Stray Cattle Crisis: उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के एक गांव में आवारा पशु, नीलगाय और जंगली सूअर किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। किसानों का कहना है कि खेतों में फसलों को लगातार हो रहे नुकसान के कारण वे धान और गेहूं की खेती तक सीमित होने को मजबूर हैं। इसका असर न केवल उनकी आमदनी और खेती की विविधता पर पड़ रहा है, बल्कि दलहनी फसलों के उत्पादन और ग्रामीण परिवारों के पोषण पर भी दिखाई दे रहा है।
Stray Cattle Crisis: किसानों की खेती पर बढ़ता संकट
इंफोपोस्ट/Stray Cattle Crisis
भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक आबादी वाला राज्य है। लगातार बढ़ती आबादी के बीच कृषि भूमि पर दबाव बढ़ रहा है। खेती के क्षेत्रफल में कमी के पीछे शहरीकरण भी एक बड़ी वजह है, लेकिन गांवों में मौजूद कृषि भूमि पर खेती का स्वरूप बदलने की एक दूसरी समस्या भी सामने आ रही है। किसानों के मुताबिक, वे अपनी जमीन पर पहले की तरह मनचाही फसल नहीं उगा पा रहे हैं।
सुल्तानपुर जिले के एक गांव में किसानों ने बताया कि पहले खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसम में अलग-अलग तरह की फसलें उगाई जाती थीं। खेतों में विविधता थी और किसान अपनी जरूरत के मुताबिक अनाज, दलहन तथा दूसरी फसलें पैदा करते थे। लेकिन अब आवारा पशुओं, नीलगाय और जंगली सूअर के बढ़ते नुकसान के कारण खेती का विकल्प सीमित होता जा रहा है। किसानों का कहना है कि वे मजबूरी में मुख्य रूप से धान और गेहूं की फसल लेने लगे हैं।
Stray Cattle Crisis: धान और गेहूं तक सिमटती जा रही खेती
स्थानीय किसानों के अनुसार, पहले खेतों में कई तरह की फसलें आसानी से उगाई जाती थीं। आवारा पशुओं की समस्या इतनी गंभीर नहीं थी कि किसान को हर समय अपनी फसल की सुरक्षा की चिंता करनी पड़े। अब स्थिति बदल गई है। किसानों का कहना है कि धान और गेहूं के अलावा दूसरी फसलों को बचाना मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि खेती में फसल विविधता लगातार प्रभावित हो रही है।
किसानों ने बताया कि मक्का, आलू और दूसरी फसलों को आवारा पशु तथा नीलगाय भारी नुकसान पहुंचाते हैं। खेत में फसल तैयार होने के बाद भी उसे सुरक्षित रख पाना मुश्किल हो जाता है। एक किसान के मुताबिक, मक्का बोने पर पशु पूरी फसल नष्ट कर देते हैं और आलू की खेती भी सुरक्षित नहीं रह पाती। ऐसे में किसान ऐसी फसलें उगाने से बचने लगे हैं जिनमें नुकसान का खतरा अधिक है।
बाड़ और झटका मशीन भी नहीं दे पा रही सुरक्षा
Stray Cattle Crisis: फसलों को बचाने के लिए किसानों ने अपने स्तर पर कई उपाय किए हैं। खेतों के चारों ओर बांस की बाड़ लगाई गई है। कुछ किसानों ने तार की बाड़ भी लगवाई है। इसके बावजूद नीलगाय और दूसरे जंगली पशु खेतों में प्रवेश कर जाते हैं। किसानों का कहना है कि नीलगाय बाड़ को पार करके खेतों में पहुंच जाती हैं और फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं।
कुछ किसानों ने खेतों की सुरक्षा के लिए झटका मशीन भी लगाई है, लेकिन उनका दावा है कि इससे भी मक्का और दूसरी फसलों को पूरी तरह बचाना संभव नहीं हो पा रहा है। किसानों के सामने समस्या यह है कि सुरक्षा के लिए खर्च करने के बाद भी फसल की गारंटी नहीं मिलती। खेती में पहले से लगाई गई लागत और मेहनत के बावजूद नुकसान की आशंका बनी रहती है।
