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Revadi vs Revda: कहां बंटी रेवड़ी और कहां रेवड़ा?

July 18, 2022
Revadi vs Revda

Revadi vs Revda: पीएम मोदी ने फ्री की रेवड़ियों का जिक्र करके एक नई बहस छेड़ दी है। लेकिन वह रेवड़ा का जिक्र करना भूल गए। इसलिए विपक्ष उन्हें रेवड़ा की याद दिला रहा है। आज समझेंगे कि क्या होती है रेवड़ी और किसे कहते हैं रेवड़ा।

Revadi vs Revda: कॉरपोरेट का 15 लाख करोड़ माफ पर जनता की सेवा खतरनाक क्यों?

श्रीकांत सिंह

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Revadi vs Revda: राजनीति इतनी महंगी हो गई है कि आपके पास करोड़ों अरबों रुपये न हों तो आप राजनीति कर ही नहीं सकते। फिर भी इस देश में चाय बेचने वाला भी राजनीति कर रहा है और आटो रिक्शा चलाने वाला भी। फिर इतने सारे पैसे आते कहां से हैं? जानकार बताते हैं कि ये पैसे कॉरपोरेट घरानों या बिल्डरों के पास से आते हैं। तभी तो इस बड़े सवाल का जवाब सत्ता से मांगा जा रहा है कि कॉरपोरेट का 15 लाख करोड़ माफ कर दिया जाता है, लेकिन जनता की सेवा देश के लिए खतरनाक क्यों?

सवाल है कि आखिर लोग राजनीति में पैसे क्यों लगाते हैं? उत्तर है, मुफ्त का रेवड़ा पाने के लिए। राजनीति का बड़ा खेल इसी रेवड़ा पर निर्भर करता है। मुफ्त की रेवड़ियां बांट कर तो सिर्फ वोट जुटाए जाते हैं। रेवड़ी और रेवड़ा एक प्रकार की मिठाई होती है, जो तिल और चीनी से तैयार की जाती है। रेवड़ी छोटी होती है और रेवड़ा बड़ा। इसे गांव देहात में रेवरा या गट्टा भी कहते हैं। इसी को राजनीति में धन प्रबंधन का एक प्रतीक माना जाता है।

राजनीति के इर्दगिर्द घूमता है जनता के टैक्स का पैसा

दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव के प्रचार में लगभग एक लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। और राज्यों में जो चुनाव होते हैं, उस पर प्रति राज्य चालीस हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इतना भारी भरकम पैसा इस देश की राजनीति के इर्दगिर्द घूमता है। और इस पैसे को फ्री के तौर पर देखा जाता है। चुनाव प्रचार के दौरान जनता से वादा किया जाता है कि सत्ता में आ गए तो अमुक अमुक चीजें फ्री में दे देंगे।

सत्ता में आ जाने पर उन कॉरपोरेट मित्रों को पूंजी की लूट में शामिल कर लिया जाता है, जो चुनाव का खर्च वहन करते हैं। जिस पूंजी की लूट में सत्ता के नुमाइंदे और कॉरपोरेट मित्र शामिल होते हैं, वह पूंजी हमारे और आपके टैक्स के पैसे से जुटाई जाती है। कहने का मतलब आन के धन पर लक्ष्मी नरायन बन जाते हैं हमारे नेता। मुफ्त की रेवड़ियां कौन बांट रहा है और देश का खजाना कौन लुटा रहा है? इसी पर हमारे नेता मुखर हो गए हैं।

मोदी और केजरीवाल में वार और पलटवार का खेल

Revadi vs Revda: पीएम मोदी ने कहा था, आज कल हमारे देश में मुफ्त की रेवड़ियां बांट कर वोट बटोरने का कल्चर लाने की भरसक कोशिश हो रही है। ये रेवड़ी कल्चर देश के विकास के लिए बहुत घातक है। इस रेवड़ी कल्चर से हमारे देश के लोगों को खासकर मेरे युवाओं को बहुत ही सावधान रहने की जरूरत है। जवाब में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा है, मैं बताता हूं आपको फ्री की रेवड़ी क्या होती है।

वह कहते हैं, एक कंपनी होती है। उस कंपनी ने लोन लिया कई बैंकों से। खा गए ये लोन। बैंक दिवालिया हो गए। उस कंपनी ने एक खास पार्टी को चंदा दे दिया कुछ चंद करोड़ रुपये। और उस कंपनी के खिलाफ सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया। ये फ्री की रेवड़ी है। जब आप अपने दोस्तों के हजारों हजार करोड़ रुपये के लोन फ्री में माफ कर देते हैं। ये फ्री की रेवड़ी है।

कौन बांटता है फ्री की रेवड़ी और कौन फ्री का रेवड़ा?

