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उनके राम और अपने राम—अंतिम किस्त

August 7, 2020
Ram1

आलेख की दूसरी किस्त हाजिर है। लगभग 22 साल पुराने इस आलेख को दोबारा जारी किया जा रहा है। अब तक आप पढ़ चुके हैं अलग अलग विचारकों ने किस प्रकार राम के प्रति अपने विचार व्यक्त किए हैं। अब आगे। तुलसी ने इंद्र से होड़ लेने वाले दशरथ के भव्य भवनों का वर्णन किया है। लेकिन उनके राम लोगों के मन-मंदिर में ही बसते हैं। संघ संप्रदाय का आंदोलन अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के आह्वान पर टिका है, जिसे बनाने के लिए उन्होंने पहले ही छोटे-छोटे मंदिरों और पुजारियों का सफाया कर दिया था।

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यह विविध आस्थाओं वाले धर्म को सामीकृत करने की संघ संप्रदाय की जानी-मानी कोशिश तो है ही, हृदय के मंदिर को नष्ट करने की कोशिश भी है। आस्था यही है कि राम ने अयोध्या में जन्म लिया था। लेकिन उनके भक्तों की आस्था यह भी है कि अयोध्या वहीं है, जहाँ राम का निवास है। राम के वन-गमन पर पुरवासी ‘अवध तहाँ जहाँ राम निवासु’ कहते हुए उनके साथ चलते हैं।

राम उन्हें तमसा नदी के किनारे रात को सोता हुआ छोड़ कर आगे चले जाते हैं। पुरवासियों के पास इसका कोई विकल्प नहीं बचता कि वे राम को अपने हृदय के मंदिर में धारण करके आगे का जीवन जिएँ। तुलसी ने लिखा है, ‘सियाराममय सब जग जानी’। उन्होंने एक पल के लिए भी सीता और राम को अलग नहीं होने दिया है।

रावण की कैद में रहते हुए भी सीता हमेशा राम के पास ही रहीं। लेकिन संघ संप्रदाय ने राम को सीता से काट कर निपट अकेला कर दिया है। सीता सहित राम के जीवन से जुड़े अन्य अनेक पात्रों से उनका विच्छेद अंततः उनके भक्तों से ही विच्छेद है। और विच्छेद है सामाजिक-सांस्कृतिक परस्परता और भाइचारे का।

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ लिख कर तुलसी राम की अनंत महिमा और छवियों का बखान करते हैं। लेकिन संघ संप्रदाय ने, जिसकी उद्दाम लालसाएँ कहने को धार्मिक-सांस्कृतिक और असलियत में सांप्रदायिक-राजनैतिक हैं, राम को महज एक शत्रुहंता के रूप में घटित कर दिया है। संघ संप्रदाय के राम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए एक आम बादशाह बाबर, जो कई सदी पहले मर चुका है, और उसकी ‘औलादों’ का वध करने को सन्नद्ध हैं।

संघ संप्रदाय के मंदिर में राम की यही ‘मूरत’ विराजेगी। भेद-नीति का सहारा लेकर अंगद को फोड़ने की चाल चलने वाले रावण को अंगद जवाब देते हैं कि भेद उसी के मन में होता है, जिसके मन में रघुवीर नहीं होते।

राम का राजनैतिक इस्तेमाल करने वाले संघ संप्रदाय का सबसे बड़ा हथियार भेद-बुद्धि ही है और वह राम को भी उसी का प्रतीक बनाने पर तुला है। बल्कि उसने बना दिया है। हम धर्मनिरपेक्षतावादियों को ध्यान देना चाहिए कि मस्जिद-ध्वंस के लिए अयोध्या पहुँचा राम भक्तों के विशाल हुजूम में संघ संप्रदाय के सदस्य गिने-चुने ही होंगे।

संघ संप्रदाय का दावा हमेशा यही रहा है कि हिंदू आस्था के प्रतीक-पुरूष का मंदिर बनाने से कोई भी ताकत उसे रोक नहीं सकती। उसे दावे में दम है। मुस्लिम समुदाय को उसका साफ आदेश है कि वह रास्ते से हट जाए, वरना जो ‘राम-भक्त’ बाबरी मस्जिद को ढाह सकते हैं, वे जबरदस्ती वहाँ मंदिर भी बना सकते हैं।

प्रशासन, कानून और न्यायपालिका को वह न पहले खातिर में लाता था, न आगे लाएगा। समाज के एक अच्छे-खासे हिस्से में ‘राम-लहर’ उठा कर धर्मनिरपेक्षतावादियों की बोलती वह पहले ही बंद कर चुका है। धर्मनिरपेक्ष राज्य को भी उसने काफी कुछ अपने कब्जे में कर लिया है। जातिवादी राजनीति सांप्रदायिक राजनीति का दीर्घावधि और सकारात्मक जवाब नहीं है।

