Subsea Cable2: भारत का इंटरनेट नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन उसकी अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी मुंबई के एक छोटे समुद्री इलाके पर निर्भर है।
Subsea Cable2: समुद्र की गहराई में बिछी फाइबर ऑप्टिक केबलों का विशाल जाल
INFOPOST/Subsea Cable2
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!Subsea Cable2: भारत के डिजिटल विस्तार के पीछे जमीन के ऊपर दिखाई देने वाला नेटवर्क ही नहीं, बल्कि समुद्र की गहराई में बिछी फाइबर ऑप्टिक केबलों का विशाल जाल भी है। यही केबल भारत को यूरोप, अफ्रीका और पश्चिम एशिया से जोड़ती हैं। लेकिन इस महत्वपूर्ण ढांचे की एक बड़ी कमजोरी मुंबई के वर्सोवा तट के पास सामने आती है।
तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के अध्ययन के मुताबिक भारत की 18 अंतरमहाद्वीपीय समुद्री केबलों में कम से कम 13 वर्सोवा के आसपास करीब छह किलोमीटर के दायरे में समुद्र से बाहर आती हैं। ये केबल भारत की अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ का बहुत बड़ा हिस्सा संभालती हैं।
वर्सोवा पर इतना बड़ा जोखिम क्यों?
समुद्र के नीचे बिछी केबलें भारत के डिजिटल जीवन की अदृश्य रीढ़ हैं। बैंकिंग, क्लाउड सेवाएं, सरकारी नेटवर्क, कारोबार और अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रांसफर जैसी गतिविधियां इनके जरिए चलती हैं। इसलिए किसी बड़े केबल नेटवर्क में रुकावट का असर केवल इंटरनेट की गति तक सीमित नहीं रह सकता।
वर्सोवा में इतनी बड़ी संख्या में केबलों का एक छोटे क्षेत्र में आना नेटवर्क के लिए भौगोलिक जोखिम पैदा करता है। यदि एक साथ कई केबल क्षतिग्रस्त होती हैं तो पश्चिम की ओर जाने वाले भारत के अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है। तक्षशिला इंस्टीट्यूशन ने इसे भारत की डिजिटल कनेक्टिविटी की गंभीर कमजोरी बताया है।
Subsea Cable2: इंटरनेट पूरी तरह बंद होगा?
किसी एक केबल के कटने का अर्थ यह नहीं है कि पूरे भारत में इंटरनेट बंद हो जाएगा। समुद्री केबल नेटवर्क इस तरह तैयार किए जाते हैं कि उपलब्ध दूसरे रास्तों से डेटा ट्रैफिक को मोड़ा जा सके। भारत के पास मुंबई के अलावा चेन्नई, कोच्चि, तूतीकोरिन और तिरुवनंतपुरम जैसे दूसरे लैंडिंग प्वाइंट भी हैं।
लेकिन समस्या तब गंभीर हो सकती है जब एक ही भौगोलिक क्षेत्र में मौजूद कई केबल एक साथ प्रभावित हों। ऐसी स्थिति में वैकल्पिक रास्तों पर अचानक बहुत अधिक दबाव पड़ सकता है। इसका परिणाम डेटा ट्रैफिक की गति और नेटवर्क की क्षमता पर दिखाई दे सकता है, भले ही देश में इंटरनेट पूरी तरह बंद न हो।
बैंकिंग से क्लाउड तक असर
इंटरनेट की गति में मामूली गिरावट भी कुछ क्षेत्रों के लिए महंगी साबित हो सकती है। वित्तीय बाजारों में तेजी से डेटा पहुंचना जरूरी होता है। बैंकिंग और डिजिटल भुगतान सेवाएं लगातार अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हो रही हैं।
बड़ी टेक कंपनियों और डेटा सेंटरों के लिए भी भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी जरूरी है। इसलिए समुद्री केबलों में लंबे समय तक व्यवधान से कारोबार की लागत बढ़ सकती है और कुछ सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। भारत के बढ़ते डिजिटल और डेटा सेंटर क्षेत्र के लिए यह चुनौती और महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत को क्या करना होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को समुद्री केबलों के लैंडिंग प्वाइंट अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बढ़ाने होंगे। तक्षशिला इंस्टीट्यूशन ने नए हब विकसित करने और मुंबई पर निर्भरता कम करने की जरूरत बताई है। देश के पूर्वी और दूसरे तटीय हिस्सों में नए केबल लैंडिंग प्रोजेक्ट इस दिशा में मदद कर सकते हैं।
दूसरी बड़ी चुनौती केबलों की मरम्मत से जुड़ी है। तक्षशिला के अध्ययन के अनुसार भारत के पास अपना भारतीय-झंडे वाला समुद्री केबल रिपेयर पोत नहीं है और इस क्षेत्र में विदेशी क्षमता पर निर्भरता बनी हुई है। ऐसे में केबल टूटने के बाद मरम्मत में लगने वाला समय भी डिजिटल सुरक्षा का अहम हिस्सा बन जाता है।
इंटरनेट की सुरक्षा अब राष्ट्रीय मुद्दा
समुद्री केबलों को केवल दूरसंचार क्षेत्र का तकनीकी ढांचा मानना पर्याप्त नहीं होगा। भारत की अर्थव्यवस्था, डिजिटल सेवाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा का एक बड़ा हिस्सा इनके भरोसे चलता है। इसलिए इनके लैंडिंग स्टेशनों की सुरक्षा, वैकल्पिक मार्ग और तेज मरम्मत क्षमता पर ध्यान देना जरूरी है।
भारत का इंटरनेट इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है और देश वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा रहा है। ऐसे समय में समुद्र के नीचे मौजूद इस अदृश्य नेटवर्क की कमजोरी को नजरअंदाज करना जोखिम भरा हो सकता है। वर्सोवा का छह किलोमीटर का तटीय क्षेत्र इसी चुनौती की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है।