दरअसल, रेवड़ियों का मतलब हमारे राज्यों में जो नेता चुनाव लड़ते हैं, उनका कच्चा चिट्ठा निकाले जाने पर पता चला कि उन्होंने पांच वर्षों में तीन से चार लाख करोड़ रुपये फ्री में बांट डाले हैं। लेकिन केंद्र की सत्ता की बात करें तो पिछले आठ वर्षों में 15 से 20 लाख करोड़ रुपये लुटा दिए गए। ये जनता में नहीं, कॉरपोरेट घरानों पर लुटाए गए हैं। जबकि पीएम मोदी ने फ्री की रेवड़ी को देश के लिए बहुत ही घातक बताया है।

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस देश में हर साल का जो बजट होता है उस बजट की तुलना में जो पैसा लुटाया जाता है वह इतना ज्यादा होता है कि उसकी भरपाई नहीं हो पाती और सब कुछ घाटे में चलता है। और इसीलिए देश के 28 राज्य घाटे में चल रहे हैं। केंद्र सरकार पर एक्सटर्नल कर्ज बढ़ता जा रहा है। और जितना रिजर्व में है, उससे कहीं ज्यादा केंद्र सरकार कर्ज में डूबी है। हालात कैसे बद से बदतर होते जा रहे हैं, इसे हम आगे समझते हैं।

केंद्र सरकार ने लगाया एक लाख 45 हजार करोड़ रुपये का चूना

जानते हैं कि कैसे देश के खजाने को चूना लगाया जाता है। 2019 में केंद्र सरकार ने फैसला किया कि कॉरपोरेट टैक्स को घटा दिया जाए तो निवेश बढ़ने लगेगा और उससे रोजगार का सृजन हो सकेगा। यानी नौकरियां बढ़ने लगेंगी। तभी तो पीएम मोदी ने एक झटके में 30 प्रतिशत कॉरपोरेट टैक्स को घटा कर 22 प्रतिशत कर दिया। इससे देश के खजाने को एक लाख 45 हजार करोड़ रुपये का चूना लग गया। सरकार ने उफ तक नहीं किया।

इसके ठीक समानांतर 2016 से 2019 तक चार वर्षों में जो अलग अलग राज्यों के चुनाव हुए, उन चुनावों में जो फ्री में बांटने का जिक्र कर दिया गया उसकी लागत दो लाख 22 हजार करोड़ रुपये आई। इस प्रकार केंद्र सरकार ने यदि एक लाख 45 हजार करोड़ का चूना देश के खजाने को लगाया तो चार वर्षों के विधान सभा चुनावों में फ्री में बांटकर दो लाख 22 हजार करोड़ का चूना लगाया गया।

विधान सभा चुनावों की रेवड़ियों से ज्यादा कॉरपोरेट को छूट

कॉरपोरेट टैक्स घटाने के अलावा जो कॉरपोरेट को छूट दी जाती है, वह प्रति वर्ष छह लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। 2014 के बाद 2022 तक अगर सभी राज्यों के चुनावों में बांटी गई मुफ्त की रेवड़ियों का खर्च मिला दिया जाए तो भी उसकी लागत छह हजार करोड़ रुपये नहीं बैठती। इसलिए कह सकते हैं कि मुफ्त की रेवड़ियों पर केंद्र सरकार का रेवड़ा कहीं भारी पड़ रहा है।

दरअसल, बताया जा रहा है कि कॉरपोरेट बैंक से कर्ज लेता है और उसे ब्याज पर उठा देता है। बाद में अपने को दीवालिया घोषित कर देता है। सरकार उसके कर्ज को माफ कर देती है। इस कॉरपोरेट कर्ज की माफी से देश के बैंकों यानी खजाने को जो झटका लगता है, उसका आंकड़ा उक्त छह लाख करोड़ रुपये में निहित है। और बड़े उद्योग किस प्रकार छोटे उद्योगों को निगल रहे हैं, यह एक बड़े खेल के रूप में सामने आ रहा है।

