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Opposition to SIR: एसआईआर के खिलाफ तीन राज्यों ने खोला मोर्चा

infopost October 28, 2025
Opposition to SIR

Opposition to SIR: भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन-SIR) के दूसरे चरण की घोषणा के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है।

Opposition to SIR: विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया

इंफोपोस्ट न्यूजडेस्क

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Opposition to SIR: आयोग ने 27 अक्टूबर को 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस अभियान की शुरुआत की पुष्टि की, जिसमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत कई क्षेत्र शामिल हैं। इस अभियान का उद्देश्य मतदाता सूचियों को साफ-सुथरा बनाना बताया जा रहा है, लेकिन विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार देते हुए जोरदार विरोध शुरू कर दिया है।

विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल की सत्ताधारी पार्टियों ने मोर्चा खोल दिया है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने घोषणा की कि SIR का दूसरा चरण 4 नवंबर से शुरू होगा और तीन महीनों में पूरा होगा। इस चरण में लगभग 51 करोड़ मतदाताओं को कवर किया जाएगा।

ड्राफ्ट मतदाता सूची 9 दिसंबर को प्रकाशित होगी

ड्राफ्ट मतदाता सूची 9 दिसंबर को प्रकाशित होगी और अंतिम सूची 7 फरवरी 2025 तक तैयार हो जाएगी। आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया 2003 को कट-ऑफ वर्ष मानकर पुरानी या फर्जी प्रविष्टियों को हटाने पर केंद्रित है, ताकि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष बने। बिहार में पहले चरण के अनुभव के आधार पर यह विस्तार किया जा रहा है, जहां लाखों नामों का सत्यापन हुआ।

आयोग ने जोर दिया कि यह नियमित अभियान का हिस्सा है, न कि किसी राजनीतिक मंशा से प्रेरित। हालांकि, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के माध्यम से केंद्र सरकार और ईसीआई पर निशाना साधा। उन्होंने SIR को ‘मतदाताओं के अधिकारों पर हमला’ बताते हुए विशेष सत्र बुलाने की योजना बनाई।

भाजपा को फायदा पहुंचाने की साजिश

टीएमसी का आरोप है कि यह अभियान गरीब, अल्पसंख्यक और प्रवासी मजदूरों के नाम हटाने का बहाना है, जो मुख्य रूप से विपक्षी समर्थकों में शुमार हैं। अगस्त में ही बंगाल विधानसभा ने इस मुद्दे पर प्रस्ताव पारित कर केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोला था। ममता ने कहा, ‘यह चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर सवाल उठाता है और भाजपा को फायदा पहुंचाने की साजिश है।’

विपक्षी नेता संजय राउत ने भी महाराष्ट्र से समर्थन देते हुए सड़क प्रदर्शनों की चेतावनी दी।तमिलनाडु में डीएमके सरकार ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने सभी दलों की बैठक बुलाई और SIR को ‘वोट चोरी की साजिश’ करार दिया। डीएमके का दावा है कि यह अभियान असम को छोड़कर चुनिंदा राज्यों में हो रहा है, जो चुनावी लाभ के लिए डिजाइन किया गया लगता है।

केरल में वाम मोर्चा सरकार ने भी SIR का विरोध किया

पार्टी ने कार्यकर्ताओं से सतर्क रहने को कहा और ईसीआई से पारदर्शिता की मांग की। तमिलनाडु में अगले साल अप्रैल-मई में चुनाव हैं, इसलिए यह मुद्दा वहां गरमाया हुआ है। डीएमके ने आरोप लगाया कि पुरानी सूचियों के आधार पर नाम काटना लाखों वैध मतदाताओं को वंचित कर सकता है, खासकर ग्रामीण और शहरी गरीब वर्ग को। केरल में वाम मोर्चा सरकार ने भी SIR का विरोध दर्ज कराया।

मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन की अगुवाई में विधानसभा में प्रस्ताव पारित हुआ, जिसमें ईसीआई के फैसले को चुनौती दी गई। लेफ्ट पार्टियों का कहना है कि यह अभियान संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है और मताधिकार के मौलिक अधिकार को प्रभावित करता है। केरल में भी चुनाव नजदीक हैं और विपक्षी दल भाजपा को इसका लाभ मिलने का डर जताया जा रहा है।

तीन मुख्यमंत्रियों ने संयुक्त रूप से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ खोला मोर्चा

Opposition to SIR: तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने संयुक्त रूप से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ईसीआई की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी बिहार के अनुभव का हवाला देते हुए चिंता जताई। बिहार में SIR से लाखों नाम हटने की आशंका के बीच महागठबंधन ने विरोध प्रदर्शन किए थे। विपक्ष का सामान्य आरोप है कि SIR का समयबद्ध तरीका चुनावी रणनीति से जुड़ा है, जबकि आयोग इसे राष्ट्रीय स्तर का सुधार बताता है।

ईसीआई ने स्पष्ट किया कि प्रक्रिया में स्थानीय बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) नाम सत्यापित करेंगे और अपील का अधिकार होगा। फिर भी, राजनीतिक तापमान बढ़ता जा रहा है। यह विवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती पर बहस छेड़ रहा है। आयोग का पक्ष है कि साफ मतदाता सूची निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करती है, जबकि विपक्ष इसे हथियार के रूप में देख रहा है। तीन राज्यों का विरोध पूरे देश में फैल सकता है। ईसीआई को अब पारदर्शिता बढ़ाने और विपक्ष के संदेह को दूर करने की चुनौती है। SIR अब राजनीतिक युद्ध का मैदान बन गया है।

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