Systemic Change: लोग पैसा लेकर वोट देंगे तो कोई भ्रष्टाचारी नेता ही चुनाव जीतेगा। ऐसे में हमें यह शिकायत करने का हक नहीं है कि पेपर क्यों लीक हो रहे हैं। काकरोच जनता पार्टी की लोकप्रियता से कदाचित सरकार बदल भी जाए तो उससे व्यवस्था की खामियां कभी भी दूर नहीं हो पाएंगी। आज चर्चा व्यवस्था परिवर्तन पर।
Systemic Change: क्यों बार बार लौट आता है भ्रष्टाचार और शोषण?
इंफोपोस्ट न्यूजडेस्क/Systemic Change
लोकतंत्र में अक्सर यह माना जाता है कि किसी बड़े आंदोलन, क्रांति या सत्ता परिवर्तन से देश की तस्वीर बदल जाएगी। इतिहास गवाह है कि अनेक देशों में जनता ने सड़कों पर उतरकर सरकारें बदल दीं, तानाशाहों को हटाया, नई पार्टियों को सत्ता में पहुंचाया और नए नेताओं को अपना मसीहा बनाया। लेकिन कुछ ही वर्षों बाद वही जनता फिर से निराश दिखाई देती है। भ्रष्टाचार लौट आता है, शोषण जारी रहता है, प्रशासनिक अव्यवस्था बनी रहती है और लोगों को फिर किसी नए आंदोलन की तलाश होने लगती है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? क्यों सरकारें बदलने के बाद भी व्यवस्था नहीं बदलती?
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि व्यवस्था केवल नेताओं या सरकारों से नहीं बनती, बल्कि समाज के चरित्र से बनती है। जब समाज के भीतर भ्रष्टाचार, लालच, अवसरवाद और नैतिक पतन मौजूद हो, तब कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक ईमानदार नहीं रह सकती। आंदोलन सत्ता बदल सकता है, लेकिन समाज का चरित्र नहीं बदल सकता। चरित्र परिवर्तन भीतर से आता है और वही किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होता है।
लोग ईमानदारी निभाने को तैयार नहीं
Systemic Change: भारत समेत दुनिया के कई देशों में यह देखा गया है कि लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा तो व्यक्त करते हैं, लेकिन अपने स्तर पर ईमानदारी निभाने को तैयार नहीं होते। सड़क पर नियम तोड़ने वाला व्यक्ति संसद में ईमानदार नेता की उम्मीद करता है। टैक्स चोरी करने वाला नागरिक भ्रष्टाचार मुक्त सरकार चाहता है। छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए रिश्वत देने वाला व्यक्ति बड़े घोटालों पर भाषण देता है। यही वह विरोधाभास है, जिसने व्यवस्था परिवर्तन के हर सपने को अधूरा छोड़ दिया।
चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार माना जाता है, लेकिन जब वोट जाति, धर्म, लालच, शराब, नकदी या व्यक्तिगत फायदे के आधार पर डाला जाने लगे, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि चुनाव के समय उम्मीदवार पैसे बांटते हैं और जनता खुशी-खुशी उसे स्वीकार भी करती है। बाद में वही नेता सत्ता में आकर भ्रष्टाचार के नए रिकॉर्ड बनाता है। वह चुनाव में खर्च किए गए पैसे को कई गुना बढ़ाकर निकालना चाहता है। जनता फिर पांच साल तक शिकायत करती रहती है और अंत में किसी नए आंदोलन की मांग उठने लगती है।
असल में समस्या केवल नेता नहीं
असल में समस्या केवल नेता नहीं हैं, बल्कि वह मानसिकता है जो भ्रष्ट लोगों को सत्ता तक पहुंचाती है। जब समाज में ईमानदारी का सम्मान कम होने लगे और चालाकी को सफलता का प्रतीक मान लिया जाए, तब व्यवस्था का पतन तय हो जाता है। किसी भी देश की राजनीति वहां की जनता के चरित्र का ही प्रतिबिंब होती है। यदि जनता जागरूक, नैतिक और जिम्मेदार होगी तो राजनीति भी वैसी ही बनेगी। लेकिन यदि समाज खुद भ्रष्टाचार में डूबा हो तो केवल सरकार बदलने से कुछ नहीं बदलता।
