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Nitish: क्या आत्मघात की राह पर चल पड़े हैं नीतीश ?

November 18, 2020
Nitish

Nitish: बिहार चुनाव से कम से कम अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सबक सीख लेना चाहिए। क्योंकि उन्हें नुकसान और भाजपा को फायदा हो रहा है। वह इस बात से भी कलंकित हैं कि तीसरे नंबर की पार्टी का मुखिया मुख्यमंत्री बना है। क्या यह जनादेश का अपमान नहीं है?

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Nitish: किसका घर जलाने के लिए चिराग का इस्तेमाल?

चरण सिंह

नई दिल्ली। Nitish: जिस तरह से भाजपा ने बिहार चुनाव में फिर से नीतीश कुमार को एहसास कराया उससे उन्हें सबक लेना चाहिए। चिराग पासवान को जदयू के वोट काटने के लिए भाजपा ने ही लगाया हुआ था। लोकसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार को अपमान झेलना पड़ा था।

लोकसभा चुनाव जीतने के बाद माना जा रहा था कि जदयू को ठीक ठाक मंत्रालय मिलेंगे। पर क्या हुआ? भाजपा ने नीतीश कुमार को कोई खास तवज्जो नहीं दी। अब जब बिहार में विधानसभा चुनाव हुआ तो भाजपा नेताओं ने पहले ही कहना शुरू कर दिया था कि विधानसभा चुनाव में उनकी ज्यादा सीटें आईं तो मुख्यमंत्री भी उन्हीं का बनेगा।

नीतीश कुमार को नीचा दिखाने की साजिश

Nitish: वैसे भी भाजपा के अपने बैनरों पर प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी का ही फोटो लगाना एक तरह से नीतीश कुमार को नीचा दिखाना था। चुनावी सभाओं में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक विशेष धर्म के लोगों को घुसपैठियों की संज्ञा देकर बाहर खदेड़ने की बात पर नीतीश को उन्हें अपना भाई कह कर किसी भी कीमत न जाने देने की बात कहनी पड़ी।

ऐसे में यदि नीतीश कुमार फिर से भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनते हैं। या केंद्र में जाकर भाजपा का मुख्यमंत्री बनवाते हैं तो न केवल अपमान का घूंट पीकर रहना पड़ेगा बल्कि अपना जनाधार भी खोना पड़ेगा।

नीतीश कुमार की विचारधारा

Nitish: दरअसल, नीतीश कुमार की विचारधारा समाजवादी रही है। नीतीश कुमार भले ही कई बार एनडीए के साथ रहे पर वह भाजपा की कट्टरवादी विचारधारा का विरोध करते रहे हैं। यही वजह थी कि 2012 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का सबसे अधिक विरोध करने वाले नीतीश कुमार थे।

2015 में राजद के साथ सरकार बनाने के बाद गैर संघवाद का नारा भी नीतीश कुमार ने एक तरह से मोदी के विरोध में ही दिया था। ऐसे में फिर नीतीश का एनडीए के साथ सरकार बनाना उनके संगठन के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

भाजपा को 74 और जदयू को 43 सीटें

बिहार विधानसभा चुनाव की 243 सीटों के परिणाम में भले ही एनडीए को 125 और महागठबंधन को 110 सीटें मिली हैं। पर नीतीश कुमार को यह देखना होगा कि भाजपा को 74 और जदयू को 43 सीटें ही मिली हैं। यह परिणाम उनका अपनी विचारधारा और अपने वोटबैंक से विश्वासघात के कारण सामने आया है।

Nitish: नीतीश कुमार को समझना होगा कि उनके भाजपा के साथ जाने पर उनका खुलकर विरोध करने वाली CPI ML को 12, CPI एवं CPM को दो-दो सीटों पर जीत मिली है। इन चुनावों में लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव हार कर भी जीते हैं।

राजद फिर बनी सबसे बड़ी पार्टी

उन्होंने अपने दम पर राजद को फिर से सबसे बड़ी पार्टी बना दिया। वे ही इन चुनाव के हीरो माने जा रहे हैं। ये चुनाव परिणाम नीतीश कुमार के लिए एक सन्देश लेकर आए हैं कि वे अपनी विचारधारा की ओर लौटें।

