SIR Protest: दिल्ली में SIR के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के बीच आंदोलन से जुड़े संगठनों ने गतिविधियां तेज करने के संकेत दिए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र संगठनों और किसान समूहों की भागीदारी वाले प्रदर्शन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR वापस लेने की मांग उठाई गई। आंदोलन से जुड़े वक्ताओं ने दावा किया कि 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली में देशभर से किसान, मजदूर और छात्र शामिल हो सकते हैं।
SIR Protest: दिल्ली में प्रदर्शन से बढ़ा राजनीतिक दबाव
इंफोपोस्ट/SIR Protest/नई दिल्ली
SIR और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को लेकर दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का सिलसिला जारी है। प्रदर्शन में सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र संगठनों, किसानों और अन्य वर्गों की भागीदारी का दावा किया गया। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और SIR को वापस लेने की मांग शामिल रही। प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर की ओर जाने की कोशिश और पुलिस की ओर से बैरिकेडिंग तथा हिरासत की कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया।
आंदोलन से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि यह किसी एक संगठन या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक अलग-अलग सामाजिक, किसान, मजदूर और छात्र संगठनों के बीच समन्वय बढ़ रहा है। इसी क्रम में 1 नवंबर को रामलीला मैदान में प्रस्तावित बड़ी रैली को आंदोलन के अगले महत्वपूर्ण चरण के तौर पर देखा जा रहा है।
प्रदर्शन में किसान और छात्र संगठनों की भागीदारी
SIR Protest: प्रदर्शन के दौरान किसान संगठनों और सामाजिक समूहों की मौजूदगी का उल्लेख किया गया। वक्ताओं के मुताबिक आंदोलन में अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हो रहे हैं और यह धीरे-धीरे व्यापक स्वरूप ले रहा है। उन्होंने इसे केवल चुनाव आयोग से जुड़े एक मुद्दे के बजाय लोकतांत्रिक अधिकारों से संबंधित व्यापक अभियान के रूप में पेश किया।
आंदोलन से जुड़े एक वक्ता ने किसान और मजदूर संगठनों के बीच बढ़ते समन्वय का उल्लेख किया। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न जनसंगठनों के बीच अलग-अलग मुद्दों पर सहयोग की प्रक्रिया बनी है और मौजूदा आंदोलन में छात्र तथा युवा समूह भी उससे जुड़ रहे हैं।
1 नवंबर की रैली को बताया महत्वपूर्ण पड़ाव
SIR Protest: प्रस्तावित 1 नवंबर की रैली को लेकर वक्ताओं ने दावा किया कि इसमें इंडिया गठबंधन के बैनर के तहत बड़ी संख्या में लोग पहुंच सकते हैं। किसानों, मजदूरों और छात्रों की संभावित भागीदारी का भी उल्लेख किया गया। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि इस रैली से विरोध प्रदर्शन की दिशा और व्यापकता का आकलन किया जा सकेगा।
प्रोफेसर अखिल स्वामी समेत चर्चा में शामिल वक्ताओं ने 1 नवंबर को महत्वपूर्ण दिन बताया। उनके अनुसार, यदि बड़ी संख्या में लोग रामलीला मैदान पहुंचते हैं तो यह आंदोलन की राजनीतिक और सामाजिक पहुंच को दर्शाएगा। हालांकि रैली में वास्तविक भागीदारी का स्तर कार्यक्रम के दौरान ही स्पष्ट होगा।
जंतर-मंतर और प्रदर्शन स्थल को लेकर विवाद
प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर को लेकर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने दावा किया कि आंदोलन के लिए पहले निर्धारित क्षेत्र से जुड़े नियमों में बदलाव के कारण प्रदर्शनकारियों की गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। उनके मुताबिक प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर को दोबारा विरोध के प्रमुख स्थल के रूप में इस्तेमाल करने की मांग कर रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि दिल्ली में विभिन्न स्थानों पर भारी बैरिकेडिंग की गई और लोगों को आगे बढ़ने से रोका गया। कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने का भी उल्लेख किया गया। आंदोलन से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि ऐसी कार्रवाई से प्रदर्शन समाप्त होने के बजाय इसके और व्यापक होने की संभावना है।
नेहा बोरा की याचिका का भी उठा मुद्दा
प्रदर्शन और चर्चा के दौरान छात्र नेता नेहा बोरा की कानूनी याचिका का मुद्दा भी सामने आया। बताया गया कि उन्होंने बॉन्ड भरने की शर्त को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था। चर्चा में कहा गया कि अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी और अब उनके सामने सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प है।
