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Russia-Ukraine War: इस लड़ाई से किसे कितना लाभ?

April 18, 2022
Russia-Ukraine War

Russia-Ukraine War: युद्ध अपने आप में एक बड़ी आपदा है। रूस और यूक्रेन में युद्ध से पूरी दुनिया में महंगाई आसमान पर है। लेकिन इस वैश्विक आपदा के बीच भारत के लिए कुछ अवसरों की झलक मिल रही है। आज चर्चा इसी पर।

Russia-Ukraine War: लाभ भारतीय किसानों को होगा या व्यापारियों को?

श्रीकांत सिंह

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Russia-Ukraine War: रूस और यूक्रेन में युद्ध का प्रभाव कई देशों पर पड़ रहा है। कई जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ रही हैं। लेकिन भारतीय किसानों के लिए एक अच्छी खबर है।

भारत से गेहूं के निर्यात में तेजी आई है, जो और भी बढ़ने की उम्मीद है। उधर, बाजार में गेहूं की नई फसल आ रही है। यही हालत रही तो देश के किसानों को अच्छा मुनाफा मिल सकता है। क्योंकि उनकी फसल का बाजार में अच्छा दाम मिल सकता है।

लेकिन इस बात को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि अवसरों का लाभ व्यापारी उठा पाएंगे या किसान। आप देख ही चुके हैं कि नींबू के दाम आसमान पर होने के बावजूद किसानों को एक नींबू के मात्र दो रुपये मिल रहे थे। जबकि बाजार में एक नींबू का मूल्य 15 रुपये रहा है। फिर भी व्यापारियों की ओर से मांग बढ़ाए जाने का लाभ किसानों को मिल सकता है।

अब एमएसपी से भी ज्यादा हो गई है गेहूं की कीमत!

Russia-Ukraine War: निर्यात अवसरों का लाभ उठाने के लिए व्यापारी जमकर गेहूं की खरीद कर रहे हैं। यही वजह है कि किसानों को गेहूं का अच्छा दाम मिल रहा है। दावा किया गया है कि गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य 2015 रुपये प्रति कुंतल के मुकाबले किसानों को 2050 से 2100 रुपये प्रति कुंतल गेहूं का दाम मिल रहा है।

लेकिन उत्तर प्रदेश के देवरी गांव के किसान राजमणि पांडेय कहते हैं कि स्थानीय खरीदार अभी भी किसानों को गेहूं की एमएसपी से अधिक कीमत नहीं दे रहे हैं। जबकि सरकार ने एमएसपी का रेट बढ़ा दिया है। इसलिए किसान अभी भी एमएसपी पर ही गेहूं बेचना अधिक पसंद कर रहे हैं। यह व्यापारियों की लूट का ही एक उदाहरण है।

दुनिया में गेहूं की कीमत 24-25 हजार रुपये प्रति टन

Russia-Ukraine War: खाद्य सचिव सुधांशु पांडेय के मुताबिक, देश में गेहूं की फसल का कुल निर्यात इस साल लगभग 66 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर रहा है। यह समय भारतीय किसानों के लिए एक सुनहरा अवसर है। क्योंकि वैश्विक गेहूं की कीमत 24 से 25 हजार रुपये प्रति टन है।

रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध का भारत के कृषि और खाद्य बाजार पर व्यापक असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। युद्ध की स्थिति के बीच खाद्य तेलों और आयात की जाने वाली अन्य खाद्य सामग्री की कीमतें बढ़ने के कारण गेहूं और कुछ अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात में तेजी आ रही है।

कृषि विशेषज्ञ और इंडियन चैम्बर्स ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर के अध्यक्ष एमजे खान के मुताबिक, वर्ष 2021 में यूक्रेन के साथ भारत का लगभग तीन बिलियन डॉलर का कारोबार रहा है। रूस के साथ लगभग 11.5 बिलियन डॉलर का कारोबार रहा है। वैसे, इस परिस्थिति का लाभ सरकार सबसे ज्यादा उठा सकती है। क्योंकि उसे एमएसपी पर कम गेहूं खरीदना पड़ेगा और वह सब्सिडी के बोझ को कम कर सकेगी।

सरकार खुले बाजार में बेच सकती है गेहूं का बफर स्टॉक!

भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई के पास अभी कुल 520 लाख टन खाद्य भंडार है। उसमें 240 लाख टन सिर्फ गेहूं है। सरकार के लिए यह एक बड़ा अवसर है कि वह गेहूं के स्टॉक को खुले बाजार में बेचने के लिए उपलब्ध कराए।

लेकिन एक अधिकारी का कहना है कि विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ के नियमों के मुताबिक, सेंट्रल पूल का गेहूं सिर्फ घरेलू उपयोग के लिए होता है। इसलिए सरकार इसका निर्यात नहीं कर सकती। लेकिन नई पैदावार व्यापारी निर्यात के लिए खरीद सकते हैं। और घरेलू जरूरतों के लिए एफसीआई के गोदाम में पर्याप्त स्टॉक है।

युद्ध के कारण निर्यात को बढ़ाने का अवसर

यूक्रेन के साथ तीन बिलियन डॉलर के व्यापार में भारत करीब 500 मिलियन डॉलर का निर्यात करता है। ढाई बिलियन डॉलर का भारत में आयात होता है। युद्ध के कारण निर्यात को बढ़ाने का अवसर जरूर बढ़ा है, लेकिन भारत कैसे इस अवसर पर पड़ोसी देशों के साथ सामंजस्य स्थापित कर काम करता है यह देखने वाली बात होगी।