नीतीश कुमार के एनडीए के साथ चले जाने पर उनकी जगह तेजस्‍वी यादव ने कब्ज़ा ली है। तेजस्वी यादव पिछड़े वर्ग में नेता बन कर उभरे हैं। चुनाव में नीतीश कुमार का वोटबैंक उनसे छिटका है।

एनडीए से अलग रहने पर नीतीश कुमार का चेहरा विपक्ष में सबसे मजबूत माना जाता था। यह माना जा रहा था कि मोदी को टक्कर देने वाला देश में एकमात्र नेता नीतीश कुमार हैं। क्या हुआ एनडीए के साथ जाने पर?

छांट दिया गया नीतीश का राजनीतिक कद

नीतीश का कद बिहार में भी घट गया। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के नीतीश कुमार के राष्ट्रीय राजनीति में आकर तेजस्वी यादव को आशीर्वाद देने की बात को भले ही मजाक में लिया जा रहा हो। पर उनका यह ट्वीट धर्मनिपेक्षता और नीतीश कुमार के साथ ही उनकी पार्टी के हित में है। मोदी ने बड़ी चालाकी से नीतीश कुमार का कद छांटा है।

क्या नीतीश कुमार इन परिस्थितियों में मुख्यमंत्री पद को ससम्मान चला पाएंगे? मुख्‍यमंत्री बनने के बाद अब उन्हें भाजपा के दबाव में काम करना पड़ेगा। अब नीतीश कुमार के लिए सत्ता मोह को छोड़ कर विपक्ष की राजनीति करने का समय है।

उन्हें अब एनडीए से नाता तोड़ देना चाहिए। ऐसे में वे फिर से विपक्ष के राष्ट्रीय नेता बन जाएंगे। इसका फायदा उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में मिलेगा। ऐसे में वे कांग्रेस और भाजपा से इतर तीसरे मोर्चे के नेता बन सकते हैं।

कांग्रेस को पचा नहीं पाते लोग

बिहार चुनाव से ही साबित हो गया है कि कांग्रेस को आज भी जनता पचाने को तैयार नहीं है। चुनाव का रिजल्‍ट घोषित होने के बाद नीतीश कुमार को भी इस बात का एहसास हो रहा होगा कि उन्‍होंने क्‍या खोया क्‍या पाया।

बिहार में इस बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि नीतीश कुमार ने देश में बिहार की एक अलग छवि पेश की है। विकास भी किया है, लेकिन अब की राजनीति में विकास के साथ-साथ जातिगत गणित भी ज्‍यादा मायने रखता है।

लोहिया, जेपी के चेले यदि कांग्रेस या फिर भाजपा के साथ हाथ मिलाएंगे तो वे कमजोर ही होंगे। जैसे तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनने से कांग्रेस ने रोका है। कांग्रेस ने बिहार में भी अपने पुराने ढर्रे पर चुनाव लड़ा। शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे और शरद यादव की बेटी को कांग्रेस के टिकट देने का क्या मतलब था?

तेजस्वी ने अपने ही पैर पर मार ली कुल्हाड़ी

तेजस्वी ने कांग्रेस को 70 सीटें देकर अपने पैरों पर खुद ही कुल्‍लाड़ी मार ली। ऐसा ही उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने भी किया था। 403 सीटों में कांग्रेस को 105 सीटें दे दी थी। खुद 298 पर चुनाव लड़ा था। उस वक्‍त भी कांग्रेस मात्र 7 सीटों पर सिमट गई थी।

नीतीश को यह भी समझ लेना चाहिए कि भले ही अब वे मुख्यमंत्री बन जाएं पर आने वाले समय में नीतीश के प्रति भाजपा के बोल बिगड़ भी सकते हैं।

भाजपा के कई नेताओं को इस बात का मलाल है कि उनकी सीटें ज्‍यादा होने के बाद भी कम सीटें पाने वाले नीतीश कुमार मुख्‍यमंत्री बन रहे हैं। पहले नीतीश कुमार बड़े दल के नेता थे। अब भाजपा उनसे ज्‍यादा सीटें ले आई है।

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