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Communal harmony: … तो मिसाल बन सकते हैं फैसल खान?

November 4, 2020
Communal harmony

Communal harmony: क्या संविधान में किसी धर्म के व्यक्ति को दूसरे धर्म स्थान में जाने का अधिकार नहीं है? यदि है तो फिर कोई सरकार कौन होती है किसी को मंदिर में नमाज से रोके? या फिर किसी को मस्जिद में पूजा करने से रोके? दरअसल, सांप्रदायिक सौहार्द लिए अभियान की जरूरत है।

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Communal harmony: देश को बड़ा संदेश दे सकती है अनेकता में एकता की परंपरा

चरण सिंह


नई दिल्ली/मथुरा। Communal harmony: देश में मंदिर-मस्जिद के नाम पर राजनीतिक रोटियां लंबे समय से सेंकी जा रही हैं। पर जब से देश में मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनी है, तब से हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर समाज में नफरत का जहर घोल दिया गया है।

चाहे एनआरसी का मामला हो, सीएए का हो, संविधान के अनुच्छेद 370 का हो, राम मंदिर-बाबरी मस्जिद का हो या फिर कोरोना संक्रमण फैलने का या फिर हर मामले को हिन्दू-मुस्लिम रूप देकर लोगों को भ्रमित करने का।

लव जेहाद के नाम पर तो एक धर्म विशेष के युवाओं को टारगेट किया गया। देश के गोदी मीडिया ने तो आग में घी का काम किया। देश में जितनी रोजी-रोटी प्रभावित हुई है, उससे कहीं कम देश का भाईचारा प्रभावित नहीं हुआ है।

हर मामले में हिन्दू-मुस्लिम क्यों?

Communal harmony: देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि जिन युवाओं को अपनी कलम से लगाव चाहिए था, वे हथियारों के प्रति आकर्षित होने लगे हैं। स्थिति यह हो गई थी कि कोरोना के मामले के साथ ही ठेली-पटरी वालों में भी हिन्दू-मुस्लिम खोजा जाने लगा।

दिल्ली का दंगा इसकी बानगी है। ऐसे में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयास होने चाहिए थे। पर सत्ता के लोभी नेताओं का ध्यान इस ओर नहीं गया। बल्कि वे किसी भी तरह से सत्ता हथियाने और बचाने में लगे रहे।

दुनिया में कट्टरता के नाम पर हिंसा का खेल खेला जा रहा है। अमेरिका में नस्लीय हिंसा के साथ ही फ्रांस में धर्म के आधार पर हिंसा हो रही है। सीरिया, इराक, ईरान, पाकिस्तान, बांगलादेश खुद अपनी कट्टरता से जूझ रहे हैं।

भाईचारे का संदेश

ऐसे में भारत की अनेकता में एकता की परंपरा देश को बड़ा संदेश दे सकती है। राजनीतिक दलों के तमाम हथकंडों के बावजूद जिस तरह से हमारे देश में विभिन्न जातियों, विभिन्न धर्मों के लोग मिलजुल कर रहते हैं। ऐसे में हमारा देश पूरी दुनिया में भाईचारे का संदेश दे सकता है।

वैसे भी हमारा नारा वसुधैव कुटुम्बकम का रहा है। भले ही आज की तारीख में महात्मा बुद्ध, महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद जैसे समाज सुधारक न हों पर खुदाई खिदमतगार के अध्यक्ष फैसल खान का यह प्रयास किसी समाज सुधारक से कम नहीं है।

उनके प्रयास से प्रेरणा लेकर दूसरे लोगों को भी देश में भाईचारा बनाने के लिए इस तरह के प्रयास करने चाहिए थे। पर जिन लोगों की राजनीति ही जाति और धर्म के नाम पर चल रही हो, वे भला कैसे इस तरह के प्रयास को सफल होने दे सकते हैं?

जिस दिन इंसान में इंसान नजर आने लगे

आज की तारीख में यह शेर बहुत सटीक बैठ रहा है कि ‘जिस दिन मस्जिद में राम नजर आने लगें, जिस दिन मंदिर में रहमान नजर आने लगें। उस दिन बदल जाएगी दुनिया जिस दिन इंसान में इंसान नजर आने लगे।’ मतलब जाति और धर्म से ऊपर इंसानियत पर काम होना चाहिए।

राजनीतिक दलों ने अपने वोटबैंक के लिए हमें जाति और धर्म के नाम पर बांट दिया है। देश में हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर नफरत का जहर घोला जा रहा है। उसे मिटाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता के कारगर प्रयास होने चाहिए। मतलब देश में ऐसा माहौल बनना चाहिए कि हिन्दुओं के धर्म स्थलों पर जाकर मुस्लिम नमाज अदा कर सकें और मुस्लिमों के धर्मस्थलों जाकर हिन्दू पूजा कर सकें।

यदि समाज में ऐसा माहौल बन जाए तो समाज से नफरत खत्म होकर भाईचारे को बढ़ावा मिलेगा। जाति और धर्म के आधार पर राजनीतिक रोटियां सेंक रहे नेताओं को मुंह की खानी पड़ेगी। ऐसे में 29 अक्टूबर को फैजल खान ने अपने साथी चांद के साथ बरसाना के नंदगांव स्थित नंदबाबा मन्दिर में जाकर नमाज पढ़ी है।

मुस्लिमों को बनाया टारगेट

उनके इस काम की सराहना होनी चाहिए। ऐसे ही दूसरे संगठनों के हिन्दू नेताओं को मथुरा में ही मस्जिद में जाकर पूजा करनी चाहिए। जिससे भाईचारे को बढ़ावा मिलेगा। योगी सरकार है कि उसने तो उत्तर प्रदेश का साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कसम ही खा रखी है। उन्होंने तो जैसे मुस्लिमों को अपना टारगेट ही बना रखा है।

बताया जा रहा है कि फैसल खान कोरोना पॉजिटिव हैं। यह दूसरा मामला है। यदि वह कोरोना पॉजिटिव हैं तो उनके इस संक्रमण का पता तो टेस्ट के बाद ही चला है। इसमें भी उनका कोई दोष नहीं है। अब कोर्ट ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। ऐसे में इस विवाद के और बढ़ने की आशंका है।

जमीनी सच्चाई यह है कि जाति और धर्म के नाम पर राजनीति कर रहे संगठनों को इसी तरह के प्रयास से ही जवाब दिया जा सकता है। चाहे मोदी सरकार हो या फिर योगी सरकार। या फिर आजादी के बाद की सरकारें, सभी संविधान के अनुसार चुनाव प्रक्रिया के तहत ही बनीं।

कौन होती है कोई सरकार?

क्या संविधान में किसी धर्म के व्यक्ति को दूसरे धर्म के धर्म स्थान में जाने का अधिकार नहीं है? क्या दूसरे धर्म के व्यक्ति को किसी दूसरे धर्म के स्थल में नमाज अदा करने या फिर पूजा करने का अधिकार नहीं है?

यदि है तो फिर कोई सरकार कौन होती है किसी को मंदिर में नमाज से रोके या फिर किसी को मस्जिद में पूजा करने से रोके। अब तो पूरे देश में इसी तरह के अभियान चलाए जाने चाहिए।

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