Childish policy: झूठ के बादलों के बीच सच बिजली की तरह चमकता है। तभी तो झूठ पर टिकी सत्ता की सियासत कदम दर कदम फेल हो रही है। किसान आंदोलन के संदर्भ में जो कुछ भी हो रहा है, उसी का एक उदाहरण है। भले ही सत्ता यह सोचे कि उसका कठोर कदम उसे जरूर चुनावी लाभ दे देगा।
Childish policy: अकड़ की वजह से नहीं चला प्राण प्रतिष्ठा का जादू
श्रीकांत सिंह
Childish policy: सत्ता की हरकतों पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि जैसे वह संदेश दे रही हो कि उसे किसानों, मुसलमानों, सिखों, गरीबों और मजदूरों किसी के साथ की जरूरत नहीं है। फिर किसके साथ की जरूरत है? उसे जरूरत है बेईमानों की। चंडीगढ़ में चुनावी बेईमानी का पर्दाफाश होने से यह बात एकदम क्रिस्टल क्लियर हो गई।
और तो और, अयोध्या में श्री राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के दौरान तो यह भी साफ हो गया कि सत्ता को सभी हिंदुओं की भी जरूरत नहीं है। नीतियों की जड़ता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि सनातन के सूत्रधार शंकराचार्यों तक की नहीं सुनी गई। और हिंदुओं का एक बड़ा समूह इस कदर नाराज हुआ कि प्राण प्रतिष्ठा के जरिये चुनावी लहर पैदा करने का मंसूबा धरा का धरा रह गया।
बेईमानी में अंतरराष्ट्रीय कीर्तिमान बनाने की मंशा पर फिरा पानी
दरअसल, चुनावी राजनीति का एक बहुत पुराना फार्मूला है कि आप यह संदेश दे पाएं कि येने केन प्रकारेण आप ही चुनाव जीत रहे हैं तो आपको वे भी वोट दे देते हैं, जो आपको पसंद भी नहीं करते। क्योंकि यह एक आम धारणा है कि अपना वोट क्यों बर्बाद करना? जो जीत रहा है, उसी को वोट दे दो।
जाहिर है कि सत्ता के पास इस फार्मूले के सिवा और कोई विकल्प नहीं था। तभी तो चंडीगढ़ में मेयर के चुनाव में खुलेआम बेईमानी की गई और यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि हम इतने बड़े वाले बेईमान हैं कि हमारा मुकाबला कोई और कर ही नहीं सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मंसूबे पर भी पानी फेर दिया।
तानाशाही में ग्लोबल रिकॉर्ड बनाने के लिए ली किसान की जान!
राजनीति करने के लिए जब कोई विकल्प नहीं बचता तो सत्ता तानाशाह हो जाती है। और सामने आते हैं तानाशाह नेता। आरोप लगाए जा रहे हैं कि किसान आंदोलन को हिंसा में झोंकने के लिए जब हास्यास्पद बैठकें, बैरिकेडिंग और आंसू गैस के गोले काम न आए तो एक किसान की हत्या कर दी गई। लेकिन सत्ता की बदनसीबी उसका साथ नहीं छोड़ रही है। पंजाब के किसानों ने जिस धैर्य का परिचय दिया है, सत्ता का यह भी फार्मूला डिफ्यूज होता नजर आ रहा है।
अब गांव गांव और गली गली के किसानों का विरोध सड़कों पर नजर आ रहा है। नोएडा की सैकड़ों महिलाओं ने रात नौ बजे संसद कूच किया तो पुलिस के पसीने छूटने लगे। उत्तर प्रदेश के किसान सड़कों पर नजर आ रहे हैं। पुलिस ज्यादती भी कर रही है। हरियाणा के अलग अलग क्षेत्रों में धरने पर बैठे किसानों को पुलिस धमका कर हटा रही है।
लेकिन देश के सवा सौ करोड़ लोगों को क्या तानाशाही के बल पर नियंत्रित किया जा सकता है? शायद नहीं। क्योंकि ऐसा होता तो देश कभी भी आजाद नहीं हो पाता। इसलिए सत्ता को अपनी अकड़ छोड़नी ही पड़ेगी। नहीं तो, भाजपा का वही हाल होगा जिस हालात का सामना कांग्रेस की पीढ़ियों को करना पड़ रहा है।


