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मनमोहन सिंह नवउदारवाद की ब्रांडेड मशीन

August 22, 2020
A2


गंभीर समझे जाने वाले बुद्धिजीवियों को यह बताना चाहिए था कि प्रधानमंत्री के भाषण में स्वतंत्रता की पूर्णता और मजबूती के लिए क्या कहा गया है; उस लिहाजा से दोनों के भाषणों में कोई फर्क नहीं था। दोनों नवउदारवाद की प्रतिष्ठा को स्वाभाविक कर्म मान कर बोले। संविधान की कसौटी पर दोनों के भाषण अवैध थे।

दोनों में अंतर यही है कि मनमोहन सिंह नवउदारवाद की ब्रांडेड मशीन हैं, जो सीधे विश्व बैंक से खिंच कर आई है और मोदी आरएसएस के कारखाने में ढल कर निकली ‘देसी’ मशीन है। दोनों में बाकी सब समान है।

मोदी को मुसलमान ‘पिल्ले’ नजर आते हैं तो मनमोहन को किसान निठल्ले। वे हैरानी से पूछते हैं कि किसान खेती (यानी आत्महत्या) क्यों करते हैं! कोई और काम क्यों नहीं कर लेते; पहले से ही कई करोड़ नौजवानों और अधेड़ों की बेरोजगार सेना जमा होने के बावजूद एक मशीन ही ऐसा कह सकती है, जिसमें संदेश पहले से फीड किया गया हो!

मोदी की भर्त्स ना का खास मतलब नहीं है। मोदी को लाने वालों में सबसे पहला नाम मनमोहन सिंह का है। आरएसएस बाद में आता है। मोदी जिस संगठन से आते हैं, उसने आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया।

मौका पड़ने पर अंग्रेजों का साथ दिया। वह पुराना किस्सा है। लेकिन मनमेाहन का नया कमाल देखने के लायक है। उन्होंने और सोनिया गांधी ने मिल कर आजादी के संघर्ष की पार्टी को नवसाम्राज्यवादी गुलामी की पार्टी में तब्दील कर दिया है। बेहतर होता कि स्वतंत्रता दिवस पर बुद्धिजीवी यह सच्चाई जनता को बताते।

हमने एक ‘समय संवाद’ में लिखा था, “मिश्रित अर्थव्यवस्था के करीब तीस सालों के दौर में जो साम्राज्यवादी बीज दब गया था उसने अस्सी के दशक में राजीव गांधी की छाया पाकर फूलना शुरू किया। नब्बे के दशक में उसने एक बार फिर से जड़ पकड़ ली और इक्कीसवीं सदी का जयघोष करते हुए उसकी कोपलें खिल उठीं।

आज साम्राज्यवाद की संतानें ऐसा जता रही हैं मानो वे सदियों पुराना वटवृक्ष हैं। जैसे 1857 और 1947 हुआ ही नहीं था। अगले पचास साल भी नहीं लगेंगे, जब साम्राज्यवाद की संतानें कहेंगी कि 1947 होना ही नहीं चाहिए था। अगर उसका 1857 की तरह दमन कर दिया जाता तो भारत को महाशक्ति बनने के लिए 2020 का इंतजार नहीं करना पड़ता। जी हां, मनमोहन सिंह उसी साम्राज्यवादी बीज से उत्पन्न हुई संतान हैं।

साम्राज्यवाद के सांचे में जो भी समाए हुए हैं, वे मनमोहन सिंह के बच्चे हैं। उनमें छोटे बच्चे भी हैं और बड़े भी।” (‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ 2009) नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह का ही छोटा बच्चा है, जो अब बड़ा बनने के लिए मचल उठा है।

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