अगस्त क्रांति की पचासवीं सालगिरह देखने के लिए लोहिया जिंदा नहीं थे। उनकी यह धारणा कि लोग मरने के बाद उनकी बात सुनेंगे, मुगालता साबित हो चुकी है। अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ 1992 में आई। उस साल तक नई आर्थिक नीतियों के तहत देश के दरवाजे देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए खोल दिए गए थे; और एक पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को भगवान राम के नाम पर ध्वस्त कर दिया गया।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!तब से लेकर नवउदारवाद और संप्रदायवाद की गिरोहबंदी के बूते भारत का शासक-वर्ग उस जनता का जानी दुश्मन बना हुआ है, जिसने भारत छोड़ो आंदोलन में साम्राज्यवादी शासकों के दमन का सामना करते हुए आजादी का रास्ता प्रशस्त किया था और भारत को एक समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया था।
पिछले तीन दशकों के नवउदारवादी दौर में भारतीय गणराज्य की संवैधानिक नींव लगभग खोखली हो चुकी है। उसका एक नतीज़ा है कि अयोध्या में 5 अगस्त 2020 को उच्चतम न्यायालय की सहमती से देश के प्रधानमंत्री के हाथों धर्म-आधारित नए भारत की नींव रखी गई है। इस नए भारत का भूत इस कदर सिर चढ़ कर बोलता है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महंत नृत्यगोपाल दास भी कहते हैं कि मंदिर का निर्माण नए भारत का निर्माण है!
प्रधानमंत्री जो नया भारत बनाने का आह्वान करते हैं, उसका आगाज़ 1991-92 में हुआ था. पिछले करीब तीन दशकों में देश से उसकी संप्रभुता और संसाधन, तथा जनता से उसके संवैधानिक अधिकार छीन लिए गए हैं। यह काम संविधान का तख्ता-पलट करके किया गया है। भारत छोड़ो आंदोलन सहित आज़ादी के संघर्ष की चेतना का इस्तेमाल धड़ल्ले से नया भारत बनाने में किया जा रहा है।
‘लोहिया के लोग’ भी उसमें शामिल हैं. भारत छोड़ो आंदोलन की सौवीं सालगिरह आने तक नए भारत की तस्वीर काफी-कुछ मुकम्मल हो जाएगी. ऐसा न हो, तो लोहिया के शब्द लेकर संकल्प करना होगा कि नए भारत से ‘हमें आजादी चाहिए और हम आजादी लेंगे’। लोहिया से ही सूत्र लेकर कहा जा सकता है कि भारत को फिर से प्राप्त करने की यह क्रांति 9 अगस्त 1942 की तरह भारत की जनता ही करेगी।


