Skip to content
Primary Menu
  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल
Logo300

INFOPOST NEWS

The power of information

September 1, 2026

Connect with Us

  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल

Categories

  • INFOPOST PDF
  • sports
  • Uncategorized
  • अंतरराष्ट्रीय
  • आलेख
  • कारोबार
  • ख़ास ख़बर
  • तकनीक
  • दिल्ली एनसीआर
  • बोलती तस्वीरें
  • मनोरंजन
  • राज्यों से …
  • राष्ट्रीय
  • शिक्षा
  • सत्ता की सियासत
  • संस्कार
  • साहित्य
  • स्वास्थ्य
An error has occurred, which probably means the feed is down. Try again later.

  • आलेख

World Hunger Index: विश्व भुखमरी सूचकांक रिपोर्ट ने खोली मोदी सरकार के दावों की पोल!

October 18, 2021
World Hunger Index

World Hunger Index: कुपोषण-भुखमरी के मामले में पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से भी पीछे पहुंच गया है भारत। 116 देशों की लिस्ट में है 101वें नंबर पर है। पिछले साल था 94वें नंबर पर। केंद्र सरकार ने रिपोर्ट तैयार करने के तरीकों पर उंगली उठाई है।

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

World Hunger Index: सरकार करे कुछ और जनता को दिखाए कुछ और

सी.एस. राजपूत

नई दिल्ली। World Hunger Index: जो लोग देश को चला रहे होते हैं। यदि वे काम न करें। भ्रष्टाचार पर अंकुश न लगा पाएं। अपने में मस्त हो जाएं तो एक बार माफ किए जा सकते हैं। पर यदि कोई सरकार करे कुछ और जनता को दिखाए कुछ और। यह कृत्य जनता कभी माफ नहीं कर सकती।

यह कृत्य मोदी सरकार में हो रहा है। गोदी मीडिया, आईटी सेल और अपने समर्थकों से मोदी सरकार ने ऐसा माहौल बना रखा है कि जैसे देश में अब कोई समस्या रही ही नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में चल रही केंद्र सरकार देश को विकास के रास्ते पर ले जा रही है।

जहां पौष्टिक आहार की बात है तो खुद प्रधानमंत्री देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन बांटने की बात कर रहे हैं। मतलब, मोदी राज में सब भरपेट खा रहे हैं। चारों ओर राम राज है। यह मोदी सरकार का पूंजीवाद को बढ़ावा देने रणनीति का हिस्सा ही है कि नए कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए चल रहे किसान आंदोलन को बदनाम करने का हर हथकंडा सत्ता की ओर से अपनाया जा रहा है।

नई पीढ़ी के भविष्य को दांव पर लगा दिया

अपने पूंजीपति आकाओं को खुश करने के लिए श्रम कानून में संशोधन कर नई पीढ़ी के भविष्य को दांव पर लगा दिया गया है। भले ही देश के मीडिया ने लोगों को भ्रमित कर रखा है। पिछले सप्ताह जारी विश्व भुखमरी सूचकांक रिपोर्ट ने मोदी सरकार की पोल खोल कर रख दी है।

इस रिपोर्ट में भुखमरी के मामले में भारत पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से भी पिछड़ गया है। रिपोर्ट में भारत को 116 देशों की लिस्ट में 101वें नंबर पर दिखाया गया है। इससे पहले 2020 की लिस्ट में भारत 94वें नंबर पर था। ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट में भारत को अलार्मिंग हंगर कैटेगरी में रखा गया है।

भूख और कुपोषण की समस्या पर रिपोर्ट

भारत में बढ़ रही भूख और कुपोषण की समस्या पर रिपोर्ट में प्रकाश डाला गया है। भले ही आजादी के बाद कुपोषण और गरीबी में काफी गिरावट आई हो पर इसमें निरंतर वृद्धि का रुझान हाल के वर्षों में शुरू हुआ है।

दरअसल, विश्व भुखमरी सूचकांक कंसर्न विश्व व्यापी और वेथंगरहिल्फ नाम की दो गैर-सरकारी निजी संस्थाएं तैयार करती हैं। हालांकि भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को तैयार करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए तुरंत इसे अस्वीकार कर दिया है। लेकिन भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने जो आपत्तियां उठाईं, उसका माकूल जवाब वेथंगरहिल्फ ने दिया है।

जगजाहिर है कि भूख और कुपोषण का सीधा संबंध गरीबी से है। इसमें वृद्धि तब होती है, जब लोगों की आमदनी और उपभोग क्षमता में गिरावट आती है। भोजन में कटौती आदमी विषम परिस्थति में करता है। भोजन का संबंध पोषण से है।

देश में गरीबी की सूरत विकराल

केंद्र सरकार के नेशनल सैंपल सर्वे, उपभोक्ता व्यय सर्वे, लेबर फोर्स सर्वे, रोजगार-बेरोजगारी सर्वे में से किसी की हालिया रिपोर्ट आप ले लें, उन सबसे एक जैसी ही कहानी उभरती है। कुछ अर्थशास्त्रियों ने खुद इन्हीं सरकारी रिपोर्टों (जिनमें से कुछ को दबा दिया गया, लेकिन जिनकी रिपोर्टें लीक होकर मीडिया में छपीं) के विश्लेषण के आधार पर बताया है कि देश में गरीबी की सूरत विकराल हो रही है।

