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Election discussion: बंगाल में भाजपा को बाहरी साबित करने की रणनीति

March 4, 2021
Election discussion

Election discussion: आठ फेज में चुनाव ममता बनर्जी के लिए बड़ी चुनौती है। 2016 के चुनाव में तीन सीट जीतने वाली भाजपा इस बार टीएमसी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानी जा रही है।

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Election discussion: पहली बार जाति फैक्‍टर

चरण सिंह राजपूत

नई दिल्ली। Election discussion: बंगाल में भाजपा के हिंदुत्व कार्ड की काट के लिए ममता बनर्जी ने भाजपा को बाहरी साबित करने की रणनीति बनाई है।

बता दें कि 294 विधानसभा सीटों वाले बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) शानदार प्रदर्शन करते हुए 211 सीटों पर जीत दर्ज की थी। पहली बार जाति का फैक्टर सामने आ रहा है।

एक ओर मतुआ समुदाय बड़ा फैक्टर उभर कर सामने आया है वहीं आदिवासी और कुर्मी समाज भी महत्वपूर्ण भूमिका में है। बंगाल में खास तौर पर नदिया और उत्तर 24 परगना जिले में लगभग डेढ़ करोड़ मतुआ समुदाय के लोग रहते हैं।

नहीं चलता बाहरी नेताओं का जादू

भले ही चुनाव में वामपंथी दल और कांग्रेस मुख्य दल हों पर इन चुनाव में भाजपा मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी बनकर उभरी है। पश्चिमी बंगाल का यह भी इतिहास रहा है कि वे लोग अपनी संस्कृति में लीन रहते हैं। बाहरी नेताओं के भाषण उन्हें ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाते हैं।

ऐसे में क्या गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंगाल की भीड़ को वोटबैंक में तब्दील कर पाएंगे? दरअसल, भाजपा बंगाल में हिदुत्व कार्ड खेलने के फिराक में है। यही वजह है कि एक सरकारी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की उपस्थिति में मंच पर जब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बोलने के लिए उठीं तो भाजपा समर्थक जय श्री राम के नारे लगाने लगे।

जय श्री राम के नारे

गृह मंत्री भी एक चुनावी रैली में जय श्री राम के नारे लगाते दिखे। भाजपा का प्रयास है कि हिंदुत्व के अलावा तमाम जातियों को भी साधा जाए। मतुआ समुदाय जो बंगाल में अनुसूचित जनजाति की आबादी का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है, उसे जोड़ने के लिए भाजपा हर संभव कोशिश कर रही है।

एक रणनीति के तहत भाजपा नेता मतुआ समुदाय के लोगों के घरों में जा जाकर भोजन कर रहे हैं। साथ ही उन्हें सीएए कानून के तहत भारत की नागरिकता दिलाने का वादा भी कर रहे हैं।


मतुआ समुदाय का बंगाल की 70 विधानसभा सीटों पर असर माना जाता है, जिनमें नदिया इलाके की 17 विधानसभा सींटें हैं और उत्तर व दक्षिण 24 परगना में 64 सीटें हैं।

बीजेपी का चेहरा मुकुल रॉय

उत्तर 24 परगना इलाके में बीजेपी का चेहरा टीएमसी से आए दिग्गज नेता मुकुल रॉय हैं तो दक्षिण 24 परगना में शांतनु ठाकुर और टीएमसी से आए शुभेंदु अधिकारी कमान संभाले हुए हैं।


साल 2016 के चुनाव में इन दोनों इलाके में टीएमसी ने क्लीन स्वीप किया था लेकिन इस बार भाजपा बड़ी चुनौती मानी जा रही है। यही वजह है कि ममता बनर्जी मतुआ समुदाय को अपने साथ जोड़े रखने के लिए तमाम जतन कर रही हैं।

भाजपा ने पहले चरण के चुनाव के लिए जंगलमहल के जिलों को चुना है, जहां पर कुर्मी और आदिवासी समाज के वोट ज्यादा हैं। यहां पर पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बढ़त मिली थी। जंगल महल में आदिवासी और कुर्मी समाज के वोट और पूर्वी मिदनापुर और दक्षिण 24 परगना में अल्पसंख्यक वोट भी मायने रखते हैं।

बाहरी बनाम बंगाली

इस बार के बंगाल चुनाव में ‘बाहरी बनाम बंगाली’ का मुद्दा भी प्रमुख रूप से सामने आया है। इसे बंगाली अस्मिता से जोड़कर देखा जा रहा है। ममता बनर्जी इसका फायदा उठाती दिख रही हैं। ममता बनर्जी BJP के नेताओं को बाहरी बताकर बंगालियों को रिझाने का प्रयास कर रही हैं।

दूसरी तरफ, इसके जवाब में बीजेपी बंगाल के महानायकों को अपने से जोड़ कर दिखाने की कोशिश में जुटी हुई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ‘बंगाल की बेटी’ के नारे के साथ पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव लड़ रही हैं।

माना जा रहा है कि टीएमसी ने इस नारे के साथ ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ के मुद्दे पर बहस को और बढ़ाया है। इस नए नारे के साथ ममता बनर्जी की फोटो वाले होर्डिंग्स पूरे कोलकाता में लगाए गए हैं।

टीएमसी ने ईएम बाईपास के पास स्थित अपने मुख्यालय से आधिकारिक रूप से इसकी शुरुआत की है। टीएमसी के महासचिव पार्थ चटर्जी ने कहा है कि ‘राज्य के लोग अपनी बेटी चाहते हैं जो पिछले कई वर्षों से सीएम के रूप में उनके साथ है। हम बंगाल में किसी बाहरी को नहीं लाना चाहते हैं।

चुनावी हिंसा भी एक बड़ा फैक्टर

भाजपा बंगाल चुनाव में इस बार चुनावी हिंसा भी एक बड़ा फैक्टर बना रही है। आठ चरणों में चुनाव होने को भी भाजपा हिंसा को रोकने के रूप में बता रही है।

पश्चिम बंगाल में हिंसा की बात की जाए तो इसकी शुरुआत 70 के दशक में तब हुई थी, जब सीपीएम उभर रही थी। फिर वह दौर भी आया जब 90 के दशक के अंतिम वर्षों में तृणमूल ने सीपीएम को चुनौती दी थी। बदला नहीं परिवर्तन चाहिए का नारा देकर ममता बनर्जी 2011 में राज्य की सत्ता प्राप्त की थी।

Election discussion: दरअसल, ममता बनर्जी पर उन्हीं हथकंडों का इस्तेमाल करने के आरोप लगे जिनके खिलाफ वो लेफ्ट से लड़ती रहीं। भाजपा तर्क दे रही है कि8 2019 के लोकसभा चुनावों में जहां देश भर से चुनावी हिंसा की छिटपुट खबरें आईं वहीं बंगाल में हिंसा की खबरें सुर्खियों में रहीं। ज्ञात हो कि जंगीपुर, मुर्शिदाबाद और मालदा में जमकर बमबाजी और गोलीबारी हुई थी।

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