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पूंजीवाद से लाभान्वित दलित-समाज का दायरा सिकुड़ा

August 25, 2020
A2

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दलित-विमर्श, दलित-अस्मिता, दलित-चेतना की बात करते वक्त यह ध्यान रखना जरूरी है कि दलित-समाज केवल आरक्षण के तहत अथवा अपनी मेधा से संगठित क्षेत्र में आ जाने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। दलित-समाज में सम्मान अगर केवल अफसरी से मिलता है, तो पूंजीवाद से लाभान्वित दलित-समाज का दायरा और भी सिकुड़ जाता है। (हालांकि हम संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण को पूंजीवादी व्यवस्था की देन नहीं मानते। अलबत्ता अब जो निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग की जा रही है, वह पूंजीवादी व्यवस्था की देन होगा।)

ध्यान दिया जा सकता है कि आगे बढ़े हुए दलित कभी भी दलितोत्थान के ऐसे प्रयास यानी रचनात्मक कार्य नहीं करते, जिनके चलते बाहर छूटे दलितों में शिक्षा और चेतना का प्रसार हो, उन्हें रोजगार के बारे में जानकारी, उचित निर्देशन और प्रशिक्षण मिल सके।

यह रचनात्मक काम बड़े पैमाने पर करके वे खुद पहल कर सकते हैं कि आरक्षण का लाभ लेकर कुछ हद तक सशक्तश बन चुके परिवारों के पहले अब बाहर छूटे परिवारों को आरक्षण मिले। लेकिन वे रचनात्मक काम नहीं करते। एनजीओ बनाते हैं, जो पूंजीवादी तंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं।

यह सच्चाई जानने के लिए बहुत गहराई में जाने की जरूरत नहीं है कि दलित पूंजीवाद की बात करने वाले पूंजीवाद के पहलवानों के प्यादे ही रह सकते हैं। पूंजीवाद ने कितनी गहरी पैठ बनाई है और सवर्ण भारत के कितने लोग यूरोप-अमेरिका तक जमे हैं, उनमें टूटी-फूटी अंग्रेजी और गांठ में चवन्नी लेकर शामिल नहीं हुआ जा सकता।

जाति को लेकर जाने पर बड़ी जाति वहां पहले से मौजूद है। जिस जाति को सदियों से छोटा बनाया गया हो, उसे सदियों से बड़ी जाति के मुकाबले कभी भी खड़ा नहीं किया जा सकता। अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित जाति निर्मूलन ही उसका उपाय है।

सशक्ता दलितों द्वारा पूंजीवाद की पूजा, दरअसल, दलित-समाज के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ की साधना है। यह प्रवृत्ति बाकी जाति समूहों में भी देखी जा सकती है और यह पूंजीवाद की देन है। समता विरोधी ब्राह्मणवाद की जितनी निंदा की जाए, कम है। लेकिन उसके साथ दलित-समाज में ही विषमता बढ़ रही हो तो समझ लेना चाहिए खोट कहीं और भी है।

सत्ता पाकर मद में आ जाना केवल सामंतवाद-ब्राह्मणवाद की मूल विशेषता नहीं है। जैसे भारत के अगड़े समाज को हजारों साल गुलाम रहने के कुछ कारण अपने चरित्र में खोजने चाहिए, उसी तरह वर्ण-व्यवस्था के गुलाम बनाए गए पिछड़े और दलित-समाज को भी आत्मालोचन करने की जरूरत स्वीकार करनी चाहिए।

हम फुले-अंबेडकर से लेकर आज तक के दलित विचारकों की ‘अंग्रेज-भक्ति’ का बुरा नहीं मानते। जो मानते हैं उन्हें देख लेना चाहिए कि यह अंग्रेज-भक्त सवर्ण समाज ही था, जिसने 200 साल तक उन्हें यहां काबिज बनाए रखा। कई लाख भारतीयों की हत्या के बाद उन्हें अपनी ‘प्रजा’ का दर्जा देने आईं इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की शान में पढ़े गए कसीदे देख लेने चाहिए।

अंग्रेजों के भारत में आने और उपनिवेश कायम करने में दलितों की कोई भूमिका नहीं थी। लेकिन अगर दलित विचारक पूंजीवाद के पक्के पक्षधर बनते हैं, तो उसके साथ अंबेडकर का नाम ज्यादा दिन नहीं चल सकता है। अंबेडकर पूंजीवाद के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने निजी क्षेत्र में आरक्षण की न बात की, न संविधान में प्रावधान किया। वे चाहते थे कि जल्दी ही समता मूलक आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था बने और आरक्षण की जरूरत न रहे।

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