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निजीकरण के लिए आतुर क्यों है सरकार?

October 7, 2020
Privatization

Privatization

(Privatization) निजीकरण पर भारी बिजली कर्मचारियों की एकजुटता

(Privatization) बिजली विभाग के निजीकरण का फैसला टल गया है। क्योंकि बिजली कर्मचारियों ने कमाल की एकजुटता दिखाई है। तो सवाल यह है कि सरकार निजीकरण को आतुर  क्यों है?

श्रीकांत सिंह


नई दिल्ली। (Privatization) निजीकरण पर लगाम लगाने का एकमात्र उपाय है एकजुटता। जनता एकजुट हो जाए तो उसके खिलाफ सरकार एक कदम नहीं चल सकती। उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग के निजीकरण पर लगाम लगना इसी का पहला उदाहरण है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड को निजी हाथों में देने का फैसला फिलहाल आगे के लिए टाल दिया गया है। बिजली कर्मचारियों और अभियंताओं का काम छोड़ो आंदोलन भी खत्म हो गया है।

जाहिर है कि सरकार अपने कदम से पीछे हटी है। इसका मतलब यह हुआ कि या तो सरकार गलत थी। या आंदोलन के दबाव में आ गई है। जो भी हो, आखिर सरकार निजीकरण को क्यों आमादा है? यह सवाल हर किसी के जेहन में उठ रहा है। जानते हैं कि सच क्या है?

निजीकरण समर्थकों की बात

निजीकरण समर्थकों की बात पहले करते हैं। उनका मानना है कि निजी बाजार कारक अधिक कुशल होते हैं। अधिक कुशलता से माल और सेवा उपलब्ध करा सकते हैं। इसलिए समय के साथ कीमतें कम होंगी। गुणवत्ता में सुधार होगा। अधिक विकल्प मिलेंगे। भ्रष्टाचार कम होगा। लाल फीताशाही नहीं होगी और त्वरित वितरण होगा।

कई समर्थक यह तर्क नहीं देते कि हर चीज का निजीकरण हो। उनके मुताबिक, बाजार की विफलता और प्राकृतिक एकाधिकार समस्याजनक है। अराजक-पूंजीपति चाहते हैं कि रक्षा और विवाद समाधान सहित राज्य के हर कार्य का निजीकरण होना चाहिए।

निजीकरण के लिए बुनियादी तर्क यह दिया जाता है कि सरकारों के पास कम प्रोत्साहन होते हैं। राज्य के एकाधिकार में तुलना की कमी एक समस्या है। तुलना के लिए प्रतियोगी के उपस्थित न होने से यह कहना कठिन होता है कि उद्यम कुशल है या नहीं।

दूसरे यह कि केंद्र सरकार को इतने सारे उद्यमों की क्षमता का मूल्यांकन करने में कठिनाई होती है। निजी मालिक को निश्चित औद्योगिक क्षेत्र के बारे में अधिक ज्ञान होता है। वह मूल्यांकन कर सकता है। कम संख्या के उद्यमों में अधिक कुशलता से प्रबंधन को दंडित या पुरस्कृत कर सकता है। जबकि सरकारें कराधान या केवल मुद्रा के मुद्रण से धन जुटा सकती हैं।

 निजीकरण का विरोध क्यों?

(Privatization) निजीकरण के विरोधी मानते हैं कि सरकारी प्रतिनिधि के मालिक होने से लोगों के प्रति जवाबदेही होती है। सरकार के पास प्रोत्साहनों की कमी नहीं है। जो सरकार राष्ट्रीयकृत उद्यमों को खराब ढंग से चलाएगी, वह लोगों का समर्थन और मत खो देगी।

उद्यमों को अच्छी तरह चलाने वाली सरकारों को लोगों का समर्थन मिलेगा। लोकतांत्रिक सरकारों के पास भी चुनावों के दबाव में राष्ट्रीयकृत कंपनियों में अधिकतम दक्षता बढ़ाने के रूप में प्रोत्साहन उपलब्ध हैं।

निजीकरण के कुछ विरोधियों का मानना है कि कुछ सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं को मुख्य रूप से सरकार के हाथ में रहना चाहिए। ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की उन तक पहुंच हो सके। जैसे कानून प्रवर्तन, बुनियादी स्वास्थ्य और बुनियादी शिक्षा।

इसी तरह कुछ निजी वस्तुओं और सेवाओं को निजी क्षेत्र के हाथों में रहना चाहिए। जब सरकार बड़े पैमाने पर समाज के लिए सार्वजनिक माल और सेवाएं उपलब्ध कराती है, तो एक सकारात्मक बाध्यता होती है। जैसे रक्षा और रोग नियंत्रण। इन्हें राज्य द्वारा प्रशासित करना ही बेहतर है।

अब कोई फैसला 15 जनवरी को

निजीकरण पर अब 15 जनवरी को कोई फैसला किया जाएगा। बिजली कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति और कैबिनेट उप-समिति के बीच बातचीत में निजीकरण का प्रस्ताव वापस लेने पर सहमति बनी है। इसी आधार पर संघर्ष समिति और पावर कार्पोरेशन प्रबंधन के बीच समझौते पर दस्तखत कर दिए गए हैं।

इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मंत्रियों और आला अधिकारियों की बैठक हुई थी। बातचीत में सहमति बन गई थी। लेकिन अरविंद कुमार के समझौते पर दस्तखत करने से इनकार कर देने की वजह से टकराव बढ़ गया था।

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