बावजूद इसके, मोदी सरकार ने बड़ी चालाकी से गरीबी के सवाल को सार्वजनिक चर्चा से बाहर कर रखा है। तो क्या राष्ट्रीय विमर्श को असल मसलों से हटा देने से समस्याएं खत्म हो जाएंगी? इससे तो स्थिति और बिगड़ेगी। ऐसे में चर्चा न होने के साथ ही उनका मुकाबला करने की कोशिशें भी कमजोर पड़ती जाती हैं। और आज यही हो रहा है।

सरकार ने लोगों का ध्यान हिन्दू-मुस्लिम के मुद्दे पर बांटा

दरअसल, मोदी सरकार ने लोगों का ध्यान हिन्दू-मुस्लिम के मुद्दे पर बांट रख रखा है। मीडिया में भी देश की समस्याओं से ज्यादा चर्चा पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान की होती है। यह केंद्र का जमीनी मुद्दों के प्रति उदासीन रवैया ही है कि भूख या मानव विकास के अंतरराष्ट्रीय रूप से स्वीकृत पैमानों पर भारत का दर्जा लगातार गिर रहा है।

जमीनी हकीकत यह है कि न केवल विधानसभा और संसद बल्कि मीडिया में भी गरीबी के मुद्दे पर न के बराबर चर्चा होती है। भारत में आखिरी बार व्यापक चर्चा दस साल पहले हुई थी। तब संदर्भ यह था कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने गरीबी मापने के पैमाने के रूप में अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर के पैमाने को स्वीकार किया था।

तेंदुलकर फॉर्मूले के मुताबिक, भारत के ग्रामीण इलाकों में 27.2 रुपये और शहरी इलाकों में 33.3 रुपये प्रति दिन खर्च करने की क्षमता न रखने वाले व्यक्तियों को गरीबी रेखा के नीचे बताया गया था। तब सार्वजनिक चर्चा में उचित ही इस कसौटी के न्यून बल्कि एक तरह के निर्मम स्तर को लेकर आक्रोश देखा गया।

जब गरीबी का पैमाना तय करने के लिए बनी एक नई समिति

तत्कालीन यूपीए सरकार उस आम नाराजगी के दबाव में आई। तब उसने भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर आर. रंगराजन की अध्यक्षता में गरीबी का पैमाना तय करने के लिए एक नई समिति बनाई। मगर जब तक रंगराजन समिति की रिपोर्ट आई, 2014 के आम चुनाव संपन्न हो चुके थे।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारतीय राज्य-व्यवस्था ने जो नया चरित्र ग्रहण किया, उसमें गरीबी जैसे आम इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े प्रश्नों के लिए कोई जगह नहीं बची थी। बहरहाल, रंगराजन समिति ने अपनी रिपोर्ट मोदी सरकार को सौंपी। उसने गरीबी का पैमाना गांवों में 32 रुपये शहरों में 47 रुपये प्रति दिन प्रति व्यक्ति न्यूनतम खर्च क्षमता कर दिया।

तब मीडिया रिपोर्टों में बताया गया था कि इस वृद्धि मात्र से भारत में गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले लोगों की संख्या में दस करोड़ की बढ़ोतरी दिखने लगी। यह मोदी सरकार की ढुलमुल नीति ही थी कि उसने न तो उस रिपोर्ट को स्वीकार किया और न ही उसे ठुकराने की घोषणा की। इसके विपरीत उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तब से वो रिपोर्ट और गरीबी से जुड़ी बहस दोनों ठंडे बस्ते में हैं।

तेंदुलकर और रंगराजन कमेटियों के बीच कोई फर्क नहीं

World Hunger Index: बहरहाल, यह अनुमान लगाने का तार्किक आधार मौजूद है कि रंगराजन समिति ने जो रकम में बढ़ोत्तरी की, वह पिछली आलोचनाओं के मद्देनजर थी। फिर तेंदुलकर और रंगराजन समितियों के सुझाव में लगभग पांच साल का अंतर था। तो उस दौरान बढ़ी मुद्रास्फीति का ख्याल भी उसमें किया गया होगा, जिससे स्वत: रकम में कुछ इजाफा हो जाता।

कहने का मतलब यह कि तेंदुलकर और रंगराजन कमेटियों के बीच कोई मूलभूत दृष्टि का फर्क नहीं था। दोनों का गाइडिंग प्रिंसपल (दिशा-निर्देशात्मक सिद्धांत) विश्व बैंक का फॉर्मूला था। जब तेंदुलकर रिपोर्ट आई थी, तब विश्व बैंक के फॉर्मूले के तहत क्रय शक्ति समतुल्यता के आधार पर 1.25 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति दिन न्यूनतम खर्च क्षमता गरीबी का पैमाना थी।

About Author

See author's posts

Post navigation

Previous: Health Care Using Water: जानें, सेहत के लिए कैसे करें पानी का उपयोग
Next: Oxygen Man: प्राणवायु के लिए पागल हीरो बना ऑक्सीजन मैन

Related Stories

Socio-economic landscape
  • आलेख
  • ख़ास ख़बर

Socio-economic landscape: कैसे बदला भारत 2014 से 2026 तक

infopost June 20, 2026
Digital Colonialism
  • आलेख
  • ख़ास ख़बर

Digital Colonialism: मुफ्त एआई का जाल या तकनीकी क्रांति?

infopost June 19, 2026
sugarcane bagasse
  • आलेख
  • ख़ास ख़बर

sugarcane bagasse: प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ हथियार

infopost June 18, 2026

Copyright © All rights reserved. | MoreNews by AF themes.