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Save Aravalli: सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर फैसले पर लगाई रोक

infopost December 30, 2025
Save Aravalli

Save Aravalli: नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए अरावली हिल्स को ‘स्थानीय राहत से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली किसी भी भूमिरूप’ और अरावली रेंज को ‘एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी पर स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों’ के रूप में परिभाषित किया था। लेकिन पर्यावरणविदों और विपक्षी दलों ने इसे ‘अरावली की रक्षा कमजोर करने वाला’ करार दिया।

Save Aravalli: उच्चस्तरीय विशेषज्ञ पैनल गठित करने का प्रस्ताव

नई दिल्ली/इंफोपोस्ट न्यूजडेस्क/Save Aravalli

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा से जुड़े अपने ही नवंबर महीने के फैसले पर रोक लगा दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत की अगुवाई वाली तीन जजों की वैकेशन बेंच ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई की और कहा कि 20 नवंबर 2025 के फैसले को अगली सुनवाई तक लागू नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने खनन गतिविधियों से जुड़े पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में रखते हुए एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ पैनल गठित करने का प्रस्ताव रखा है, जो अरावली की परिभाषा और संरक्षण से जुड़े सभी मुद्दों की गहन जांच करेगा।

अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी। यह फैसला अरावली की नई परिभाषा को लेकर देशभर में उठे व्यापक विवाद और जन आक्रोश के बीच आया है। नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए अरावली हिल्स को ‘स्थानीय राहत से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली किसी भी भूमिरूप’ और अरावली रेंज को ‘एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी पर स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों’ के रूप में परिभाषित किया था। इस परिभाषा के तहत नई खनन लीज पर रोक लगाई गई थी, लेकिन पर्यावरणविदों और विपक्षी दलों ने इसे ‘अरावली की रक्षा कमजोर करने वाला’ करार दिया।

अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे पुरानी

उनका कहना था कि इससे छोटी पहाड़ियां और ढलानें संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी, जिससे अवैध खनन और रियल एस्टेट विकास को बढ़ावा मिलेगा। अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में से एक है, जो गुजरात से दिल्ली तक फैली हुई है और राजस्थान, हरियाणा तथा दिल्ली से होकर गुजरती है। यह थार मरुस्थल के पूर्व की ओर फैलाव को रोकने वाली ‘हरी दीवार’ के रूप में जानी जाती है।

अरावली जल संरक्षण, जैव विविधता और दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली का क्षरण दिल्ली में धूल भरी आंधियों, भूजल स्तर में गिरावट और प्रदूषण बढ़ाने का प्रमुख कारण बन सकता है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की आंतरिक आकलन रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान में 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही 100 मीटर ऊंचाई की शर्त पूरी करती हैं, यानी करीब 91 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकता था।

सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान चला

नवंबर के फैसले के बाद पर्यावरणविदों, नागरिक समाज और राजनीतिक दलों ने व्यापक विरोध जताया। कांग्रेस ने इसे ‘मोदी सरकार की खनन माफिया को सौगात’ करार दिया, जबकि राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अरावली को राज्य की ‘अमूल्य प्राकृतिक धरोहर’ बताते हुए अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने अरावली को ‘हरियाणा की फेफड़े’ कहा। सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान चला और जेएनयू सहित कई जगहों पर प्रदर्शन हुए।

सुप्रीम कोर्ट ने इन जन चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए कहा कि नवंबर के फैसले में कुछ ‘महत्वपूर्ण अस्पष्टताएं’ रह गई हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी है। बेंच ने पूछा कि क्या 100 मीटर ऊंचाई की शर्त और 500 मीटर की दूरी का मानदंड अरावली की पारिस्थितिक अखंडता को बनाए रखेगा? क्या पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से अधिक गैप वाले क्षेत्रों में नियंत्रित खनन की अनुमति दी जा सकती है?

केंद्र सरकार, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात सरकारों को नोटिस जारी

Save Aravalli: कोर्ट ने जोर दिया कि परिभाषा वैज्ञानिक, भूवैज्ञानिक और पर्यावरणीय आकलन पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल ऊंचाई पर। कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान तथा गुजरात सरकारों को नोटिस जारी किया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से कहा कि नवंबर के फैसले को लेकर कई भ्रांतियां फैलाई गई हैं और सरकार कोर्ट के किसी भी निर्देश का पालन करने को तैयार है।

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया और कहा कि अरावली संरक्षण सरकार की प्राथमिकता है। यह फैसला अरावली संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट से उम्मीद है कि अरावली की व्यापक परिभाषा तय होगी, जिसमें छोटी पहाड़ियां, ढलानें और जुड़े हुए क्षेत्र भी शामिल होंगे। इससे न केवल खनन पर प्रभावी नियंत्रण होगा, बल्कि उत्तर भारत की जल सुरक्षा, वायु गुणवत्ता और जैव विविधता की रक्षा भी मजबूत होगी। अरावली की लड़ाई अब नई दिशा में बढ़ चुकी है।

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