इतिहास में कई महान विचारकों ने इस बात पर जोर दिया है कि समाज परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति परिवर्तन से होती है। महात्मा गांधी ने कहा था, “आप स्वयं वह परिवर्तन बनिए, जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।” गांधी जानते थे कि केवल अंग्रेजों को हटाने से भारत आदर्श राष्ट्र नहीं बन जाएगा। इसलिए उन्होंने चरित्र निर्माण, सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन और नैतिकता पर सबसे अधिक बल दिया। उनके मुताबिक, यदि नागरिक मजबूत होंगे तो राष्ट्र स्वतः मजबूत हो जाएगा।
आज सोशल मीडिया के दौर में आंदोलन खड़े करना आसान हो गया है। कुछ वायरल वीडियो, कुछ गुस्से भरे भाषण और कुछ ट्रेंडिंग हैशटैग लाखों लोगों को जोड़ देते हैं। लेकिन यह भी सच है कि डिजिटल आक्रोश अक्सर वास्तविक आत्ममंथन में नहीं बदलता।
अधिकांश लोग परिवर्तन तो चाहते हैं, पर खुद बदलना नहीं चाहते
लोग सिस्टम को कोसते हैं, लेकिन खुद अपने व्यवहार की समीक्षा नहीं करते। यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में छोटी-छोटी ईमानदार आदतें विकसित करे तो बड़ा परिवर्तन स्वतः संभव हो सकता है। उदाहरण के लिए यदि लोग रिश्वत देना बंद कर दें, ट्रैफिक नियमों का पालन करें, वोट सोच-समझकर दें, सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति समझें, टैक्स ईमानदारी से भरें और गलत काम करने वालों का सामाजिक समर्थन बंद कर दें, तो व्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है। लेकिन समस्या यह है कि अधिकांश लोग परिवर्तन तो चाहते हैं, पर खुद बदलना नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि बाकी लोग ईमानदार बनें, जबकि उन्हें स्वयं छूट मिलती रहे।
व्यवस्था परिवर्तन केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक मुद्दा भी है। जिस समाज में बच्चों को बचपन से यह सिखाया जाए कि “काम निकालने के लिए थोड़ा बहुत गलत करना चलता है”, वहां भविष्य में ईमानदार व्यवस्था की उम्मीद करना कठिन हो जाता है। इसलिए बदलाव की शुरुआत परिवार, शिक्षा और सामाजिक मूल्यों से करनी होगी। स्कूलों में केवल डिग्री नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा भी जरूरी है। परिवारों में केवल सफलता नहीं, बल्कि ईमानदारी का सम्मान होना चाहिए।
व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ नागरिक चेतना का विकास
Systemic Change: यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र में जनता केवल मतदाता नहीं होती, बल्कि भागीदार होती है। यदि नागरिक जागरूक नहीं होंगे तो कोई भी नेता धीरे-धीरे निरंकुश और भ्रष्ट हो सकता है। इसलिए व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि नागरिक चेतना का विकास है। जब तक जनता अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगी, तब तक आंदोलन आते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहेंगी।
आज देश में अक्सर यह चर्चा होती है कि कौन सी पार्टी अच्छी है और कौन सी खराब। लेकिन शायद इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या समाज खुद अच्छा बनने की कोशिश कर रहा है? क्योंकि अंततः राजनीति समाज से ही निकलती है। यदि समाज में नैतिकता होगी तो राजनीति में भी उसका प्रभाव दिखाई देगा। लेकिन यदि समाज स्वार्थ और भ्रष्टाचार में डूबा रहेगा तो कोई भी व्यवस्था ज्यादा समय तक स्वच्छ नहीं रह पाएगी। इसलिए वास्तविक क्रांति सड़कों पर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर शुरू होती है। जब व्यक्ति खुद को बदलने का निर्णय लेता है, तभी समाज बदलता है और फिर व्यवस्था भी बदलने लगती है। अन्यथा आंदोलन केवल सरकारें बदलते हैं, व्यवस्था नहीं।