खेतों तक पहुंचना भी किसानों के लिए मुश्किल
किसानों ने गांव की चकरोड और खेतों तक जाने वाले रास्तों की खराब स्थिति पर भी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि कई रास्तों की हालत ऐसी है कि बुजुर्ग और कमजोर लोगों के लिए वहां से गुजरना कठिन हो जाता है। रास्ते पर चलने के लिए कई बार लाठी का सहारा लेना पड़ता है। किसानों के अनुसार, खेती से जुड़ी समस्याओं के बीच खेतों तक पहुंचने के रास्तों की बदहाली उनकी परेशानी को और बढ़ाती है।
किसानों ने यह भी कहा कि गांवों में सफाई कर्मियों की तैनाती होने के बावजूद चकरोड की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है। उनके मुताबिक, खेती और पशुओं से जुड़ी समस्याओं के समाधान के साथ ग्रामीण रास्तों की मरम्मत और रखरखाव पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। खराब रास्तों के कारण खेतों तक आने-जाने में परेशानी होती है और इसका असर रोजमर्रा के कृषि कार्यों पर पड़ता है।
दलहनी फसलों की कमी से पोषण पर असर
फसल चक्र में बदलाव का असर केवल किसानों की आमदनी तक सीमित नहीं है। दलहनी फसलों की खेती कम होने से ग्रामीण परिवारों के भोजन में प्रोटीन के स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। किसानों का कहना है कि पहले वे मटर और दूसरी दलहनी फसलें उगाते थे। इनका कुछ हिस्सा परिवार के खाने के लिए रखा जाता था और बाकी बाजार में बेच दिया जाता था। अब पशुओं से फसल को बचा पाना मुश्किल होने के कारण ऐसी खेती घट रही है।
किसानों ने मटर की दाल की बढ़ती कीमतों का भी जिक्र किया। उनका कहना है कि जिस मटर को पहले वे अपने खेतों में उगाते थे, आज उसी दाल को बाजार से महंगे दाम पर खरीदना पड़ रहा है। बातचीत के दौरान एक किसान ने मटर की दाल की कीमत लगभग 170 से 170 रुपये प्रति किलो के आसपास बताई। इस महंगाई का सीधा असर उन परिवारों पर पड़ता है जो पहले अपनी जरूरत का कुछ हिस्सा खुद पैदा कर लेते थे।
गौशालाओं की व्यवस्था पर भी किसानों ने उठाए सवाल
किसानों ने सरकार की ओर से बनाई गई गौशालाओं की व्यवस्था पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि गौशालाएं बनने के बावजूद बड़ी संख्या में आवारा पशु गांवों और खेतों में घूम रहे हैं। किसानों के मुताबिक, ग्राम प्रधान और सफाई कर्मियों को आवारा पशुओं को पकड़कर पशुशालाओं में पहुंचाने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पर्याप्त असर दिखाई नहीं दे रहा है।
एक किसान ने सुझाव दिया कि निराश्रित पशुओं के लिए गौशालाओं की संख्या और व्यवस्था को बेहतर किया जाना चाहिए। उन्होंने नीलगाय के लिए अलग व्यवस्था या आश्रय स्थल बनाने की जरूरत भी बताई। किसानों का कहना है कि वे पशुओं की हत्या के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन जब फसलें लगातार नष्ट हो रही हों और किसान अपनी आजीविका नहीं चला पा रहा हो, तब सरकार को इस समस्या का व्यावहारिक समाधान तलाशना चाहिए।
गौशालाओं में चारा-पानी की व्यवस्था पर चिंता
किसानों ने आरोप लगाया कि कुछ गौशालाओं में पशुओं को पर्याप्त चारा और पानी नहीं मिल पा रहा है। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं में पशुओं की देखभाल के लिए व्यवस्था का प्रावधान है, लेकिन गांवों में उन्हें इसका लाभ दिखाई नहीं देता। किसानों के मुताबिक, गौशालाओं में पशुओं की देखभाल ठीक से होनी चाहिए, ताकि उन्हें सुरक्षित रखने के साथ खेतों में आवारा पशुओं की समस्या भी कम की जा सके।
