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Yogi Adityanath: योगी की कुर्सी सेफ, मिली पावर की संजीवनी

infopost July 18, 2024
Yogi Adityanath

Yogi Adityanath: जो लोग उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पसंद करते हैं, उनके लिए अच्छी खबर है। सीएम योगी एक बार फिर सेफ हो गए हैं। और अमित शाह को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। यही नहीं, योगी जी की पावर भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

Yogi Adityanath: केशव मौर्या नाम का पासा एक बार फिर फेल

इंफोपोस्ट डेस्क


Yogi Adityanath: उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पिछले दिनों दिल्ली दरबार में जमे हुए थे। उन्हें उम्मीद थी कि इस बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटा कर उन्हें अवश्य मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। लेकिन उनके अरमानों पर पानी फिर गया है। क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि योगी को छेड़ना भाजपा के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। और इसलिए योगी आदित्यनाथ अधिक पावर के साथ फिलहाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहेंगे।

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, एक नया फार्मूला तैयार किया गया है। इस फार्मूले से केशव मौर्या मान भी गए हैं। जिसकी विस्तार से चर्चा हम आगे करेंगे। यहां यह समझना जरूरी है कि ऐसी कौन सी मजबूरी है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व योगी पर हाथ नहीं डाल पा रहा है। और वह कौन सी मजबूरी है कि योगी को हटाना भाजपा के लिए जरूरी होता जा रहा है।

पोलिटिकल डायनमिज्म क्या है?

Yogi Adityanath:  उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए पहले पोलिटिकल डायनमिज्म को समझना होगा। सरल भाषा में कहें तो राजनीति परिवर्तनशील होती है और उसके डायनमिक्स चेंज होते रहते हैं। जैसे कि दिल्ली एक जमाने में पंजाबी बहुल क्षेत्र हुआ करती थी। और उस समय पंजाबी वोटों का बहुत महत्व होता था। उस दौर में वीके मल्होत्रा, एचकेएल भगत और मदनलाल खुराना के अलावा तमाम पंजाबी नेता दिल्ली में छाए हुए थे। उसकी एक बड़ी वजह यह थी कि दिल्ली में पंजाबी वोट बहुत ज्यादा थे।

लेकिन जैसे जैसे दिल्ली का विस्तार हुआ, उत्तर प्रदेश और बिहार से तमाम लोग आकर दिल्ली में बस गए। पूर्वी दिल्ली की बात करें तो वहां अब पूर्वांचल के लोगों की संख्या काफी बढ़ गई है। हालत यह है कि पूर्वांचली के बगैर पूर्वी दिल्ली में चुनाव जीत पाना कठिन हो गया है। तभी तो पूर्वी दिल्ली में मनोज तिवारी जैसे पूर्वांचल के नेताओं का वर्चस्व बढ़ रहा है। इस प्रकार आबादी में बलाव के कारण किसी शहर की राजनीति बदल जाती है।

क्यों बदल रही है उत्तर प्रदेश की राजनीति?

Yogi Adityanath:  उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण 2024 के लोकसभा चुनाव का परिणाम है। क्योंकि चुनाव और उसके परिणाम को सबसे सटीक सर्वे माना जाता है। इसलिए अब उत्तर प्रदेश के चुनाव पुराने समीकरण से तय होंगे। क्योंकि हिंदुत्व का मुद्दा धीरे धीरे अपनी रफ्तार और इंटेंसिटी खाने लगा है। इसकी एक वजह यह भी है कि हिंदुत्व के नाम पर ज्यादा कुछ करने को रह नहीं गया है। अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा अपनी परिणति तक पहुंच गया है, जिसने देश दुनिया के हिंदुओं को एकजुट कर दिया था।

दरअसल, मतदाताओं को एकजुट करने का पुराना फार्मूला डर और भय पैदा करना है। देश भर के मतदाताओं को एकजुट करना है तो पाकिस्तान और चीन का डर दिखाया जाता है। हिंदुओं को एकजुट करना है तो मुसलमानों का डर पैदा किया जाता है और मुसलमानों को एकजुट करना है तो उन्हें हिंदुओं का डर दिखाया जाता है। कुल मिलाकर बिना डर दिखाए हमारे नेता राजनीति कर ही नहीं सकते।

राजनीति में बदलाव लाने वाला सूत्रधार कौन?

Yogi Adityanath: जेडीयू नेता नीतीश कुमार को वर्तमान राजनीति में आए बदलाव का सूत्रधार माना जा रहा है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी अपना एक फार्मूला लेकर भाजपा के साथ लगी हुई हैं। नीतीश कुमार ने जातीय जनगणना का कार्ड चला तो पूरा माहौल ही बदल गया। क्योंकि जातीय जनगणना के जब आंकड़े आए तो सबकी आंखें खुली की खुली रह गईं। हमारे नेता यह समझने को मजबूर हो गए कि जो सोशल इंजीनियरिंग वे कर रहे थे, उसका तो समय लद चुका है।

इसलिए अब राजनीति पिछड़ों और दलितों पर केंद्रित होती जा रही है। कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में इस राजनीति की बयार तेजी से बहने लगी है। नेता सोच रहे हैं कि अब किया क्या जाए? सिंपल सी बात है कि किसी पिछड़ी जाति के नेता को आगे कर दिया जाए। भाजपा ने उसके लिए केशव प्रसाद मौर्य को चुना। लेकिन भाजपा का यह सोचना गलत साबित हुआ। क्योंकि केशव मौर्या खुद अपना चुनाव हार चुके हैं। जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के बहुत बड़े फलक पर केशव मौर्या की अपील नहीं है। और इन्हें मुकाबला अखिलेश यादव जैसे पिछड़ी जाति के नेताओं से करना है, जिन्हें पूरे उत्तर प्रदेश में स्वीकार किया जाता है।

योगी को हटाने का कोई फायदा क्यों नहीं?

