Loksabha Elections 2024: सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, 2024 में सभी की उम्मीदें कुछ ज्यादा ही हैं। तभी तो अयोध्या में श्री राम मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी को किसी भी कीमत पर कर दिए जाने की कवायद चल रही है। विपक्ष या यूं कहें कि इंडिया गठबंधन के घटक दलों में सीटों को लेकर एक अलग तरह की कवायद चल रही है।
Loksabha Elections 2024: मंडल और कमंडल में खिचीं तलवारें
इंफोपोस्ट डेस्क
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!Loksabha Elections 2024: पहले जानते हैं कि अबकी बार 400 पार के लिए भाजपा और उसके अनुयायी मंदिर को चुनाव के केंद्र में रखने के लिए क्या कुछ कर रहे हैं। और विपक्षी पार्टियोें को धूल चटाने के लिए किस कदर कूटनीति को अंजाम दिया जा रहा है।
शंकराचार्यों के विधि विधान के आग्रह को नजर अंदाज करते हुए 22 जनवरी को किसी भी कीमत पर अयोध्या में श्री राम मंदिर के उद्घाटन पर सत्ता पक्ष अड़ा हुआ है। बेशक भाजपा के पोस्टर ब्वाय धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भी कह दिया है कि शंकराचार्य धर्म क्षेत्र के लिए प्रधानमंत्री से कम नहीं हैं। यह सच है कि मंदिर के विरोध में कोई भी नहीं है। विरोध सिर्फ इस बात का हो रहा है कि आधे अधूरे राम मंदिर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा शास्त्र सम्मत नहीं है। विरोध में किसने क्या कहा है, इसका उल्लेख करने से आलेख काफी बड़ा हो जाएगा। इसलिए उससे संबंधित लिंक आलेख के साथ दिया जा रहा है।
विपक्ष यानी इंडिया गठबंधन की बात करें तो उसने जाति गणना, भारत न्याय यात्रा आदि को अपना चुनावी हथियार बनाया है। लेकिन उसके घटक दलों में सीट शेयरिंग पर जटिलताएं काफी बढ़ गई हैं। इस समय बिहार चर्चा के केंद्र में है, जहां 40 सीटों के 57 दावेदार बताए जा रहे हैं। विपक्ष पर आज की चर्चा बिहार के ही संदर्भ में है।
जनवरी का उत्तरार्द्ध उथल-पुथल भरा
Loksabha Elections 2024: बिहार की सियासत के लिए जनवरी का उत्तरार्द्ध उथल-पुथल भरा रह सकता है। उथल-पुथल में क्या होगा, इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। इंडिया अलायंस के दो महत्वपूर्ण घटक दलों-आरजेडी और जेडीयू के बीच फिलहाल सीटों के बंटवारे को लेकर खिचखिच दिख रही है, लेकिन बाद में यह तल्खी कौन-सा रूप अखित्यार कर ले, कहना मुश्किल है। अभी तो सिर्फ अनुमान, अटकल और अंदेशा ही बिहार में भविष्य की राजनीति की कहानी के आधार हैं।
इंडिया अलायंस में अगर अचानक तल्खी दिखाई देने लगी है तो इसके पीछे की वजह सीटों का बंटवारा है। बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं। जेडीयू जीती हुई अपनी 16 सीटों पर अड़ी है। उसने किशनगंज की सीट पर भी अपनी दावेदारी कर दी है, जहां उसका प्रत्याशी 2019 के लोकसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रहा था।
कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार इस सीट पर जीत की हैट्रिक लगाई। जेडीयू प्रत्याशी महमूद अशरफ डेढ़ लाख वोटों से हार गए थे। जेडीयू ने जिन 17 सीटों पर दावा ठोंका है, उनमें भागलपुर, बांका, सीतामढ़ी, वाल्मीकि नगर, मधेपुरा, गोपालगंज, जहानाबाद, सुपौल, कटिहार, नालंदा, सीवान, काराकाट, मुंगेर, झंझारपुर, पूर्णिया, गया शामिल हैं।
आरजेडी का कोई सांसद नहीं, फिर भी चाहिए 17 सीटें
आरजेडी का 2019 के लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुला था। अब चूंकि आरजेडी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है। इसलिए उसने भी 17 सीटों पर दावा ठोंक दिया है। आरजेडी को अररिया, बक्सर, नवादा, पाटलिपुत्र, सारण, उजियारपु, शिवहर, जमुई, महाराजगंज, पूर्वी चंपारण, हाजीपुर, दरभंगा, वैशाली, मधुबनी, मधेपुरा, गोपालगंज और भागलपुर की सीट चाहिए। इंडी अलायंस के तीसरे घटक कांग्रेस ने जिन 10 सीटों की मांग की है, उनमें पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार, सुपौल, समस्तीपुर, सासाराम, औरंगाबाद, मधुबनी, नवादा और बेतिया हैं। कांग्रेस इनमें सिर्फ किशनगंज की एक सीट जीत पाई थी।
