Nitish’s silence: नीतीश के खास अधिकारियों पर ईडी और सीबीआई के छापे डाले जा रहे हैं। फिर भी किंगमेकर नीतीश खामोश हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दूरी बना रखी है। जबकि वह लालू परिवार से सदैव संपर्क में रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नीतीश कुमार कोई नया खेल करने जा रहे हैं? वैसे नीतीश के मन में क्या है, यह जान पाना हर किसी के वश में नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक क्या कहते हैं, उसी के आधार पर कुछ समझने की कोशिश करते हैं।
Nitish’s silence: किंग मोदी और किंगमेकर नीतीश के बीच कुछ ठीक नहीं
इंफोपोस्ट डेस्क
Nitish’s silence: आज कल इस बात की बड़े जोर शोर से चर्चा है कि किंग नरेंद्र मोदी और किंगमेकर नीतीश कुमार के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अगर ऐसा है तो क्या नीतीश कुमार अंदर ही अंदर मोदी जी से नाराज चल रहे हैं? और अगर वाकई नाराज चल रहे हैं तो देश की राजनीति में आगे क्या होने जा रहा है? पिछली 16 जुलाई को पटना में कुछ ऐसा हुआ, जिसकी किसी को भी उम्मीद नहीं थी। क्योंकि ईडी का एक बड़ा जत्था इसी दिन पटना पहुंच गया था। और नीतीश के करीबी शीर्ष आला अधिकारी संजीव हंस के दफ्तर में घुस गया। ईडी की इस छापेमारी से वहां भगदड़ मच गई।
ईडी की यह टीम संजीव हंस के घर पर भी पहुंच गई। वहां से ईडी को कुछ ऐसे दस्तावेज मिले जिसमें उन तमाम अधिकारियों के नामों का खुलासा हो गया जो नीतीश के करीबी माने जाते हैं। इस प्रकार कई ऐसे अधिकारियों की घेराबंदी शुरू कर दी गई जो नीतीश कुमार के करीबी हैं। इस घटना के दस दिन बाद 27 जुलाई को पीएम मोदी ने नीति आयोग की एक बैठक बुलाई, जिसमें देश के सभी मुख्यमंत्रियों को बुलाया गया था। इस बैठक में मोदी विरोधी ममता बनर्जी तक आ गईं। लेकिन किंग मेकर नीतीश कुमार नहीं आए। जबकि इस बैठक में चंद्र बाबू नायडू भी पहुंचे थे। मोदी जी फूलों का गुलदस्ता लेकर नीतीश कुमार का इंतजार करते रह गए। जाहिर है कि इस मौके पर नीतीश कुमार के न होने को अनहोनी घटना ही कहा जा सकता है।
जब नीतीश कुमार ने संजीव हंस को हटा दिया
Nitish’s silence: पिछली पहली अगस्त की बात करें तो इस दिन नीतीश कुमार ने संजीव हंस को हटा दिया। यह वही अधिकारी हैं जिनके यहां ईडी के छापे पड़े थे। दरअसल, संजीव हंस के घर से एक डायरी मिली है। उस डायरी में कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम थे। और ऐसा कहा जाता है कि इनसे कुछ पैसों के ट्रांजेक्शन का जिक्र था। नीतीश के करीबी आला अधिकारियों की घेराबंदी आज भी जारी है। बड़ा सवाल यह है कि पटना में जो ईडी के छापे पड़े, क्या उसकी जानकारी नीतीश कुमार को थी? या छापे नीतीश कुमार की सहमति से मारे गए? अगर ऐसा है तो उससे भी बड़ा सवाल यह है कि नीतीश कुमार अपने करीबी अधिकारियों के यहां केंद्रीय एजेंसी से छापे क्यों डलवा रहे हैं? क्या नीतीश कुमार के पास एजेंसियों की कमी है कि उन्होंने अपनी किसी एजेंसी से छापे नहीं डलवाए।
