Israel Election Results: इजराइल की राजनीति में आए चुनावी बदलाव ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव में उनके गठबंधन को बहुमत नहीं मिलने के बीच अरब मूल के इजराइली दलों की भूमिका निर्णायक बन गई है। राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडे का मानना है कि नेतन्याहू की युद्ध नीति, भ्रष्टाचार के आरोप और न्यायपालिका में हस्तक्षेप की कोशिशों ने उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर की है। इस घटनाक्रम का असर अमेरिका की राजनीति और भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ सकता है।
Israel Election Results: दक्षिणपंथी राजनीति के लिए बढ़ती चुनौतियां
इंफोपोस्ट/Israel Election Results
इजराइल में चुनावी नतीजों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके गठबंधन के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। चुनाव में नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को कुल 53 सीटें मिलने की बात सामने आई है, जबकि विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं। इसके अलावा अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने कुल 19 सीटों पर जीत दर्ज की है। इजराइल की संसद में कुल 120 सदस्य हैं और सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में किसी भी गठबंधन के लिए अरब नेतृत्व वाले दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो गया है।
इस चुनावी परिणाम को लेकर राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडे ने एक विस्तृत चर्चा में कहा कि नेतन्याहू की स्थिति काफी हद तक भारत के 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों जैसी दिखाई देती है। भारत में 400 पार का नारा देने वाली भाजपा बहुमत से दूर रह गई थी और उसे सहयोगी दलों के समर्थन से सरकार चलानी पड़ी। इसी तरह नेतन्याहू भी बहुमत से पीछे रह गए हैं। हालांकि इजराइल में उनकी मुश्किल यह है कि संभावित निर्णायक भूमिका निभाने वाले अरब मूल के राजनीतिक दल उनके साथ जाने की स्थिति में नहीं दिखाई देते।
अरब दलों की भूमिका बनी सरकार गठन की कुंजी
Israel Election Results: इजराइल के चुनावी नतीजों में अरब मूल के इजराइली नागरिकों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व विशेष चर्चा का विषय बना है। अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को कुल 19 सीटें मिलने को ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। चर्चा के दौरान बताया गया कि इन दलों में राम पार्टी को भी महत्वपूर्ण सफलता मिली है। इस समूह का समर्थन किसी भी संभावित सरकार के गठन में निर्णायक साबित हो सकता है।
संजीव पांडे के मुताबिक, गाजा और वेस्ट बैंक में लंबे समय से जारी हिंसा तथा फिलिस्तीनी नागरिकों के खिलाफ इजराइली सैन्य कार्रवाई के कारण अरब मूल के इजराइली नागरिकों में नेतन्याहू सरकार के प्रति नाराजगी है। ऐसे में इन दलों से नेतन्याहू के गठबंधन को समर्थन मिलने की संभावना कम दिखाई देती है। विपक्षी गठबंधन और अरब नेतृत्व वाले दलों के बीच राजनीतिक सहयोग की संभावनाएं भी चर्चा के केंद्र में हैं।
युद्ध नीति और घरेलू राजनीति ने बढ़ाई मुश्किलें
Israel Election Results: विश्लेषक के अनुसार, नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति कमजोर होने के पीछे केवल चुनावी समीकरण जिम्मेदार नहीं हैं। उनकी युद्ध नीति और घरेलू राजनीतिक फैसलों ने भी जनता के बीच असंतोष पैदा किया है। ईरान के साथ सैन्य टकराव को लेकर इजराइल में जिस तरह की अपेक्षाएं बनाई गई थीं, परिणाम उससे अलग रहे। शुरुआती दौर में यह धारणा बनाई गई थी कि इजराइल कुछ ही दिनों या सप्ताहों में ईरान को निर्णायक रूप से कमजोर कर देगा। लेकिन ईरान की जवाबी कार्रवाई और इजराइल के रक्षा ढांचे को पहुंचे नुकसान ने इस धारणा को चुनौती दी।
संजीव पांडे का कहना है कि युद्ध लंबा खिंचने और सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने इजराइली नागरिकों के जीवन को प्रभावित किया। सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच तनाव और असुरक्षा की स्थिति पैदा हुई। नागरिकों को लगातार हमलों और जवाबी कार्रवाई की आशंका के बीच रहना पड़ा। उनके अनुसार, नेतन्याहू सरकार ने युद्ध के परिणामों को लेकर जो उम्मीदें जगाई थीं, वे पूरी नहीं हुईं। इससे प्रधानमंत्री के प्रति जनता में नाराजगी बढ़ी और चुनाव में उसका असर दिखाई दिया।