फर्ज कीजिए कि किसी परीक्षा को पास करने के लिए आपको 100 में 50 अंक चाहिए। आपको 30 नंबर हिंदुत्व से मिल जाएंगे। क्योंकि इस विषय को आपने ठीक से पढ़ रखा है। 30 नंबर से आगे जाने के लिए आपको पिछड़ा और दलित विषय भी ठीक से पढ़ना है, जिसकी किताब आपने कभी खोली ही नहीं। योगी को हटाने का सीधा सा मतलब यह है कि आप 30 नंबर का पेपर छोड़ रहे हो। और उन प्रश्नों को करना चाहते हो जिन्हें आपने कभी पढ़ा ही नहीं। तो नंबर जीरो आने ही हैं।

इन परिस्थितियों में योगी को हटाने का असर उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे भारत पर पड़ेगा। क्योंकि वह देश के फायर ब्रांड हिंदू नेता के रूप में स्वीकार किए जा चुके हैं। आपको याद होगा कि राजपूतों का अपमान किए जाने के बाद किस कदर राजपूत नेता भड़क गए थे और भाजपा को हराने की कसमें खा रहे थे। ऐसे में राजपूत नेता योगी आदित्यनाथ को हटाया जाता तो राजपूत एक बार फिर भड़क जाते और उसका असर आने वाले विधान सभा चुनावों पर पड़ता।

पिछड़ों का तर्क लेकर घूम रहे हैं मोदी और शाह

वर्तमान सोशल इंजीनियरिंग की बात करें तो मोदी और शाह पिछड़ों का तर्क लेकर घूम रहे हैं। यहां स्वार्थ की भी राजनीति काम कर रही है। तभी तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि मोदी के बाद कौन? क्योंकि योगी ने हिंदुत्व की राजनीति तो की ही है, उसके अलावा भी कुछ ऐसे कार्य किए हैं जिससे उनकी प्रासंगिकता बनी हुई है। इसकी एक वजह यह भी है कि योगी के मुकाबले मोदी जी का जादू घटता नजर आ रहा है। अगर अमित शाह को नंबर दो बनाना है तो योगी के प्रभाव को कम करना मोदी की मजबूरी है। संघ और भाजपा को इस बात का भी डर है कि योगी का प्रभाव बढ़ता रहा और वह प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए तो एक गैरसंघी व्यक्ति सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच जाएगा।

चुनाव परिणाम की भाषा में बात करें तो योगी जी ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा को जीत दिलाई है। और जिन सीटों पर भाजपा हारी है, वहां योगी जी की मर्जी से टिकटों का वितरण नहीं हुआ था। इसलिए लोकसभा चुनाव में हार का ठीकरा योगी जी पर किसी भी रूप में नहीं फोड़ा जा सकता। और योगी जी के कामकाज में केंद्रीय नेतृत्व के नजदीकी अधिकारियों का इतना दखल रहा है ​कि योगी पर यह भी आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उन्होंने ठीक से काम नहीं किया। रही बात बुलडोजर न्याय की, तो इससे योगी जी ने कदम पहले ही पीछे खींच लिया है। इस प्रकार योगी को हटाने के मुद्दे पर रायता इतना ज्यादा फैल गया कि उन्हें हटा पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा हो गया।

समाधान के लिए क्या है मायावती का फार्मूला?

Yogi Adityanath:  केशव मौर्या को समझा दिया गया है कि अभी धैर्य बनाए रखिए। मायावती ने 2011 में एक फार्मूला दिया था, जिसका इस्तेमाल करके योगी जी को निपटा दिया जाएगा। दरअसल, 2011 में मायावती ने एक प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार को भेजा था कि उत्तर प्रदेश को चार भागों में बांट दिया जाए। यह अलग बात है कि इसका अखिलेश यादव समेत कई लोगों ने विरोध किया था। लेकिन उस समय कांग्रेस का मत था कि उत्तर प्रदेश का आकार इतना बड़ा है कि प्रशासनिक सुविधा के लिए उसका बंटवारा उचित है।

जाहिर सी बात है कि योगी जी को तीन राज्यों का मुख्यमंत्री तो बनाया नहीं जा सकता। अगर उत्तर प्रदेश का बंटवारा हो जाता है तो योगी जी एक छोटे से सूबे के मुख्यमंत्री बन कर रह जाएंगे और उनका कद अपने आप छोटा हो जाएगा। और केशव मौर्य जैसे लोगों को उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्सों का मुख्यमंत्री बना कर उन्हें संतुष्ट किया जा सकेगा। एक फार्मूला यह भी है कि केशव मौर्य को उत्तर प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना दिया जाए। इसके अलावा केशव मौर्य को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर भी संतुष्ट किया जा सकता है। क्योंकि जेपी नड्डा का कार्यकाल पूरा हो चुका है। यह केशव मौर्य के लिए बहुत बड़ी बात होगी। फिलहाल योगी जी पूरे दम खम से उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने में लगे हैं। आगे क्या होगा यह तो समय और परिस्थितियों पर निर्भर है।

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