shrikant Singh June 12, 2026
Operation Delimitation

Desk LogoOperation Delimitation: क्या विपक्षी दलों में हो रही टूट-फूट और सांसदों के दल बदलने के पीछे परिसीमन (Delimitation) की बड़ी राजनीतिक रणनीति है? जानिए इस मुद्दे का विस्तृत राजनीतिक विश्लेषण।

Operation Delimitation: विपक्षी दलों में टूट-फूट के पीछे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य

Operation Delimitation: भारत की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान विपक्षी दलों में लगातार हो रही टूट-फूट और नेताओं के दल बदलने की घटनाओं ने राजनीतिक विश्लेषकों के बीच नई बहस को जन्म दिया है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि यह केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे भविष्य की राजनीति को प्रभावित करने वाली एक बड़ी योजना भी हो सकती है। इसी संदर्भ में कुछ राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों ने एक ऐसी संभावना पर चर्चा की है जिसे वे “ऑपरेशन डीलिमिटेशन” का नाम दे रहे हैं।

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केंद्र की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का लक्ष्य केवल वर्तमान चुनावी सफलताओं को बनाए रखना नहीं है, बल्कि भविष्य में भी अपनी राजनीतिक बढ़त को स्थायी रूप से मजबूत करना है। इसके लिए संसद में अधिकतम राजनीतिक समर्थन और व्यापक बहुमत हासिल करने की रणनीति अपनाई जा रही है।

परिसीमन क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

Operation Delimitation: परिसीमन (Delimitation) वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। भारत में आखिरी बार व्यापक परिसीमन 2008 में लागू हुआ था। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार 2026 के बाद परिसीमन की प्रक्रिया फिर शुरू हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी परिसीमन देश की राजनीतिक संरचना में बड़े बदलाव ला सकता है। जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने पर कुछ राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है, जबकि कुछ राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है। यही कारण है कि परिसीमन का मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि अत्यंत राजनीतिक महत्व का विषय बन गया है।

विपक्षी दलों में टूट-फूट पर उठ रहे सवाल

पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े क्षेत्रीय दलों को आंतरिक विभाजन का सामना करना पड़ा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं का दल छोड़ना, महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में हुई टूट राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि इन घटनाओं ने भाजपा की राजनीतिक स्थिति को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत किया है। हालांकि भाजपा लगातार यह कहती रही है कि विपक्षी दलों की आंतरिक समस्याओं और नेतृत्व संकट के कारण उनके नेता पार्टी छोड़ रहे हैं।

दूसरी ओर विपक्षी दल आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक दबाव का उपयोग करके उनके नेताओं को कमजोर किया जा रहा है। इन आरोपों को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार बना हुआ है।

क्या संसद में दो-तिहाई बहुमत है लक्ष्य?

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि भाजपा का दीर्घकालिक उद्देश्य संसद में ऐसा बहुमत हासिल करना हो सकता है जिससे बड़े संवैधानिक और संस्थागत बदलावों को आसानी से लागू किया जा सके।

भारतीय संविधान में कई महत्वपूर्ण संशोधनों के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यदि किसी सरकार के पास पर्याप्त राजनीतिक समर्थन हो, तो वह बड़े संरचनात्मक सुधारों को आगे बढ़ाने की बेहतर स्थिति में होती है।

इसी संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है कि विपक्षी दलों के सांसदों और नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिशें केवल चुनावी लाभ तक सीमित नहीं हो सकतीं, बल्कि उनका संबंध भविष्य की व्यापक राजनीतिक योजनाओं से भी हो सकता है। हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई आधिकारिक दस्तावेज या सरकारी घोषणा उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे अभी राजनीतिक विश्लेषण और अटकलों के दायरे में ही देखा जाता है।

2029 की राजनीति पर असर

राजनीतिक विशेषज्ञों के बीच यह भी चर्चा है कि यदि भाजपा आने वाले वर्षों में अपने राजनीतिक प्रभाव का विस्तार जारी रखती है और विपक्षी दलों की एकजुटता कमजोर बनी रहती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव विपक्ष के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

भारत की राजनीति में लंबे समय तक एक-दलीय प्रभुत्व के उदाहरण पहले भी मौजूद रहे हैं। कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई थी। वर्तमान समय में भाजपा उसी तरह के दीर्घकालिक राजनीतिक प्रभुत्व की दिशा में बढ़ रही है या नहीं, यह भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी संगठनात्मक क्षमता को मजबूत करने, साझा रणनीति बनाने और मतदाताओं के बीच विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करने की मानी जा रही है।

विपक्ष की चिंता और भाजपा का पक्ष

विपक्षी दलों का कहना है कि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्तारूढ़ दल की। उनका तर्क है कि यदि क्षेत्रीय दल लगातार कमजोर होते गए, तो लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

वहीं भाजपा और उसके समर्थकों का कहना है कि जनता का समर्थन ही किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक ताकत होता है। उनके अनुसार यदि विपक्षी नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं तो इसका कारण भाजपा की नीतियों और नेतृत्व पर उनका भरोसा है, न कि कोई विशेष राजनीतिक अभियान।

निष्कर्ष

Operation Delimitation: “ऑपरेशन डीलिमिटेशन” फिलहाल एक राजनीतिक विश्लेषण और बहस का विषय है, न कि कोई आधिकारिक सरकारी कार्यक्रम। फिर भी यह चर्चा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की भविष्य की राजनीतिक दिशा, संसद की संरचना और विपक्ष की भूमिका जैसे बड़े सवालों से जुड़ी हुई है।

आने वाले वर्षों में परिसीमन की प्रक्रिया, संसद की संभावित संरचना और राजनीतिक दलों की रणनीतियां भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम वास्तव में किसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं या फिर यह केवल बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम है।

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