कौड़ियों के भाव बेचे जाते हैं सरकारी प्रतिष्ठान

एक और लूट की चर्चा करना जरूरी है। उसे डिस्इन्वेस्टमेंट नाम दिया गया है। इसके तहत सरकार सरकारी प्रतिष्ठानों को कौड़ियों के भाव कॉरपोरेट को बेच रही है। इसमें 60 से 70 प्रतिशत तक की छूट दी जा रही है। भला इतनी बड़ी छूट का लाभ कौन नहीं उठाना चाहेगा? उदाहरण के लिए 2020—21 में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल के लगभग 15 प्रतिशत शेयर चार हजार 923 करोड़ रुपये में बेचे गए। मार्केट में पता किया गया तो पता चला कि इस शेयर के 60 से 70 प्रतिशत अधिक दाम मिल सकते थे।

इसी प्रकार भारत डायनमिक्स, मझगांव प्राइवेट शिपयार्ड लिमिटेड, आईआरसीटीसी, रेल्टन, इरकॉन, रेल विकास निगम, कामराज एयरपोर्ट, एयर इंडिया समेत और भी तमाम सरकारी प्रतिष्ठान रेवड़ा की तरह लुटाए जा रहे हैं। एक तरफ फ्री की रेवड़ियां हैं तो दूसरी तरफ फ्री का रेवड़ा। इन दो पाटों के बीच देश की जनता पिस रही है। विधायकों की खरीद फरोख्त का जो बजट है सो अलग। सरकार ने यदि कॉरपोरेट के टैक्स को घटाया है तो आम आदमी पर टैक्स लाद दिया है। पेट्रोलियम और एलपीजी के बढ़ते दाम इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।

खजाना लुटाने के बावजूद निवेश नहीं बढ़ा, नौकरियां नदारद

सीएमआईई का डाटा कहता है कि देश में नौकरियां कम हुई हैं। जिस उद्देश्य के लिए कॉरपोरेट पर दोनों हाथों से धन लुटाया जा रहा है, वह उद्देश्य पूरा ही नहीं हो पा रहा है। अब हालात इतने ज्यादा खराब हो गए हैं कि लोग नौकरियों के बदले कुछ पैसे पर मान जा रहे हैं। शायद इसे भी मुफ्त रेवड़ियों की संज्ञा दी जा रही है।

जनता की पूंजी को कर्ज पर उठा दिया जाता है और अंत में उसे बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। आंकड़े की भाषा में बात करें, तो मोदी सरकार पिछले सात वर्षों में 10 लाख 70 हजार करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाल चुकी है। बैंकों की रिकवरी की बात करें तो एक से तीन प्रतिशत ही रिकवरी हो पाती है। सरकार जो बट्टे खाते में डालती है, वह अलग। दरअसल, मुफ्त में रेवड़ियां बांटने का दौर तमिलनाडु से शुरू हुआ था। उसमें किचन के सामान, जेवरात, साड़ियां आदि बांटने का प्रचलन था। लेकिन अब तो रेवड़ी ने रेवड़ा का रूप ले लिया है।

संपादक की नजर में क्या है समस्या का समाधान?

Revadi vs Revda:  दरअसल, फ्री की चाहे रेवड़ी हो या रेवड़ा, समस्या जस की तस रहती है। केंद्र सरकार को अब कॉरपोरेट की गुलामी से बाहर निकलना होगा। अगर कॉरपोरेट जगत नौकरियां नहीं दे पा रहा है तो उस पर देश का खजाना लुटाने से क्या लाभ? इससे तो देश की अर्थव्यवस्था ही खराब होगी और नौकरियों के हालात बद से बदतर होते चले जाएंगे। रोजगार का सृजन न हो पाने से सरकार की छवि खराब होगी। उसे चुनावों में भी नुकसान उठाना पड़ेगा।

इसलिए बेहतर यह होगा कि सरकार सरकारी प्रतिष्ठानों को बजाय बेचने के, उसे बचाने की ओर कदम बढ़ाए। क्योंकि सरकार के पास बेहतर प्रोफेशनल होते हैं। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि सरकारी प्रतिष्ठानों पर कड़ी नजर रखी जाए। वहां के काम काज को बेहतर बनाया जाए। सरकार कॉरपोरेट के भरोसे रहेगी तो वह खुद फलेगा फूलेगा, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था बर्बादी के कगार पर पहुंच जाएगी। इंफोपोस्ट के आंकड़ों से यदि आप सहमत नहीं हैं तो अपना सुझाव कमेंट बाक्स में प्रमाण के साथ साझा कर सकते हैं।

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