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कारपोरेट इंडिया की सत्ता और आरएसएस

August 21, 2020
A2


नवउदारवादी दौर में बने निगम भारत (कारपोरेट इंडिया) की सत्ता पर आरएसएस जब-जब धावा बोलता है, तब-तब सेकुलर खेमे के बुद्धिजीवी उसके ‘देशद्रोही’ चरित्र को उद्घाटित करने में लग जाते हैं। ऐसा करते वक्त वे अपने को देशभक्ति और आजादी का पक्का पैरोकार होने का प्रमाणपत्र देते ही हैं, सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह और कांग्रेस को भी वह थमा देते हैं।

बार-बार दोहराई जाने वाली इस कवायद का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलता। न सांप्रदायिकता कम होती है, न नवउदारवाद थोड़ा भी पीछे हटता है। बल्कि दोनों कट्टर होते और एक-दूसरे में समाते जाते हैं। उस सम्मिलित कट्टरता के प्रहार से समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जमीन धसकती चली जाती है।

भारत के संविधान में निहित समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और संकल्प की रक्षा ही आजादी की रक्षा है। हमारी राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिकता की यही कसौटी हो सकती है। यह सही है कि आरएसएस पूंजीपतियों से सांठ-गांठ रखता है। उसका नया जमूरा नरेंद्र मोदी पूंजीपतियों के आगे नाच रहा है। लेकिन, कांग्रेस पूंजीपतियों की सबसे बड़ी करुणानिधान पार्टी है, इस सच्चाई को सेकुलर खेमा जोर देकर कभी नहीं कहता।

वह आरएसएस के ‘रहस्मय चरित्र’ की गहराइयों में काफी नीचे तक धंसता है, लेकिन कांग्रेस के ‘खुला खेल पूंजीवादी’ की तरफ से आंख फेरे रहता है। वह नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस का भी सेवक बना रहा और अब सोनिया गांधी की कांग्रेस का सेवक है। नरेंद्र मोदी बुरा है, क्योंकि कारपोरेट घरानों को रिझाने में लगा है।

सेकुलर खेमे की शिकायत वाजिब है कि मीडिया उसे पूंजीवाद का नया ब्रांड बना कर समाज के सामने परोस रहा है। लेकिन यही मीडिया नरेंद्र मोदी के पहले मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का पुरोधा बना कर जमा चुका है। सेकुलरवादियों समेत नागरिक-समाज की स्वीकृति दिला चुका है। अटल बिहारी वाजपेयी अपना अलग से पूंजीवाद लेकर नहीं आए थे। उन्होंने अपने ‘स्वदेशी’ पैर मनमोहन सिंह के ‘अमेरिकी’ जूते में ही डाले थे। नरेंद्र मोदी को भी मनमोहन सिंह लेकर आए हैं। उनका सत्ता का आपसी झगड़ा है। अमेरिका और कारपोरेट घराने जिस की तरफ रहेंगे वह जीत जाएगा।

ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी से मनमोहन सिंह किस मायने में बेहतर हैं; सिवाय इसके कि नवउदारवाद को भारत में लाने और जमाने वालों में वे अव्वल नंबर पर हैं। उसी हैसियत के चलते वे तीसरी बार प्रधानमंत्री होने के दावेदार हैं। सांप्रदायिक ताकतों को ठिकाने लगाने की कुछ ताकत अभी भारतीय जनता में बची है। लेकिन नवसाम्राज्यवाद के सामने वह लाचार बना दी गई है। जनता की यह लाचारी आगे बढ़ती जानी है। इसकी सीधी जिम्मेदारी मनमोहन सिंह और उनके सिपहसालारों की है।

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