Skip to content
Primary Menu
  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल
Logo300

INFOPOST NEWS

The power of information

July 17, 2026

Connect with Us

  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल

Categories

  • INFOPOST PDF
  • sports
  • Uncategorized
  • अंतरराष्ट्रीय
  • आलेख
  • कारोबार
  • ख़ास ख़बर
  • तकनीक
  • दिल्ली एनसीआर
  • बोलती तस्वीरें
  • मनोरंजन
  • राज्यों से …
  • राष्ट्रीय
  • शिक्षा
  • सत्ता की सियासत
  • संस्कार
  • साहित्य
  • स्वास्थ्य
An error has occurred, which probably means the feed is down. Try again later.

  • आलेख

Effects of laws: नए किसान कानूनों के दुष्प्रभाव का एक और मामला

August 29, 2021
Effects of laws

Effects of laws: देश का किसान भले ही नए किसान कानूनों को वापस कराने के लिए नौ महीने से सड़कों पर है पर देश का एक बड़ा तबका किसानों को ही गलत साबित करने में लगा है।

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

Effects of laws: हिमाचल में अडानी ने 16 रुपये घटा दिए सेब के रेट

चरण सिंह राजपूत

नई दिल्ली। Effects of laws: देश के एक बड़े तबके को लगता है कि मोदी सरकार ने नए किसान कानून किसानों के भले के लिए बनाए हैं। इन कानूनों की आड़ में जब पूंजीपतियों के किसानों की खेती कब्जाने की बात की जाती है तो यह तबका अडानी और अंबानी जैसे पूंजीपतियों का पैरोकार बना नजर आता है।

वैसे तो खेती में निजी कंपनियों के हस्तक्षेप से किसानों के साथ ठगी के कई मामले सामने आए हैं पर नया मामला हिमाचल प्रदेश का है। जिसमें अडानी ग्रुप की कंपनी ने सेब के रेट पिछले साल से 16 रुपये कम तय किए हैं।

दरअसल, अडानी एग्री फ्रेश कंपनी ने अस्सी से 100 फीसदी रंग वाला एक्स्ट्रा लार्ज सेब 52 रुपये प्रति किलो और लार्ज, मीडियम और स्मॉल सेब 72 रुपये प्रति किलो की दर पर खरीदने की घोषणा की है। जबकि पिछले साल एक्स्ट्रा लार्ज सेब 68, लार्ज, मीडियम और स्मॉल सेब 88 रुपये प्रति किलो तय किया गया था।

बागवानों में नाराजगी

Effects of laws: अडानी की कंपनी के रेट कम कम तय करने से हिमाचल प्रदेश के बागवानों में नाराजगी देखी जा रही है। इस बार 60 से 80 फीसदी रंग वाला एक्स्ट्रा लार्ज सेब 37 रुपये किलो और लार्ज, मीडियम व स्मॉल आकार का सेब 57 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा जा रहा है।

मतलब, 60 फीसद से कम रंग वाले सेब की खरीद 15 रुपये प्रति किलो की कीमत तय की गई है। जबकि पिछले साल ऐसा सेब 20 रुपये किलो खरीदा गया था। इतना ही नहीं, अडानी एग्री फ्रेश के लिए बागवानों को अपना सेब क्रेटों में अडानी के कलेक्शन सेंटर तक लाना होगा।

यहां तक लाने का खर्च अलग से। कंपनी ने ये रेट 29 अगस्त तक के लिए जारी किए हैं। 29 अगस्त के बाद हो सकता है कि रेट और भी कम कर दिए जाएं। हिमाचल में अडानी ग्रुप ने ठियोग के सैंज, रोहड़ू के मेहंदली और रामपुर के बिथल में कलेक्शन सेंटर बनाया है।

तभी तो हो रहा है नए कृषि कानूनों का विरोध

अडानी एग्री फ्रेश के टर्मिनल मैनेजर पंकज मिश्रा ने इन रेटों को सही बताया है। इस मामले में कृषि मामलों के विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का कहना है, इसी वजह से किसान नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। इसलिए एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाए जाने की बात कही जा रही है।

यही सब कारण हैं कि कृषि बिल को लेकर किसानों का सरकार के साथ गतिरोध बरकरार है। किसान और सरकार अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। केंद्र सरकार एक देश एक मंडी बनाने पर जोर दे रही है तो किसान हर कीमत पर कानूनों को वापस कराने पर अड़े हैं।

सरकार का कहना है कि किसान इस कानून के जरिये अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे। निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे। दूसरी ओर किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार किसी विशेष वर्ग उद्योगपतियों के लिए व्यापार का सरलीकरण कर रही है। जिससे कि उन्हें इसका लाभ मिल सके।

एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांधा

केंद्र ने नए कानून के जरिये एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है। एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी के स्वामित्व वाले अनाज बाजार (मंडियों) को उन बिलों में शामिल नहीं किया गया है। इसके जरिये बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गई है।

