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Bangladesh1: मोदी के सत्ता में आते ही हिंदुओं पर तेज हो गए थे हमले

infopost August 18, 2024
Bangladesh1

Bangladesh1: खालिदा जिया क्या शेख हसीना से बेहतर थीं? शेख हसीना ने क्या बांग्लादेश के हितों से कोई समझौता किया? शेख हसीना के लिए क्या देश से बड़ी दोस्ती हो गई थी? कुल ​मिला कर शेख हसीना सारी हदें पार कर चुकी थीं। क्योंकि आज जो वहां हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा हमले शेख हसीना के दौर में हो रहे थे। गौरतलब यह है कि 2014 में जब मोदी जी पहली बार सत्ता में आए, तो उसी समय से हिंदुओं पर हमले काफी तेज हो गए थे।

Bangladesh1: आज क्यों आई हिंदुओं की याद?

इंफोपोस्ट डेस्क

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Bangladesh1: आज शेख हसीना नहीं हैं तो हिंदुओं की जान की परवाह यहां वालों को भी होने लगी है। क्योंकि अब यह बताने की कोशिश की जा रही है कि बांग्लादेश में हिंदू असुरक्षित हो गए हैं। लेकिन बांग्लादेश के वर्तमान राष्ट्रपति हिंदुओं के इलाकों में जा रहे हैं और लोगों को भरोसा दिला रहे हैं कि हिंदू बांग्लादेश में सुरक्षित हैं। उन पर हमले नहीं होने पाएंगे। उधर, कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी ने उम्मीद जताई है कि बांग्लादेश में हालात शीघ्र ही सामान्य हो जाएंगे।

राष्ट्रपति बनने से पहले ही उन्होंने ऐलान कर दिया था, हिंदुओं पर हमले बंद न हुए तो मैं सब कुछ छोड़ दूंगा। फिर भी विडंबना यह है कि हिंदुओं के रक्षक की छवि शेख हसीना की बनी हुई है। शेख हसीना के भारत आते ही भारत सरकार ने एक प्रतिबंध हटा लिया। प्रतिबंध यह था कि गौतम अडानी की कंपनी को अपने शतप्रतिशत उत्पाद बांग्लादेश को बेचने हैं। लेकिन अब अडानी अपना उत्पाद खासतौर पर बिजली भारत को बेच सकेंगे।

अडानी के लिए खेल कर रही थीं शेख हसीना

Bangladesh1: द वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश में आवश्यकता से 40 प्रतिशत ज्यादा बिजली उत्पादन की क्षमता है। इसलिए बांग्लादेश को बिजली की कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन शेख हसीना ने पांच गुना ज्यादा दाम पर बिजली का आयात किया। फर्ज कीजिए कि बांग्लादेश में यदि बिजली का दाम एक रुपये प्रति यूनिट था तो शेख हसीना अडानी से पांच रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीद रही थीं। इसके अलावा 45 करोड़ डालर कैपेसिटी और मेंटीनेंस चार्ज के रूप में अडानी को हर साल बांग्लादेश से मिलने थे।

यह भी शर्त थी कि प्लांट बिजली बनाए या न बनाए। बांग्लादेश बिजली ले या न ले, बांग्लादेश को हर साल 45 करोड़ डालर अडानी को अदा करने ही थे। और बांग्लादेश जिसकी आर्थिक हालत खराब है। जिसे अमेरिका निगल जाना चाहता है। उस देश ने अडानी से इतना महंगा सौदा किया। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि अडानी साहब किस हद तक गिर कर पैसे बनाते हैं। यह समझौता मोदी जी ने 2015 में करवाया था। उसी समय भारत की बहुत सारी जमीन बांग्लादेश को दे दी गई थी।

कैसे मुनाफाखोरी का खेल खेलते थे गौतम अडानी?

यह बात जगजाहिर है कि अडानी जी महंगा से महंगा कोयला खरीद कर अपनी ही कंपनियों को महंगे दामों पर बेच देते थे। और इस बढ़े हुए दाम पर कोयला दोबारा खुद खरीद लेते थे। और इसी महंगे कोयले से बिजली बनाते थे और बिजली की लागत आसमान छूने लगती थी। अडानी जी इसी महंगी बिजली को जबरन बेचते थे।

यह तो रही मुनाफाखोरी की बात। अडानी साहब ने भारत के पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। जिस दौर में ग्रीन एनर्जी की बात चल रही है, उसी दौर में अडानी जी कोयला आधारित प्लांट बढ़ाने में लगे हैं। क्योंकि इससे उन्हें मोटा मुनाफा हो रहा है। यही नहीं, कोयले के समर्थन में अडानी साहब विवादित बयान भी दे चुके हैं।

शेख हसीना ने पहले ही कर लिया था पनाह का जुगाड़

इस प्रकार बांग्लादेश पर भयानक आर्थिक बोझ डाला जा रहा था। क्योंकि शेख हसीना मैडम राजनीतिक दोस्ती निभाने में लगी थीं। यह सब शायद इस बात को ध्यान में रख कर किया जा रहा था कि समय आने पर शेख हसीना को भागने की स्थिति में कहीं पनाह मिल सके। और वह पनाह मिली भी। अब शेख हसीना ने एक लाला की झोली भरने के लिए अपने देश से गद्दारी क्यों की? इसके पीछे कोई न कोई मजबूरी जरूर रही होगी।

इस डील के कारण भारत में भी क्रोनी कैपिटलिज्म के तमाम आरोप लगे और सवाल भी उठाए गए। दरअसल, कैपिटलिज्म में पूंजीपतियों को तमाम छूट दी जाती है। लेकिन क्रोनी कैपिटलिज्म में कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों को छूट दी जाती है। इसी प्रकार कभी ब्राजील में एक बनाना लॉबी संपूर्ण व्यवस्था पर कंट्रोल रखती थी। इसीलिए उसे बनाना रिपब्लिक भी कहा गया। कोयले के प्रदूषण की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की छवि भी खराब हुई।

बांग्लादेश से भारत शिफ्ट कर दी गई अडानी की मुनाफाखोरी

Bangladesh1: बांग्लादेश पर दबाव बना कर अडानी के लिए मुनाफाखोरी का जो दरवाजा खोला गया था, उसके बंद होने की आशंका से हमारी सरकार ने तुरंत नियम बना दिया कि अडानी अब भारत में भी बिजली बेच सकते हैं। यह सब उस देश में हो रहा है, जहां अमृतकाल चल रहा है। मुमकिन है योजना चलाई जा रही है।

शेख हसीना को बांग्लादेश से भागना पड़ा तो उसके पीछे एकमात्र आरक्षण ही कारण नहीं है। लंबे समय तक सरकार में रहने के कारण सत्ता का नशा उनके सिर चढ़ कर बोल रहा था। कमोबेश यही हालात भारत में भी पैदा हो रहे हैं। अडानी के घोटालों पर जेपीसी से जांच कराने की मांग पर सरकार मौन है। यह मौन क्या गुल खिलाएगा, यह तो समय ही बता पाएगा।

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