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Unnao rape case: सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबन पर लगाई रोक

infopost December 30, 2025
Unnao rape case

Unnao rape case: सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पीड़िता और उसके परिवार को बड़ी राहत मिली है, जबकि सेंगर जेल में ही रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने मामले की गंभीरता के मद्देनजर यह अंतरिम आदेश जारी किया और सेंगर को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

Unnao rape case: पीड़िता को मिली बड़ी राहत

नई दिल्ली/इंफोपोस्ट न्यूज/Unnao rape case

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2017 के चर्चित उन्नाव बलात्कार मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित कर उन्हें सशर्त जमानत दी गई थी। इस फैसले से पीड़िता और उसके परिवार को बड़ी राहत मिली है, जबकि सेंगर जेल में ही रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया और सेंगर को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2026 में होगी। यह मामला 2017 का है, जब उन्नाव की एक नाबालिग लड़की ने कुलदीप सिंह सेंगर पर नौकरी का लालच देकर अपहरण और बलात्कार का आरोप लगाया था।

उस समय भाजपा के प्रभावशाली विधायक थे सेंगर

सेंगर उस समय भाजपा के प्रभावशाली विधायक थे। मामले ने पूरे देश में आक्रोश पैदा किया था, क्योंकि पीड़िता के परिवार को लगातार धमकियां मिलीं और उसके पिता की हिरासत में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। दिसंबर 2019 में दिल्ली की एक विशेष अदालत ने सेंगर को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 25 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके अलावा, पीड़िता के पिता की मौत के मामले में भी सेंगर को 10 साल की सजा हुई है।

हालिया घटनाक्रम की शुरुआत 23 दिसंबर 2025 से हुई, जब दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सेंगर की अपील पर सुनवाई करते हुए उनकी सजा निलंबित कर दी। हाईकोर्ट ने तर्क दिया कि सेंगर पहले से ही सात साल से ज्यादा जेल में हैं और वे तकनीकी रूप से POCSO एक्ट के तहत ‘लोक सेवक’ की परिभाषा में नहीं आते, क्योंकि विधायक को आईपीसी में लोक सेवक नहीं माना जाता।

अपराध की गंभीरता को देखते हुए सजा निलंबित करना गलत

हाईकोर्ट ने सशर्त जमानत दी, जिसमें पीड़िता के निवास से 5 किलोमीटर दूर रहने और धमकी न देने जैसी शर्तें शामिल थीं। हालांकि, पिता की मौत वाले मामले में सजा के कारण सेंगर तुरंत रिहा नहीं हो पाते। इस फैसले के खिलाफ सीबीआई ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सीबीआई की याचिका में कहा गया कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए सजा निलंबित करना गलत है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दलील दी कि पीड़िता उस समय सिर्फ 15 साल 10 महीने की थी और यह एक जघन्य अपराध है। POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) और 6 के तहत सेंगर को सजा मिली थी, जो लोक सेवक द्वारा किया गया गंभीर यौन अपराध मानता है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे, ने सीबीआई की दलीलों से सहमति जताई।

कोर्ट ने कहा, मामला ‘अद्वितीय परिस्थितियों’ वाला

कोर्ट ने कहा कि मामला ‘अद्वितीय परिस्थितियों’ वाला है, क्योंकि सेंगर अलग से पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के लिए भी दोषी हैं। कोर्ट ने पूछा कि क्या विधायक को POCSO एक्ट में लोक सेवक नहीं माना जा सकता? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आमतौर पर जमानत आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया जाता, लेकिन यहां स्थिति अलग है। कोर्ट ने पीड़िता को कानूनी सहायता प्रदान करने का भी निर्देश दिया।

पीड़िता ने इस फैसले पर खुशी जताई और कहा, “मैं सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद देती हूं। मुझे न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। मैं तब तक नहीं रुकूंगी जब तक उसे फांसी नहीं हो जाती।” उसकी मां ने भी सुरक्षा की मांग की और कहा कि परिवार को खतरा है। दूसरी ओर, सेंगर की बेटी ऐश्वर्या सेंगर ने सोशल मीडिया पर अपील की कि समर्थक धैर्य रखें और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा करें। यह मामला महिलाओं के खिलाफ अपराधों और राजनीतिक प्रभाव के दुरुपयोग का प्रतीक बन चुका है।

Unnao rape case: 2017 में घटना के बाद पीड़िता ने आत्मदाह की कोशिश की थी, जिसके बाद मामला सुर्खियों में आया। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में सभी संबंधित केस दिल्ली ट्रांसफर कर तेज सुनवाई के आदेश दिए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम स्टे पीड़िता की सुरक्षा और न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब सबकी नजरें जनवरी में होने वाली अंतिम सुनवाई पर हैं, जहां POCSO एक्ट में ‘लोक सेवक’ की परिभाषा पर बहस होगी।

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