Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar की नियुक्ति को लेकर उठे सवाल अब चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति कानून की संवैधानिक वैधता तक पहुंच गए हैं।
Gyanesh Kumar: नियुक्ति प्रक्रिया से शुरू हुआ विवाद
इंफोपोस्ट/Gyanesh Kumar
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!Gyanesh Kumar ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला। वह 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी हैं और केंद्र सरकार में रक्षा, गृह, संसदीय कार्य तथा सहकारिता मंत्रालय सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।
उनकी नियुक्ति ऐसे समय हुई जब मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी थी। विवाद का मूल प्रश्न यह है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के शीर्ष पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया में कार्यपालिका, विपक्ष और न्यायपालिका के बीच संतुलन किस तरह कायम रहे। सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ के मतभेद के बाद इस मामले को बड़ी संविधान पीठ के लिए भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है।
Gyanesh Kumar: Anoop Baranwal मामले ने बदला था ढांचा
मार्च 2023 में Anoop Baranwal मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद द्वारा इस विषय पर कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसी समिति की सलाह पर की जाए जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। यह व्यवस्था कानून बनने तक के लिए थी।
इसके बाद संसद ने 2023 में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act बनाया। इस कानून में नियुक्ति वाली समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य को शामिल किया गया। परिणामस्वरूप तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित मंत्री, विपक्ष के नेता के साथ बैठते हैं।
विपक्ष की भूमिका को लेकर विवाद
इसी व्यवस्था को लेकर विपक्ष और याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि नई व्यवस्था से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता है और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर संस्थागत सवाल पैदा होते हैं। दूसरी ओर, कानून की वैधता का अंतिम निर्णय अभी संविधान पीठ के स्तर पर होना बाकी है। इसलिए इसे अभी असंवैधानिक घोषित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
Gyanesh Kumar और Sukhbir Singh Sandhu की नियुक्ति के समय भी चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे थे। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह आरोप लगाया गया था कि विपक्ष के नेता को चयन के लिए रखे गए नामों की पूरी जानकारी पर्याप्त समय पहले नहीं दी गई। यह भी कहा गया कि इससे चयन प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी प्रभावित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में मामला अब बड़ी पीठ के सामने
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मामला लंबे समय तक अदालत में लंबित रहा। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस चुनौती पर सुनवाई की और सितंबर 2026 में दो न्यायाधीशों की पीठ के बीच इस बात पर मतभेद सामने आया कि मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाए या नहीं। अंततः मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया, ताकि उचित संख्या वाली बड़ी पीठ गठित की जा सके।
इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि विवाद केवल किसी एक चुनाव आयुक्त की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह संवैधानिक प्रश्न है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में इस कानून की संवैधानिकता पर अंतिम फैसला आने तक अलग-अलग पक्षों के दावों को अंतिम निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
वोटर लिस्ट और तकनीकी व्यवस्था पर भी बहस
वीडियो में चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था, मतदाता सूची के प्रबंधन और अधिकारियों की डिजिटल पहुंच को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें कुछ अधिकारियों के अधिकार सीमित किए जाने और केंद्रीय स्तर पर सिस्टम के अधिक केंद्रीकृत होने जैसे दावे शामिल हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना उन्हें स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं है।
भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक व्यवस्था में मतदाता सूची का पंजीकरण, नाम की जांच, ई-ईपीआईसी डाउनलोड और अन्य चुनावी सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं। आयोग अपनी वेबसाइट पर यह भी बताता है कि वह लोकसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का संचालन करने वाली संवैधानिक संस्था है।
आधार और मतदाता सूची का मुद्दा
मतदाता सूची से जुड़े विवादों में आधार संख्या और मतदाता पहचान से संबंधित प्रक्रिया भी चर्चा में रही है। निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर मतदाता सेवाओं के अंतर्गत आधार संख्या उपलब्ध कराने का विकल्प मौजूद है। हालांकि आधार और मतदाता सूची के बीच संबंध को लेकर उठने वाले सवालों को अलग-अलग कानूनी और प्रशासनिक प्रावधानों के संदर्भ में समझना जरूरी है।
वीडियो में कुछ अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों को लेकर भी व्यक्तिगत स्तर पर आरोप लगाए गए हैं। ऐसे आरोपों को प्रमाणित करने के लिए नियुक्ति आदेश, विभागीय रिकॉर्ड, आधिकारिक जिम्मेदारियों और संबंधित न्यायिक आदेशों की जांच जरूरी है। केवल किसी अधिकारी का किसी सरकारी परियोजना से जुड़ा होना अपने आप में किसी चुनावी अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता क्यों महत्वपूर्ण है?
चुनाव आयोग की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह देश में चुनाव प्रक्रिया के संचालन से जुड़ी संवैधानिक संस्था है। आयोग की निष्पक्षता केवल वास्तविक रूप से स्वतंत्र होने पर ही नहीं, बल्कि जनता को उसकी स्वतंत्रता स्पष्ट रूप से दिखाई देने पर भी निर्भर करती है। यही प्रश्न हाल की न्यायिक बहस में भी सामने आया है।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए दो अलग-अलग मुद्दों को अलग रखना जरूरी है। पहला मुद्दा है नियुक्ति कानून की संवैधानिक वैधता और चयन समिति की संरचना। दूसरा मुद्दा है चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े विशिष्ट आरोप। पहले मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक प्रक्रिया जारी है, जबकि दूसरे मुद्दे पर प्रत्येक आरोप के लिए अलग प्रमाण और आधिकारिक रिकॉर्ड की आवश्यकता होगी।
16 चुनावों से जोड़ने के दावे पर सावधानी जरूरी
वीडियो में दावा किया गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका को देश में हुए कई विधानसभा चुनावों तथा लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जाना चाहिए। अलग-अलग चुनावों में आयोग की भूमिका पर राजनीतिक दलों ने समय-समय पर सवाल उठाए हैं, लेकिन किसी चुनाव को केवल इन आरोपों के आधार पर गलत या प्रभावित घोषित करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
इसी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव, विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव और मतदाता सूची से जुड़े विवादों को एक ही निष्कर्ष में जोड़ने से पहले प्रत्येक मामले के आधिकारिक आंकड़ों, चुनावी प्रक्रिया, न्यायिक आदेशों और उपलब्ध साक्ष्यों को अलग-अलग देखना होगा। चुनावी संस्थाओं से जुड़े विवादों में आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना लोकतांत्रिक बहस के लिए महत्वपूर्ण है।
अब आगे क्या होगा?
Gyanesh Kumar: सितंबर 2026 के घटनाक्रम के बाद 2023 के नियुक्ति कानून की संवैधानिक चुनौती पर बड़ी संविधान पीठ की संभावित सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। अदालत यह देख सकती है कि नियुक्ति समिति की मौजूदा संरचना संविधान के अनुरूप है या नहीं और चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता के लिए कौन-से संवैधानिक सिद्धांत लागू होते हैं।
Gyanesh Kumar से जुड़ा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक व्यक्ति की नियुक्ति से आगे बढ़कर चुनाव आयोग की संस्थागत संरचना पर बहस हो रही है। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि नियुक्ति कानून न्यायिक जांच के दायरे में है और इस पर अंतिम संवैधानिक फैसला अभी बाकी है। इसलिए किसी कथित साजिश, चुनावी धांधली या संस्थागत मिलीभगत को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसके प्रमाण और न्यायिक निष्कर्ष का इंतजार करना अधिक उचित होगा।