उनका यह भी कहना है कि केवल गौशालाएं बना देना पर्याप्त नहीं है। पशुओं के लिए नियमित चारा, पानी और देखभाल की व्यवस्था जरूरी है। यदि गौशालाओं में उचित प्रबंधन नहीं होगा तो निराश्रित पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाएगा। किसानों ने सरकार से इस दिशा में प्रभावी निगरानी और व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की।
खेती घाटे का सौदा बनने से बढ़ रही चिंता
गांव के किसानों का कहना है कि मौजूदा हालात में खेती उनके लिए फायदे का सौदा नहीं रह गई है। फसल बोने से लेकर उसकी सुरक्षा तक लगातार खर्च और मेहनत करनी पड़ती है। इसके बावजूद आवारा पशुओं और नीलगाय के कारण फसल नष्ट होने का खतरा बना रहता है। एक किसान ने कहा कि योजनाएं तो बनाई जाती हैं, लेकिन उनका लाभ जरूरतमंद किसानों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। उन्होंने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी सवाल उठाए।
किसानों के अनुसार, यदि फसल की सुरक्षा ही सुनिश्चित नहीं होगी तो खेती को लाभकारी बनाने के दावे जमीन पर पूरे नहीं हो सकते। किसान अपनी जमीन पर विविध फसलें उगाना चाहते हैं, लेकिन नुकसान के डर से ऐसा करने से बचते हैं। इसका परिणाम यह है कि फसल चक्र प्रभावित हो रहा है और परिवारों को अपनी जरूरत की कई चीजें बाजार से खरीदनी पड़ रही हैं।
किसानों के बच्चों के भविष्य को लेकर भी चिंता
किसानों ने खेती की समस्या को परिवार और अगली पीढ़ी के भविष्य से भी जोड़ा। उनका कहना है कि जब खेती से पर्याप्त आमदनी नहीं हो रही तो परिवारों के सामने बच्चों की पढ़ाई, रोजगार और विवाह जैसी जिम्मेदारियां निभाना कठिन हो जाता है। एक किसान ने बेरोजगारी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि युवाओं को रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे हैं और वे खाली घूमने को मजबूर हैं।
किसानों का मानना है कि खेती की बदहाली और रोजगार की कमी एक-दूसरे से जुड़ी समस्याएं हैं। यदि कृषि से परिवार की जरूरतें पूरी नहीं होंगी तो ग्रामीण युवाओं का खेती से भरोसा कमजोर होगा। उन्होंने सरकार से किसानों की मूलभूत समस्याओं के साथ ग्रामीण युवाओं के रोजगार पर भी ध्यान देने की अपील की।
सरकार से स्थायी समाधान की मांग
Stray Cattle Crisis: सुल्तानपुर के इस गांव में किसानों की बातचीत से स्पष्ट होता है कि आवारा पशुओं और नीलगाय का नुकसान अब केवल खेतों की फसल तक सीमित समस्या नहीं रह गया है। इससे फसल चक्र, दलहनी उत्पादन, पोषण, किसानों की आय और ग्रामीण परिवारों का भविष्य प्रभावित होने की चिंता सामने आई है। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी व्यवस्था नहीं की गई तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
किसानों ने सरकार से गौशालाओं की व्यवस्था सुधारने, आवारा पशुओं को नियंत्रित करने, नीलगाय से फसलों की सुरक्षा के उपाय करने और ग्रामीण रास्तों की स्थिति बेहतर बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि किसान अपनी जमीन पर पहले की तरह विविध फसलें उगाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए खेतों की सुरक्षा जरूरी है। अब देखना होगा कि किसानों की इन समस्याओं पर प्रशासन और सरकार किस तरह कदम उठाते हैं।


