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Kushmanda Mata: कूष्मांडा माता दूर करती हैं भय और रोग

October 19, 2020
Kushmanda Mata

Kushmanda Mata: नवरात्र के चौथे दिन देवी कूष्मांडा की पूजा की जाती है। मां दुर्गा का चौथा स्वरूप कूष्मांडा है। कूष्मांडा देवी ने अपने उदर से अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न किया।

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Kushmanda Mata: मां कूष्मांडा को प्रिय है कुम्हड़े की बलि

Kushmanda Mata

उपासना शक्ति


Kushmanda Mata: नवरात्र के चौथे दिन देवी कूष्मांडा की पूजा की जाती है। मां दुर्गा का चौथा स्वरूप कूष्मांडा है। देवी भागवत के अनुसार कूष्मांडा देवी ने अपने उदर से अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न किया। इसी वजह से दुर्गा के इस स्वरूप का नाम कूष्मांडा पड़ा।

जब चारों तरफ अंधकार था तब देवी कूष्मांडा ने ही ब्रह्मा की शक्ति के रूप में अपने उदर से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। इन्हें ही सृष्टि की आदि स्वरूपा आदि शक्ति माना जाता है। सृष्टि की रचना के बाद उसमें प्रकाश भी इन्ही के कारण आया है। ये सूर्यलोक में निवास करती हैं।

Kushmanda Mata: माता कूष्मांडा के दिव्य रूप को मालपुए का भोग लगा कर किसी भी दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए। इससे माता की कृपा स्वरूप उनके भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है।

बुद्धि और कौशल का विकास होता है। देवी को लाल वस्त्र, लाल पुष्प, लाल चूड़ी भी अर्पित करनी चाहिए। देवी योग-ध्यान की देवी भी हैं। देवी का यह स्वरूप अन्नपूर्णा का भी है। उदराग्नि को शांत करती हैं। पूजन के बाद देवी के मंत्र का जाप करें।

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे॥

अर्थात जो कलश मदिरा से भरा हुआ है, रुधिर अर्थात् रक्त से लथपथ है। ऐसे कलश को मां भगवती ने अपने दोनों कर कमलों में धारण किया है। ऐसी मां कूष्माण्डा मुझे शुभता अर्थात् कल्याण प्रदान करें।

ऐसा है मां कूष्मांडा का स्वरूप

कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं। उनमें कमंडल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में कलश भी है।

जो सुरा से भरा हुआ है और रक्त से लथपथ है। इनका वाहन सिंह है और इनके इस स्वरूप की पूजा करने पर भय से मुक्ति मिलती है। इनकी भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है। स्वास्थ्य और अभय दोनों की प्राप्ति होती है।

पूजा का महत्व

माता भय दूर करती हैं। जीवन में सभी तरह के भय से मुक्त होकर सुख से जीवन बिताने के लिए ही देवी कुष्मांडा की पूजा की जाती है। देवी कूष्मांडा की पूजा से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।

इनकी पूजा से हर तरह के रोग, शोक और दोष दूर हो जाते हैं। किसी तरह का क्लेश भी नहीं होता है। देवी कूष्मांडा को कुष्मांड यानी कुम्हड़े की बली दी जाती है। इसकी बली से हर तरह की परेशानियां दूर हो जाती हैं। समृद्धि और तेज प्राप्त होता है। अंधकार नहीं रहता है।

माता कूष्मांडा की आरती

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥

पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी माँ भोली भाली॥

लाखों नाम निराले तेरे ।
भक्त कई मतवाले तेरे॥

भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥

सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुँचाती हो माँ अंबे॥

तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥

माँ के मन में ममता भारी।
क्यों न सुनेगी अरज हमारी॥

तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥

मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥

तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥

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