हिंदू धर्म की कट्टरतावादी धारा के वाहक संघ पर हिटलरी फासीवाद का रंग भी चढ़ा हुआ है। कट्टरता की इस दोहरी शक्ति से युक्त राम के संघावतार को रोकना है, तो धर्मनिरपेक्षतावादी नेताओं और विद्वानों को धर्म की गंभीर समझ विकसित करनी होगी। केवल संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता भर से काम नहीं चलने वाला है।

मार्क्सवादी और आधुनिकतावादी नेता और विचारक जहाँ संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के प्रति समझ और निष्ठा रखते हैं, वहीं उसके जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों की ओर से या तो विमुख होते हैं या भटकावग्रस्त।

धर्म जब तक जनता के जीवन में पैठा है तब तक उसमें निहित उदार अंतर्वस्तु को स्वीकार करते हुए उसका उपयोग आधुनिक जीवन को वैचारिक-दार्शनिक रूप से समृद्ध बनाने के कोई विकल्प नहीं है। कम से कम उसके मानवीय और सांस्कृतिक पक्ष को कुछ प्रेरणा देने के लिए धर्म को आधुनिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

कहने की जरूरत नहीं कि प्राचीन काल से आज तक दर्शन, काव्य और दूसरी ललित कलाएँ धर्म-विद्ध रही हैं। लेकिन धर्मनिरपेक्ष विचारक धर्म को महज निजी जीवन की चीज मानने से ज्यादा महत्त्व देने को तैयार नहीं हैं। ‘धर्म निजी मामला है’ यह मान्यता केवल एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करने तक ही उपयोगी है।

सामाजिक इतिहास बताता है कि धर्म वैसा निजी कभी नहीं रहा और न आज की आधुनिक दुनिया में है। भारत का ही उदाहण लें तो यहाँ सभी धार्मिक उत्सव सामूहिक होते हैं। धर्म का भले ही एक अलौकिक आकाश हमेशा बना रहा हो, जमीन पर उसमें सभ्यता के प्रत्येक चरण में अस्तित्ववान विचारधाराओं का ही संघात मिलता है।

उससे मुठभेंड़ किए बगैर आधुनिकता और प्रगतिशीलता की सम्यक विचारधारा तैयार नहीं की जा सकती। धार्मिकता का घेरा अमीर तबकों के बजाय उन गरीब तबकों के गिर्द ज्यादा सघन रूप में बुना होता है, जिन्हें आधुनिक और प्रगतिशील बनाने के लिए धर्मनिरपेक्षतावादी हलकान रहते हैं। राजेन्द्र यादव ने ‘हंस’ के अपने एक संपादकीय में आधुनिक भारत के छह मौलिक चिंतकों का उल्लेख किया था: विवेकानन्द, अरविन्द, गांधी, आचार्य नरेन्द्रदेव, राममनोहर लोहिया और (शायद) अंबेडकर।

इनमें विवेकानन्द और अरविंद नव्यवेदांत के प्रणेता माने जाते हैं। गांधी निजी जीवन में तो धार्मिक व आस्तिक थे ही, उन्होंने हिंदू धर्म सहित दुनिया के प्रायः सभी प्रमुख धर्मों पर विचार किया था। राजनीति में धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग करने के लिए धर्मनिरपेक्षतावादी उनकी आलोचना भी करते हैं। अपने को पचहत्तर प्रतिशत माक्र्सवादी मानने वाले आचार्य नरेन्द्रदेव बौद्ध धर्म के निष्णात विद्वान थे। लोहिया नास्तिक थे लेकिन उन्होंने न केवल धार्मिक प्रतीकों-प्रसंगों पर विस्तृत विचार किया है, धर्म और राजनीति के संबंध की भी विवेचना की है।

उनका कहना है, ‘‘हिन्दू धर्म में उदारता और कट्टरता की इस लड़ाई को खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि धर्म से ही लड़ा जाए।’’ अंबेडकर ने न केवल धर्म पर पर्याप्त चिंतन किया है, उन्होंने हिंदू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म ग्रहण किया। धर्म को वैचारिक दुनिया से दुत्कार कर धर्मनिरपेक्षता की न तो कोई सम्यक विचारधारा गढ़ी जा सकती है, न ही कट्टरतावादी शक्तियों के खिलाफ कारगर संघर्ष किया जा सकता है।

तुलसी के उदार राम को आज अगर नहीं बचाया गया, तो कल की पीढ़ियों के लिए संघ के संकीर्ण राम ही बच रहेंगे। बाकी आस्था प्रतीकों का भी वही हाल होना है। संघ की सूची में मथुरा में कृष्ण और काशी में शिव का नंबर राम के पीछे-पीछे चल रहा है।

पुनश्च : आरएसएस के राम-मंदिर आंदोलन में राम के बहुत से सच्चे भक्तों की भावना भी जुड़ी रही है। वे कल भव्य राम-मंदिर के लिए भूमि-पूजन से भी गद-गद होंगे। भक्त बड़ा विवेकी माना गया है। आशा की जानी चाहिए राम के सच्चे भक्त संघ के राम के बदले अपने राम की सनातन मूरत को नहीं छोड़ देंगे।

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