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Labor Movement: सेंचुरी मिल के मजदूरों की कौन सुनेगा?

September 14, 2021
Labor Movement

Labor Movement: सेंचुरी मिल के हजारों मजदूर अपने हक के लिए आंदोलन कर रहे हैं। उनके संघर्ष का आज 1430वां दिन है। मिल 17 अक्टूबर 2017 से बंद है। मजदूर काम करना चाहते हैं, लेकिन मिल प्रबंधन उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना चाहता है। क्या इस रवैये से देश की अर्थव्यवस्था पांच ट्रिलियन डॉलर हो पाएगी?

Labor Movement: बिरला ग्रुप के कुमार मंगलम बिड़ला उद्योग का मामला

अंकित तिवारी

Labor Movement: मध्य प्रदेश में इंदौर-मुम्बई हाइवे पर कसरावध तहसील के सतरती गांव में एक जगह है खरगौन। जहां बिरला ग्रुप के कुमार मंगलम बिड़ला का एक बढ़ा उद्योग स्थापित है। नाम है, सेंचुरी यार्न एंड डेनिम टेक्सटाइल लिमिटेड।

इस उद्योग की स्थापना 1993 में 84 एकड़ भूमि पर की गई। बेहतरीन उत्पादन और गुणवत्ता के बल पर मिल ने नए कीर्तिमान स्थापित किए। लेकिन मजदूरों का शोषण इतना ज्यादा होने लगा कि श्रमिकों की एक के बाद एक चार यूनियनें अस्तित्व में आ गईं। और अब मजदूर अपना हक हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

क्या विधानसभा चुनावों में श्रमिक बन पाएगा मुद्दा?

मिल में ऐसे प्रदेशों के भी मजदूर काम करते हैं, जहां अगले वर्ष विधानसभा चुनाव भी हैं। यदि मजदूरों का आंदोलन लंबा खिंचा तो इसे विधानसभा चुनावों में उछाला जा सकता है। इसलिए अब मजदूरों के आंदोलन के मायने बदल गए हैं। सवाल है कि सरकार इस आंदोलन को कितना गंभीरता से लेती है।

पूंजीपतियों और श्रमिकों के बीच अधिकारों की लड़ाई कोई नई बात नहीं है। श्रम और संघर्ष की लंबी दास्तानों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। हर दौर में पूंजीपतियों ने नए-नए तरीकों से श्रमिकों को को संकट में डाला है।

आठ वर्षों से श्रमिक बदहाली में

श्रमिकों ने भी संघर्ष की अपनी रणनीति को समृद्ध किया है। बिरला ग्रुप की सेंचुरी मिल में श्रमिकों का आंदोलन जारी है, लेकिन पिछले आठ वर्षों से श्रमिक बदहाली में जी रहे हैं।

कंपनी मैनेजमेंट का कहना है कि कुछ मजदूरों को छोड़कर सभी को पूरा वेतन मिल रहा है। लेकिन ठेके पर जो मजदूर हैं, उनको कुछ भी नहीं मिल रहा है। वे अपनी जीविका किसी तरह चला रहे हैं। बड़ी संख्या में मजदूर पलायन भी कर चुके हैं।

मेधा पाटेकर की भागीदारी

अब श्रमिक आंदोलन को विस्तार देने में लगे हैं। सैकड़ों श्रमिक ट्रक और मोटरसाइकिलों में मेधा पाटेकर के घर पहुंचे और उन्हें स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने कुछ दिनों में अपनी स्थिति साफ करने का आश्वासन दिया और फिर कुछ दिन बाद आंदोलन में भागीदारी के लिए राजी हो गईं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता, लेखिका और पर्यावरणविद मेधा पाटेकर के आंदोलन की कमान संभालने से सेंचुरी मिल प्रबंधन सदमे में तो आ गया। मेधा ने पहले तो सभी यूनियनों (ए टैक, इंटैक, बीएमएस और स्वतंत्र श्रमिक एकता परिषद) को साथ लेकर आंदोलन चलाने का मन बनाया। लेकिन वाम, भाजपा और कांग्रेस की यूनियनें श्रमिक विरोधी गतिविधियों में ही लगी रहीं।

राजनीतिक दलों का क्या रुख होगा?

श्रमिक आंदोलनकारियों को मेधा ने कई व्यावहारिक तरीके सुझाए जिस पर श्रमिक मिल चलाने को राजी हो गए। कंपनी को मामला अपने हाथ से खिसकता हुआ दिखाई देने लगा। श्रमिकों को संवैधानिक हल चाहिए था और मिल प्रबंधन को हर हाल में छंटनी। मामला कोर्ट पहुंचा, कई ट्रिब्यूनल ट्रायल चले। फिर भी श्रमिकों की समस्या जस की तस है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले साल विधानसभा चुनावों के माहौल में मजदूरों के प्रति राजनीतिक दलों का क्या रुख होगा। यह मजदूरों की रणनीति पर निर्भर करेगा कि वे अपने आंदोलन को किस हद तक राजनीतिक रूप दे पाते हैं।

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