अगर किंग मेकर नीतीश कुमार की सहमति के बिना ये छापेमारी हुई तो क्या नीतीश कुमार पर कोई दबाव डाला जा रहा है? अगर नीतीश कुमार पर दिल्ली प्रेशर डाल रही है तो क्यों डाल रही है? उसका लक्ष्य क्या है? ये बड़ा सवाल है। एक और सवाल है कि क्या नीतीश कुमार कोई गेम तो नहीं खेल रहे हैं? अगर गेम खेल रहे हैं तो ये गेम क्या है? और नीतीश कुमार के माइंड सेट को समझना किसी भी पत्रकार के लिए बहुत मश्किल है। पत्रकार अभिषेक कुमार कहते हैं कि लंबे समय से बिहार के भाजपा नेता नीतीश कुमार के साथ नहीं दिख रहे हैं। और नीतीश कुमार पूरे बिहार के दौरे पर निकल पड़े हैं। वह ब्लॉक लेबल तक जा रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार चुप क्यों हैं? यह एक बड़ा सवाल है। सवाल यह भी है कि क्या नीतीश कुमार के अधिकारियों की घेराबंदी उन्हें दूसरे खेमे में जाने से रोकने के लिए हो रही है? क्योंकि नीतीश कुमार का मन मोदी जी के साथ नहीं लग रहा है। उनके मुद्दे को राहुल गांधी हाइजैक करते जा रहे हैं। ये मुद्दे हैं जाति जनगणना और आरक्षण बढ़ाने की मांग।
गुजरात लॉबी के काम करने का तरीका जगजाहिर
Nitish’s silence: वरिष्ठ पत्रकार उमाकांत लखेड़ा कहते हैं, गुजरात लॉबी के काम करने का तरीका जगजाहिर है। आपको याद होगा कि जो पेगासस का इस्तेमाल गुजरात लॉबी ने किया था, वह अपने ही लोगों के खिलाफ किया था। अब गुजरात लॉबी को नीतीश कुमार के कुछ राजदार मिल गए हैं। जिनके जरिये कुछ फाइलें मंगा कर नीतीश कुमार की घेराबंदी शुरू कर दी गई है। लेकिन नीतीश कुमार पर निजी तौर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। वह बिहार के मिस्टर क्लीन माने जाते हैं। इसलिए उनके राजदारों का इस्तेमाल किया जा रहा है। मायावती की तरह नीतीश कुमार को घर बिठाने की साजिश रची जा रही है। क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपना रोडमैप बना लिया है। और भाजपा नीतीश कुमार के बिना यह चुनाव लड़ना चाहती है।
अभिषेक कुमार की मानें, तो नीतीश कुमार के करीबी एक अत्यंत ईमानदार अधिकारी दिल्ली पहुंच चुके हैं। उधर, तेजस्वी और नीतीश में संपर्क कभी टूटा नहीं। गौरतलब है कि लालू प्रसाद यादव अगर अपने परिवार के बाहर किसी को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया तो वह नीतीश कुमार हैं। जब नीतीश कुमार को जरूरत पड़ेगी, उनका भतीजा तेजस्वी यादव उनके साथ खड़े होने के लिए तैयार मिलेगा। क्योंकि तेजस्वी अब सरकार पर हमलावर नहीं होते। वह तो सिर्फ इतना कहते हैं कि नीतीश कुमार के बल बूते सरकार चल रही है। रही बात मोदी की तो वह अब नीतीश कुमार को शूट नहीं कर रहे हैं। क्योंकि बिहार में भाजपा के वोटर बिखर रहे हैं। ऐसे में भाजपा से अनबन हुई तो नीतीश आरजेडी के साथ जा सकते हैं। और तब राजनीतिक परिदृश्य बहुत ही रोचक हो जाएगा। यही नीतीश की चुप्पी का सबसे बड़ा राज है और है एक बड़े राजनीतिक तूफान का संकेत भी।