आंदोलन से जुड़े अन्य युवाओं के खिलाफ बॉन्ड और हिरासत से संबंधित मामलों का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने आशुतोष राका और सौरभ दास का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें हिरासत के बाद बॉन्ड भरने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। इन घटनाओं को आंदोलनकारियों ने विरोध के अधिकार और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े व्यापक सवालों से जोड़कर देखा।
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का दावा
चर्चा में चुनाव आयोग के भीतर अधिकारियों के बीच मतभेद से जुड़े दस्तावेजों का भी उल्लेख किया गया। कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ उपचुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज को लेकर 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे थे। इसके बाद कैबिनेट सचिवालय की ओर से इन शिकायतों को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और संबंधित विभाग तक पहुंचाए जाने की बात कही गई।
इस मुद्दे को लेकर वक्ताओं ने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग के भीतर अधिकारियों के बीच अधिकारों और कार्यप्रणाली को लेकर किस तरह की स्थिति बनी हुई है। हालांकि इन घटनाओं को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित संस्थाओं की ओर से सामने आने वाले आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही स्पष्ट होगी।
तमिलनाडु और अन्य राज्यों में भी मुद्दा गरमाया
चर्चा में तमिलनाडु की राजनीतिक गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया। बताया गया कि चुनाव आयोग की बैठक में डीएमके और टीवीके के शामिल नहीं होने की बात सामने आई और उनकी ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग रखे जाने का दावा किया गया। इसे राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे विरोध के विस्तार के संकेत के तौर पर प्रस्तुत किया गया।
उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में चुनावी गतिविधियों को लेकर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कुछ स्थानीय घटनाओं और चुनावी प्रक्रिया के दौरान सामने आए विवादों का उल्लेख करते हुए चुनाव व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए। इन घटनाओं को मौजूदा राजनीतिक माहौल से जोड़ते हुए कहा गया कि चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर विभिन्न राज्यों में भी असंतोष की आवाजें सामने आ रही हैं।
आंदोलन को व्यापक बनाने की बात
आंदोलन से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि यह अभियान अब केवल एक राजनीतिक संगठन तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, किसान, मजदूर, छात्र और नागरिक समूह अपने-अपने मुद्दों के साथ इससे जुड़ रहे हैं। इसी वजह से आंदोलन को एक साझा मंच के रूप में विकसित होने की संभावना जताई गई।
प्रदर्शनकारियों के बीच यह भी चर्चा रही कि आने वाले समय में महंगाई, रोजगार और अन्य सामाजिक-आर्थिक मुद्दे आंदोलन के एजेंडे में शामिल हो सकते हैं। वक्ताओं ने कहा कि विभिन्न संगठनों के बीच बन रहा नेटवर्क भविष्य में अलग-अलग मुद्दों पर संयुक्त गतिविधियों का आधार बन सकता है।
सरकार और आंदोलन के बीच बढ़ते टकराव पर चर्चा
चर्चा में सरकार की ओर से आंदोलन से निपटने की रणनीति पर भी सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने पुलिस कार्रवाई, हिरासत और बॉन्ड की प्रक्रिया को लेकर चिंता व्यक्त की और कहा कि बातचीत के जरिए समाधान तलाशना अधिक प्रभावी हो सकता है। दूसरी ओर, सरकार की आधिकारिक स्थिति और आंदोलन को लेकर उसके अगले कदमों का उल्लेख चर्चा में सीमित रहा।
आंदोलनकारियों का कहना है कि पुलिस कार्रवाई या हिरासत से उनकी मांगें समाप्त नहीं होंगी। उनके मुताबिक शांतिपूर्ण विरोध जारी रहेगा और अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन के जरिए मुद्दे को जनता के बीच उठाया जाएगा। चर्चा में इसे सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों से जोड़कर भी देखा गया।
1 नवंबर पर टिकी निगाहें
SIR Protest: आंदोलन से जुड़े वक्ताओं ने 1 नवंबर को निर्णायक दिन बताया है। उनका दावा है कि रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली में देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग पहुंच सकते हैं। किसान नेताओं और सामाजिक संगठनों की संभावित भागीदारी का भी उल्लेख किया गया है।
फिलहाल आंदोलन की अगली दिशा 1 नवंबर की प्रस्तावित रैली और उससे पहले होने वाली राजनीतिक तथा सामाजिक गतिविधियों पर निर्भर करेगी। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR से जुड़े अपने सवालों को लेकर आगे बढ़ने की बात कह रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार, चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों के बीच टकराव और संवाद दोनों की संभावनाओं पर नजर बनी रहेगी।