युद्ध के दौरान सप्लाई चेन की समस्या से शुरुआती दिक्कतें आ सकती हैं, लेकिन युद्ध के खत्म होने के बाद भारत इस अवसर का लाभ उठा कर निर्यात बढ़ा सकता है। भारत से दवाइयों, कृषि रसायन और सॉफ्टवेयर का निर्यात बड़ी मात्रा में होता है। आगे चल कर इनकी मांग में बढ़ोतरी होगी।

रूस और यूक्रेन मिला कर भारत में सूरजमुखी का 90% तक आयात होता है। उसमें अब रुकावट आएगी। यूक्रेन विश्व में खाद्य तेल के स्रोत सूरजमुखी का सबसे बड़ा उत्पादक है। इसका विकल्प भारत को तैयार करना होगा। मक्के के उत्पादन में भी यूक्रेन पांचवें स्थान पर है। सूरजमुखी तेल के मामले में इन दोनों देशों की विश्व में 60 प्रतिशत की हिस्सेदारी है।

कुल 70 लाख टन तक पहुंच सकता है गेहूं का निर्यात

केंद्रीय खाद्य सचिव सुधांशु पांडेय के मुताबिक, आने वाले दिनों में भारत का गेहूं निर्यात बढ़ेगा। गेहूं की आपूर्ति में रूस और यूक्रेन का हिस्सा एक चौथाई है। मौजूदा संकट की वजह से सप्लाई प्रभावित हुई है। तभी तो गेहूं की कीमत रिकॉर्ड स्तर पर है।

इस वर्ष फरवरी के अंत तक भारत 66 लाख टन गेहूं का निर्यात कर चुका था। इससे पहले 2013—14 में भारत ने 65 लाख टन गेहूं का निर्यात किया था। इसलिए उम्मीद जताई जा रही है कि इस वर्ष भारत 70 लाख टन से अधिक गेहूं का निर्यात कर लेगा।

सप्लाई चेन में व्यवधान आने से गेहूं की मांग बढ़ेगी

गेहूं की बात करें तो रूस और यूक्रेन से अफ्रीकी और यूरोपीय देशों में गेहूं बड़ी मात्रा में निर्यात होता है। दोनों देश मिला कर विश्व को 21 प्रतिशत गेहूं का निर्यात करते हैं। अब सप्लाई चेन में व्यवधान आने से उन देशों में मांग बढ़ेगी और भारत के लिए यह एक अवसर हो सकता है।

खाद्य तेल में भारत लगभग एक बिलियन डॉलर से ज्यादा का निर्यात करता है। कृषि क्षेत्र में इसका असर इसलिए भी देखने को मिलेगा, क्योंकि पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में भी समस्या आएगी। क्योंकि डीजल के दाम में बढ़ोतरी होने पर किसानों के लिए लागत मूल्य बढ़ने का खतरा है। हालांकि विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि बफर स्टॉक के कारण बाजार पर युद्ध का तुरंत असर नहीं दिखेगा।

इसलिए अभी खाद्य तेलों की कीमत में बढ़ोतरी नहीं होगी। जहां तक भविष्य की बात है, विकल्प तैयार रखना होगा। भारत पहले ही सनफ्लावर ऑयल से पाम ऑयल की तरफ बढ़ रहा है। उसकी आपूर्ति अभी अधिक है। मलेशिया, इंडोनेशिया और कुछ अफ्रीकी देशों से पाम ऑयल के निर्यात को बढ़ाया जा सकता है जो भारत कर सकता है।

वैकल्पिक व्यवस्था और बफर स्टॉक के कारण तुरंत असर नहीं

इस तरह से वैकल्पिक व्यवस्था और बफर स्टॉक होने के कारण तुरंत असर नहीं होना चाहिए, लेकिन बजार पर युद्ध की परिस्थिति का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है। इसलिए खाद्य तेलों में 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी के आसार हैं।

भारत में गेहूं का बफर स्टॉक इस समय आवश्यकता से दोगुना है। और युद्ध की खबरों के बीच इसे निर्यात को बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यह अवसर इस बात पर निर्भर करेगा कि युद्ध कितना लंबा चलता है। यदि एक महीने के भीतर युद्ध विराम होता है तो भारत रूस और यूक्रेन के रिप्लेस्मेंट सप्लायर के रूप में नहीं उभर सकता है।

इसका कारण है कि अंतरराष्ट्रीय समझौते लंबे समय के लिए होते हैं। क्योंकि खरीदार से जो अंतरराष्ट्रीय करार होते हैं, उसमें प्रावधान होता है कि तीन या छह महीने तक सप्लाई में देरी होने के बाद ही करार खत्म हो सकता है। उस परिस्थिति में कोई अन्य देश इसमें प्रवेश कर ले इसकी संभावना नहीं है।

नई मांग को पूरा करने के लिए भविष्य में भारत के लिए अवसर

लेकिन नई मांग को पूरा करने के लिए भविष्य में भारत के लिए अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। गेहूं की बात करें तो इसमें 10 से 15 प्रतिशत तक का अवसर भारत के लिए पैदा हो सकता है। मनोवैज्ञानिक असर के कारण घरेलू बजार में कीमतें न बढ़ें, इसके लिए सरकार अपने पास उप्लब्ध पर्याप्त स्टॉक की जानकारी सार्वजनिक कर सकती है। उससे लोगों में भय की स्थिति नहीं बन पाएगी।

इसके अलावा कीमतों को कम करने के लिए नेफेड या एफसीआई के पास उप्लब्ध स्टॉक को भी लाया जा सकता है। भारत ने जिन अन्य देशों से आपूर्ति के लिए करार किया है या करने की प्रक्रिया में है उसे बताया जा सकता है। यदि सरकार चाहे तो कीमतों पर हाल में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। Russia-Ukraine War:

 

 

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