भ्रष्टाचार के आरोप और न्यायपालिका से टकराव
Israel Election Results: नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलों का दूसरा बड़ा कारण भ्रष्टाचार से जुड़े मामले और न्यायपालिका के साथ उनका टकराव बताया गया। चर्चा में संजीव पांडे ने कहा कि नेतन्याहू और उनके परिवार से जुड़े मामलों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। उन्होंने टेलीकॉम क्षेत्र से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन मामलों ने प्रधानमंत्री की राजनीतिक विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। उनके अनुसार, न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित करने और न्यायाधीशों की नियुक्ति व्यवस्था में बदलाव की कोशिशों ने भी जनता के बीच विरोध पैदा किया।
इजराइल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक प्रतिरोध का भी चुनावी माहौल पर असर पड़ा। विश्लेषक के मुताबिक, वहां के नागरिकों ने सरकार की उन कोशिशों का विरोध किया जिनसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती थी। उनके अनुसार, नेतन्याहू को उम्मीद थी कि उनका गठबंधन 60 से 70 सीटों तक पहुंच जाएगा, लेकिन चुनावी नतीजों ने उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर कर दी।
चुनावी धांधली के आरोपों पर भी उठे सवाल
चुनाव परिणाम आने के बाद नेतन्याहू की ओर से विदेशी हस्तक्षेप और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोपों की चर्चा भी हुई। संजीव पांडे ने इस संदर्भ में कहा कि चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप के आरोप और वास्तविक चुनावी धांधली दो अलग-अलग विषय हैं। उनके मुताबिक, इजराइल में चुनाव बैलेट पेपर के माध्यम से हुए और चुनाव आयोग पर मतपत्र बदलने, मतपेटियां बदलने या मतगणना में गड़बड़ी करने जैसे आरोप सामने नहीं आए। उन्होंने कहा कि अरब मतदाताओं की बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचने से उनके राजनीतिक दलों का प्रदर्शन बेहतर हुआ।
विश्लेषक ने बताया कि अरब आबादी के बीच मतदान प्रतिशत लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंचने की बात सामने आई। इसके कारण अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को अधिक वोट और सीटें मिलीं। नेतन्याहू की ओर से कतर और तुर्की के हस्तक्षेप की आशंका जताए जाने पर भी चर्चा हुई। संजीव पांडे ने इन आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव में मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित करना अपने आप में चुनावी धांधली का प्रमाण नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी राजनीतिक अस्थिरता बढ़ा सकती है।
नई सरकार से गाजा और ईरान नीति में बदलाव की उम्मीद
इजराइल में यदि विपक्षी दल अरब मूल के राजनीतिक समूहों के समर्थन से सरकार बनाते हैं तो विदेश नीति में कुछ बदलाव संभव हैं। संजीव पांडे का मानना है कि नई सरकार के सामने युद्ध की स्थिति को नियंत्रित करने और क्षेत्र में तनाव कम करने की चुनौती होगी। गाजा और ईरान के प्रति इजराइल की नीतियों में बदलाव की संभावना बन सकती है। हालांकि यह बदलाव कितना व्यापक होगा, यह नई सरकार के राजनीतिक समीकरण और उसकी प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।
उनके अनुसार, नेतन्याहू की राजनीतिक कमजोरी का असर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पश्चिम एशिया नीति पर भी पड़ सकता है। ट्रंप प्रशासन की मध्य पूर्व में रणनीति और इजराइल के साथ उसके करीबी संबंधों को लेकर अमेरिका में पहले से सवाल उठ रहे हैं। संजीव पांडे ने कहा कि युद्ध के कारण क्षेत्र के कई देशों को ऊर्जा, पर्यटन, रियल एस्टेट और अन्य बुनियादी ढांचों में नुकसान उठाना पड़ा है। इससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी दबाव बढ़ा है।
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव ट्रंप के लिए चुनौती
