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कांग्रेस की सरपस्ती में संस्थाओं पर कब्जे की रणनीति

August 23, 2020
A2


भारतीय राज्य बुरा है, कम्युनिस्टों के लिए बात यहीं तक सीमित नहीं रहती। वह अगर उनके कब्जे में नहीं है, तो उनकी मंशा होती है कि उसे दुनिया में होना ही नहीं चाहिए। भारतीय राज्य पर कब्जा नहीं हो पाने पर उन्होंने कांग्रेस की सरपस्ती में संस्थाओं पर कब्जे की रणनीति अपनाई। इस रणनीति के निष्ठापूर्वक निर्वाह का नतीजा यह है कि वे उस रणनीति के बंदी बन कर रह गए हैं। यह सही है कि इस तरह से कम्युनिस्टों ने काफी ताकत हासिल की, लेकिन नवसाम्राज्यवाद विरोध के लिए उस ताकत का कोई उपयोग नहीं है।

दरअसल, उन्होंने सारी ताकत इस बात में लगा दी कि भारत बेशक कांग्रेस के कब्जे में रहे, भारतीय संदर्भों से जुड़ी समाजवाद या सामाजिक न्याय की कोई धारा जगह नहीं बना पाए। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और शोध संस्थाओं के शीर्ष पर रह कर उन्होंने अपने से अलग विचारों/विचारकों के प्रति संकीर्णता का बर्ताव किया।

ऐसे में, जाहिर है, जगह आरएसएस की ही बननी थी, जो अपने स्थापना-काल से ‘भारत माता भारत माता’ चिल्लाता चला आ रहा था और कम्युनिस्टों की तरह कांग्रेस में गहरी घुसपैठ रखता था। दरअसल, अधूरी आजादी से असंतुष्ट हो पूर्णता हासिल करने के लिए आरएसएस अगर समय में सुदूर स्थित ‘स्वर्णलोक’ की तरफ भागा, तो कम्युनिस्ट स्थान में सुदूर स्थित ‘स्वर्णलोक’ की तरफ। दोनों की आज तक भी कमोबेस वही स्थिति बनी हुई है।

यह स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यह समीक्षा वाद-विवाद के लिए नहीं की जा रही है। बल्कि आजादी का बचाव हो; वह पूर्ण, मजबूत और उच्चतर हो, इस उद्देश्य से की जा रही है। देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया गया है। ऐसे में आरएसएस को ठीक करने के पहले अगर अपने को ठीक नहीं किया जाता, तो नवउदारवाद के खिलाफ मोर्चा कभी नहीं जीता जा सकता।

वैश्विक परिदृश्य पर मचे हिंसा और मौत के तांडव के बावजूद पूंजीवाद की क्रांतिकारी भूमिका के सिद्धांतकार और पैरोकार आज भी अपनी स्थापना वापस लेने को तैयार नहीं होंगे। तीन-चौथाई दुनिया का उपनिवेशीकरण, संसाधनों की लूट, समूचे समुदायों का सफाया करके उनके भूभागों पर कब्जा, युद्धों, गृहयुद्धों, महायुद्धों के वर्तमान तक जारी अनवरत सिलसिले के समानांतर जीवधारियों और वनस्पतियों की असंख्य प्रजातियों का विनाश करते हुए दुनिया को संकट के मुहाने पर ले आने वाला पूंजीवाद आज भी ‘क्रांतिकारी‘ है।

पूंजीवादी व्यवस्था की सर्वाधिक यथार्थपरक (रियलिस्टिक) और तर्कपूर्ण (रेशनल) समीक्षा करने वाला गांधी आज भी भारत में मानव-प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है। पूंजीवाद के बीमार दिमाग की इस समझ के साथ यह समझ लें कि आगे मनमोहन सिंह और मोदी ही आएंगे। गांधी, नेहरू, जेपी, लोहिया या अंबेडकर नहीं आने जा रहे हैं।

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