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भारत छोड़ो आंदोलन की चेतना के मायने –पहली किस्त

August 10, 2020
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अगस्त क्रांति के नाम से मशहूर और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर माने जाने वाले भारत छोड़ो आंदोलन की 78वीं सालगिरह 9 अगस्त 2020 को थी। भारतीय जनता की स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा से प्रेरित इस महत्वपूर्ण आंदोलन की 75वीं सालगिरह तीन साल पहले 9 अगस्त 2017 को मनाई गई थी।

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उस मौके पर प्राय: सभी राजनीतिक पार्टियों ने अगस्त क्रांति के शहीदों की याद में कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया था। अभी तक इसकी सही जानकारी नहीं है कि अगस्त क्रांति में कितने लोग शहीद हुए थे।

डॉ. राममनोहर लोहिया द्वारा वायसराय लिनलिथगो को लिखे पत्र के मुताबिक ब्रिटिश हुकूमत ने पचास हजार देशभक्तों को मारा था और उसके कई गुना ज्यादा लोग घायल हुए थे। 75वीं सालगिरह के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत छोड़ो आंदोलन की चेतना (स्पिरिट) को फिर से जिंदा करने का आह्वान करते हुए गांधी के नारे ‘करो या मरो’ को बदल कर ‘करेंगे और करके रहेंगे’ नारा दिया।

यह नारा उन्होंने 2022 तक ‘नया भारत’ बनाने का लक्ष्य हासिल करने के लिए दिया था। यह कहते हुए कि 2022 में भारत की आज़ादी के 75 साल पूरे होंगे और भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं सालगिरह की याद का उपयोग आज़ादी की 75वीं सालगिरह तक नया भारत बनाने के लिए किया जाना चाहिए।

ऐतिहासिक तथ्यों, जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का विरोध भी शामिल है, के आधार पर विवेचना करें तो प्रधानमंत्री के नए भारत और उसके लिए किये गए आह्वान की भारत छोड़ो आंदोलन की चेतना के साथ संगति नहीं बैठती।

क्योंकि बार-बार महिमामंडित किये जाने वाले नए भारत की सोच का भारत छोड़ो आंदोलन की मौलिक चेतना के साथ कोई रिश्ता नहीं है। प्रधानमंत्री का नया भारत एक उधार के कच्चे-पक्के डिजिटल सेटअप में एक ठहरी हुई मानसिकता को फिट करना है, जिसे अक्सर ‘मनुवाद’ कह दिया जाता है।

यह नया भारत देश के संविधान, संप्रभुता और संसाधनों की कीमत पर बनाया जा रहा है। जबकि देश का संविधान, संप्रभुता और संसाधन औपनिवेशिक सत्ता से आज़ादी पाकर हासिल गए किये थे. भारत छोड़ो आंदोलन अनेक कुर्बानियों से हासिल की गई उस आज़ादी का प्रवेशद्वार कहा जा सकता है।

प्रधानमंत्री के लिए यह सोचना स्वाभाविक है कि भारत छोड़ो आंदोलन सहित आज़ादी के संघर्ष की चेतना का तभी कोई अर्थ है, जब उसका इस्तेमाल नया भारत बनाने में किया जाए। ऐसा आज़ादी की चेतना को नव-उपनिवेश्वादी गुलामी की चेतना में घटित करके ही संभव है।

उनके आह्वान में यह स्पष्ट अर्थ पढ़ा जा सकता है कि आज़ादी के संघर्ष की ‘गलत’ चेतना को सही (करेक्ट) करने का समय आ गया है; कि आरएसएस दूरदर्शी था, जिसने एक ‘गलत चेतना’ से प्रेरित आज़ादी के संघर्ष का उसी दौरान विरोध किया था।

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