चर्चा में अमेरिकी राजनीति और आगामी मिडटर्म चुनावों का भी विश्लेषण किया गया। संजीव पांडे के मुताबिक, उपलब्ध चुनावी सर्वेक्षणों में डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट के संकेत दिखाई दे रहे हैं। ईरान के साथ युद्ध, बढ़ती महंगाई, ईंधन की कीमतों और कृषि क्षेत्र की परेशानियों को इसके प्रमुख कारणों में गिना गया। उनका कहना है कि युद्ध के कारण ऊर्जा आपूर्ति और उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित होने से किसानों की लागत बढ़ी है। इससे रिपब्लिकन पार्टी के पारंपरिक समर्थकों में भी असंतोष पैदा हो सकता है।
विश्लेषक ने अमेरिकी युद्ध खर्च को लेकर भी सवाल उठाए। चर्चा में लगभग 47 अरब डॉलर के सैन्य खर्च का उल्लेख किया गया। उनके अनुसार, इसके अलावा सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढांचे की मरम्मत पर भी भारी खर्च आने की आशंका है। उन्होंने कहा कि युद्ध का आर्थिक बोझ अंततः अमेरिकी करदाताओं पर ही पड़ेगा। यदि मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत खो देती है तो ट्रंप के लिए बड़े राजनीतिक और नीतिगत फैसले लेना कठिन हो सकता है।
भारत पर भी पड़ सकता है पश्चिम एशिया संकट का असर
संजीव पांडे ने भारत के संदर्भ में कहा कि इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में तनाव और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने से तेल की कीमतों तथा घरेलू महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। उनका कहना है कि युद्ध का आर्थिक असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था और व्यापार को भी प्रभावित करता है।
उन्होंने अमेरिका के साथ संभावित व्यापार समझौतों को लेकर भारतीय किसानों की चिंताओं का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, अमेरिका अपने कृषि उत्पादों जैसे मक्का और सोयाबीन के लिए भारतीय बाजार में अधिक अवसर चाहता है। यदि डेयरी उत्पादों और कृषि वस्तुओं के आयात को लेकर ऐसी नीतियां बनती हैं जिनसे घरेलू किसानों को नुकसान हो, तो भारतीय कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में भारतीय किसानों और आम नागरिकों के हितों की सुरक्षा को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है।
दुनिया में दक्षिणपंथी राजनीति के सामने नई चुनौतियां
Israel Election Results: चर्चा के अंतिम हिस्से में दुनिया भर में दक्षिणपंथी राजनीति के बदलते स्वरूप पर भी विचार किया गया। संजीव पांडे ने इजराइल के चुनावी नतीजों के साथ ब्राजील और यूरोप के राजनीतिक घटनाक्रमों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, कई देशों में जनता अब केवल राष्ट्रवाद और राजनीतिक नारों के आधार पर सरकारों का समर्थन करने के बजाय रोजगार, महंगाई, शिक्षा और जीवन से जुड़ी बुनियादी समस्याओं पर जवाब मांग रही है। उन्होंने कहा कि सरकारों के लिए केवल संवाद की बात करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान करना भी जरूरी है।
भारत के संदर्भ में उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक और युवाओं की समस्याओं को महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बताया। उनका कहना है कि युवाओं को शिक्षा और रोजगार के साथ रहने की बेहतर व्यवस्था चाहिए। यदि सरकारें इन सवालों का समाधान नहीं करतीं तो जनता में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज सुनना और अलग-अलग विचारधाराओं को जगह देना जरूरी है।
संजीव पांडे ने चर्चा में यह भी कहा कि दक्षिणपंथ और अतिवामपंथ दोनों के अतिवादी स्वरूप लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकते हैं। उनके अनुसार, एक स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति का सम्मान, संवाद और विभिन्न आर्थिक तथा राजनीतिक विचारों के बीच संतुलन होना चाहिए। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती विभिन्न विचारधाराओं को राजनीतिक स्थान देने की परंपरा में भी दिखाई देती है।
कुल मिलाकर इजराइल के चुनावी नतीजों ने केवल नेतन्याहू की सत्ता के भविष्य को ही चर्चा में नहीं ला दिया है, बल्कि पश्चिम एशिया की युद्ध नीति, अमेरिका की राजनीति और भारत के आर्थिक हितों पर भी नए सवाल खड़े किए हैं। राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडे के साथ हुई इस विस्तृत बातचीत में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि दुनिया की जनता अब सरकारों से केवल बड़े राजनीतिक दावों की नहीं, बल्कि रोजगार, महंगाई, सुरक्षा और बेहतर जीवन से जुड़े ठोस परिणामों की अपेक्षा कर रही है।