सीपीआई (एमएल) और सीपीआई ने तो अपनी आठ सीटों की दावेदारी पेश कर दी है, लेकिन सीपीआई (एम) ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि हिस्सा वह भी चाहती है। आरा, सीवान, काराकाट, जहानाबाद और पाटलिपुत्र की पांच सीटें सीपीआई (एमएल) मांग रही है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने तीन सीटों की मांग की है, जिनमें बेगूसराय, बांका और मधुबनी हैं। सीपीआई ने पिछली बार जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बनाया था। राजद और सीपीआई उम्मीदवार के झगड़े में बेगूसराय सीट से भाजपा के गिरिराज सिंह ने बाजी मार ली थी। सीपीआई (एम) को भी लोकसभा की सीट चाहिए। हालांकि अभी तक उसने सीटों की कोई सूची नहीं सौंपी है।
लोकसभा की कुल 40 सीटें पर 54 हैं दावेदार
सवाल यह है कि बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें ही हैं। सबकी दावेदारी की सीटें जोड़ दें तो संख्या 54 हो जाती है। कई सीटें तो ऐसी हैं, जहां दो-दो दल दावा कर रहे हैं। सीवान की सीट ऐसी ही है। अभी सीवान से कविता सिंह जेडीयू सांसद हैं। भाकपा माले भी सीवान सीट मांग रही है। भागलपुर सीट पर तनातनी है। आरजेडी और जेडीयू दोनों इस सीट पर दावा कर रहे हैं। बेगूसराय सीट भाकपा और आरजेडी दोनों मांग रहे हैं। ऐसी कई सीटें हैं, जिन पर घटक दल अपनी-अपनी दावेदारी कर रहे हैं।
इंडिया अलायंस में सीट बंटवारे पर दो समस्याएं सामने आएंगी। पहला यह कि सबको मुंहमांगी सीटें देना संभव नहीं। यानी किसी न किसी या सबकी सीटों में कटौती करनी पड़ेगी। उसके बाद समस्या आएगी कि कौन सीट किसे दी जाए। क्योंकि कई दल एक ही सीट पर दावेदारी कर रहे हैं। इन पेचों को सुलझाना कठिन काम है। नीतीश कुमार इन बातों को समझते हैं। यही वजह है कि सीट बंटवारे की सबसे अधिक हड़बड़ी में जेडीयू ही दिखाई पड़ता है। उसके नेता लगातार जल्दी सीट बांटने की बात कह रहे हैं। उनका तर्क है कि भाजपा के खिलाफ चुनावी फतह के लिए ऐसा करना जरूरी है। केसी त्यागी, विजय चौधरी और विजेंद्र यादव जैसे नेता लगातार सीट बंटवारे में जल्दबाजी करने की बात कह रहे हैं।
नीतीश की चुप्पी से गहराया राज
इस कठिन काम का हल निकालने की जिन दो नेताओं की सबसे अधिक जिम्मेवारी है, वे आश्चर्यजनक ढंग से चुप हैं। नीतीश कुमार भी सीट शेयरिंग पर अब बोलना बंद कर चुके हैं। लालू यादव ने तो रहस्यमय चुप्पी साध ली है। राजनीतिक विश्लेषक अनुमान लगा रहे हैं कि इनकी चुप्पी किसी बड़े सियासी तूफान का संकेत है। नीतीश कुमार जब से महागठबंधन के साथ आए हैं, तब से अक्सर लालू और नीतीश की एक दूसरे के आवास पर आवाजाही होती रही है। इन दिनों दोनों की आवाजाही भी बंद है। बोल-बयान भी नहीं आ रहे, जिससे कोई पुख्ता अनुमान लगाया जा सके।
वरिष्ठ पत्रकार अमित तिवारी कहते हैं कि जनवरी का दूसरे पखवाड़े से लेकर लोकसभा चुनाव तक बिहार में बड़े सियासी उलट-फेर हो सकते हैं। बहुत हद तक इसके संकेत 22 जनवरी तक मिल जाएंगे। लालू यादव पटना में अगर जमे हुए हैं तो इसे सामान्य बात नहीं समझनी चाहिए। ऐसी सूचनाएं मीडिया में आ भी चुकी हैं कि लालू यादव अपने बेटे तेजस्वी को सीएम के रूप में देखना चाहते हैं। इसी संदर्भ में जेडीयू के दर्जन भर विधायकों के एक जगह जुटने की बात भी कही जा रही है। जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह को भी आरजेडी के करीब बताया जाता रहा है। नीतीश कुमार भी राजनीति के उसी स्कूल के विद्यार्थी रहे हैं, जहां के छात्र लालू भी रहे। इसलिए नीतीश की समझ लालू से कम होगी, यह मानना भूल होगी। यानी नीतीश कुमार भी अपनी तैयारी में जरूर लगे होंगे।
लालू और नीतीश कुमार के पास क्या विकल्प?
Loksabha Elections 2024: लालू यह कोशिश कर सकते हैं कि जेडीयू के 8-10 विधायकों को तोड़ कर तेजस्वी के समर्थन के लिए तैयार कर लें। तेजस्वी के पास अभी 115 विधायकों का समर्थन है। सीएम बनने के लिए 122 विधायकों का समर्थन चाहिए। यानी बहुमत के लिए तेजस्वी को महज सात-आठ विधायकों की जरूरत है। ऐसा हो गया तो तेजस्वी आसानी से सीएम बन जाएंगे। दल बदल का मामला आने पर आरजेडी के विधायक और विधानसभा अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी मददगार बन सकते हैं। स्पीकर बनने के बाद पहली जनवरी को पहली बार चौधरी ने लालू के घर जाकर उनसे मुलाकात भी की थी।
नीतीश कुमार का सूचना तंत्र काफी मजबूत है। यह कई मौकों पर लोगों ने महसूस भी किया है। उन्हें ऐसी गतिविधियों की जानकारी नहीं होगी, यह संभव ही नहीं। अगर ऐसी स्थिति आती है तो नीतीश अपना रंग दिखा सकते हैं। वे विधानसभा भंग कर सकते हैं, ताकि लोकसभा के साथ ही विधानसभा के भी चुनाव हो जाएं। एनडीए के साथ जाने की योजना पर भी वे काम कर रहे होंगे, ताकि फिर एक बार पुरानी दोस्ती काम आए। बहरहाल, ये सभी अनुमान हैं। जनवरी के आखिरी हफ्ते तक बिहार की स्थिति साफ हो जाएगी।


