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Collection of stories: ‘रेड फ़ायर’ में दर्ज लाल गलियारा बनने की वजह

infopost December 31, 2021
Collection of stories

Collection of stories: हिंदी साहित्य में पहली बार नक्सलवाद को केंद्र पर रखकर लिखी गई कहानियों का संग्रह “रेड फायर’शीर्षक से प्रलेक प्रकाशन मुंबई ने प्रकाशित किया है।

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Collection of stories: पहली बार नक्सलवाद केंद्रित कहानियों का संग्रह प्रकाशित

इंफोपोस्ट न्यूज

रायपुर। Collection of stories: “रेड फायर’शीर्षक से प्रकाशित संग्रह का संपादन वरिष्ठ पत्रकार रमेश कुमार “रिपु” ने किया है। उन्होंने बताया कि रेड फायर के अफसाने में ख़ौफ़ की तिजारत करने वालों की वे परछाइयां हैं, जिनकी वजह से बनता है लाल गलियारा।

नक्सलवाद को लेकर कहानियां बहुत कम लिखी गई हैं। देश के 85 लेखकों से बात करने के बाद बड़ी मुश्किल से 15 कहानियां मिली हैं। संग्रह की कहानियों में माओवाद के हर पक्ष को लेखकों ने लिखा है।

सवाल आज भी कायम है कि जंगल की देह पर किसने लिख दिया, अब यहांं से शुरू होता है ‘लाल गलियारा’! अब अबूझमाड़ में जिधर देखो ‘रेड फ़ायर’ के निशांं हैं। ‘रेड फायर’ के अफ़साने में खौफ़ की तिजारत करने वालों की वो परछाइयांँ हैं, जिनकी वजह से बनता है ‘लाल गलियारा’।

नक्सलबाड़ी से उठा नक्सलवाद का धुआं

आदिम संस्कृति की छाती पर सेंध लगाया और जंगल के अंधेरे का लिबास पहनकर माओवादियों ने बंदूकें उठा लीं। नक्सलबाड़ी से उठा नक्सलवाद का धुआं देश के गोशे-गोशे में फैल गया है। गोली एक बार इंसानियत पर और दूसरी बार प्राणों पर चली। यह कह कर कि हम जल, जंगल और जमीन के रखवाले हैं। जंगल में एक चीख निकलती है…और अठमासा बच्चे की तरह मर जाती है ज़िन्दगी..।

सी.आर.पी.एफ. के जवान शहीद होते हैं, तो ‘तिरंगे’ का सीना चौड़ा हो जाता है या कोई माओवादी मरता है, तो ‘लाल झंडा’ सलाम कहकर झुक जाता है..! किस जमीन के टुकड़े के लिए बारूद बिछाने का खेल देश के अंदर हो रहा है? न जवानों के सीने में डायनामाइट होता है और न माओवादियों के सीने में, फिर ‘रेड फ़ायर’ के निशांं बनने से किसके ख़्वाब मुकम्मल होंगे?

यह हिंसा, उग्रवाद, नक्सलवाद और दर्दों की बानगी मात्र नहीं

“रेड फ़ायर” की कहानियां हिंसा, उग्रवाद, नक्सलवाद और दर्दों की बानगी मात्र नहीं हैं, बल्कि एक जीवंत एहसास हैं। ये सच से सामना कराती हैं। जंगल में एक नई संस्कृति अट्टहास कर रही है। कदम-कदम पर मार्क्सवाद का जंगलीपन है, वहीं पुलिस, पुलिस भी नहीं है।

नक्सलवाद को केन्द्र में रख कर लिखी गई कहानियों का अनूठा संग्रह है “रेड फ़ायर”। नक्सलवाद से मिले दर्द को कलमकारों ने जब कागज़ पर उतारा, तो हर अक्षर की आँखें गीली हो गईं।

किसने छापी और कहां मिलेगी किताब?

‘रेड फ़ायर’ को किताब की शक्ल देने में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और यूपी के कलमकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

संजीव, सुरेश कांटक, मधु कांकरिया, परदेसी राम वर्मा, गिरीश पंकज, लोकबाबू, रमेश कुमार “रिपु”, कौशलेश तिवारी, श्रद्धा थवाईत, अवधेश प्रीत, राकेश कुमार सिंह, पंकज मित्र, तरुण भटनागर, ओमप्रकाश मिश्र और रश्मि गौड़ किले की कहानियां संग्रह में हैं।

किताब अमेजन पर उपलब्ध है। पाठक सीधे प्रकाशक से भी इसकी प्रति मंगा सकते हैं।
प्रलेक प्रकाशन: 91-7021263557

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