ये खरीदार बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आए किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं। सरकार ने आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक पास किया है। इस विधेयक के बाद यह कानून अनाज, दालों, आलू, प्याज और खाद्य तिलहन जैसे खाद्य पदार्थों के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण को विनियमित करता है।

यानी, इस तरह के खाद्य पदार्थ आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर करने का प्रावधान है। इसके बाद युद्ध व प्राकृतिक आपदा जैसी आपात स्थितियों को छोड़कर भंडारण की कोई सीमा नहीं रह जाएगी। किसानों का कहना है कि इससे जमाखोरी बढ़ जाएगी। मतलब कितना भी जमा करो कोई नहीं पूछेगा। जब मर्जी हो तब बाजार में निकालो। ऐसे में कालाबाजारी बढ़ेगी।

संबिदा खेती पर भी नया कानून

सरकार ने कांट्रेक्ट फार्मिंग यानि कि संबिदा खेती को लेकर भी नया कानून बनाया है। इस कानून का उद्देश्य अनुबंध खेती यानी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की इजाजत देना है। इसके तहत किसान की जमीन को एक निश्चित राशि पर एक पूंजीपति या ठेकेदार किराये पर लेगा। और अपने हिसाब से फसल का उत्पादन कर बाजार में बेचेगा।

दूसरी ओर किसानों का कहना है कि परंपरागत खेती की जगह संबिदा खेती का मतलब बड़ी कंपनियों का सीधा हस्तक्षेप। और ये ही कंपनियां खेती का फायदा उठाएंगी। किसानों का कहना है कि ये ही कंपनियां उन्हें बताएंगी कि उन्हें क्या बोना है।

ये कंपनियां अपनी शर्तों पर फसल खरीदेंगी। इस कानून में किसान को कोर्ट जाने का भी अधिकार नहीं है। कानून के तहत कंपनी द्वारा संविदा की शर्तो का उल्लंघन किए जाने पर किसान अपनी शिकायत न्यायालय में दर्ज नहीं करा सकता है। हां, एसडीएम के यहां शिकायत जरूर दर्ज करा सकता है।

पूंजीपतियों के सामने कैसे टिकेगा एसडीएम

ऐसे में प्रश्न उठता है कि अडानी और अंबानी जैसे पूंजीपतियों के सामने एक एसडीएम की क्या हिम्मत कि वह किसान के पक्ष में बोल जाए। आंदोलित किसानों का कहना है कि ये कानून किसान विरोधी हैं। कृषि के निजीकरण को प्रोत्साहन देने वाले हैं। इनसे किसानों को नहीं, बल्कि होर्डर्स और बड़े कॉरपोरेट घरानों को ही फायदा होगा।

किसानों की मांग है कि एक विधेयक के जरिये किसानों को लिखित में आश्वासन दिया जाए कि एमएसपी और कन्वेंशनल फूड ग्रेन खरीद सिस्टम खत्म नहीं होगा। एमएसपी खरीद पर कानून लाया जाए। किसान संगठन कृषि कानूनों के अलावा बिजली बिल 2020 को लेकर भी विरोध कर रहे हैं।

बिजली (संशोधित) बिल 2020

Effects of laws: केंद्र सरकार के बिजली कानून 2003 की जगह लाए गए बिजली (संशोधित) बिल 2020 का विरोध किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस बिल के जरिये बिजली वितरण प्रणाली का निजीकरण किया जा रहा है। इस बिल से किसानों को सब्सिडी पर या फ्री बिजली सप्लाई की सुविधा खत्म हो जाएगी।

किसानों की एक मांग एक प्रावधान को लेकर है, जिसके तहत खेती का अवशेष जलाने पर किसान को 5 साल की जेल और 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। पंजाब में पराली जलाने के चार्ज लगाकर गिरफ्तार किए गए किसानों को छोड़े जाने की भी मांग किसान कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रदेश के पराली जलाने संबंधी मुकदमे वापस ले लिए हैं।

About Author

See author's posts

Post navigation

Previous: Third Wave: क्या ये है तीसरी लहर का संकेत ?
Next: Janmashtami Festival: जन्माष्टमी महोत्सव पर सजा श्री सनातन धर्म मंदिर

Related Stories

Sheroes Hangout
  • आलेख
  • ख़ास ख़बर

Sheroes Hangout: शीरोज कैफे और छाँव फाउंडेशन की कहानी

infopost June 30, 2026 0
Socio-economic landscape
  • आलेख
  • ख़ास ख़बर

Socio-economic landscape: कैसे बदला भारत 2014 से 2026 तक

infopost June 20, 2026 0
Digital Colonialism
  • आलेख
  • ख़ास ख़बर

Digital Colonialism: मुफ्त एआई का जाल या तकनीकी क्रांति?

infopost June 19, 2026

Copyright © All rights reserved. | MoreNews by AF themes.