Women Safety: भारत में महिलाओं की सुरक्षा का सवाल केवल कानून और व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सोच, पितृसत्ता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से भी जुड़ा है। महिलाओं की आजादी पर पहरा लगाकर उन्हें सुरक्षित रखने की कोशिश वास्तव में सुरक्षा की अवधारणा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
Women Safety: सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की आजादी पर पहरा
इंफोपोस्ट/Women Safety
भारत में महिला सुरक्षा को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा, बलात्कार की घटनाओं और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर लगाए जाने वाले सामाजिक प्रतिबंधों ने इस सवाल को महत्वपूर्ण बना दिया है कि आखिर महिलाओं की सुरक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है। क्या महिलाओं को सुरक्षित रखने के नाम पर उनकी आवाजाही, दोस्ती और पसंद पर नियंत्रण करना उचित है, या फिर समाज को अपनी उस मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत है जो महिलाओं की स्वतंत्र पहचान को स्वीकार करने में हिचकती है?
फ्रांसीसी दार्शनिक और नारीवादी विचारक सिमोन द बोउवार ने अपनी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में वर्ष 1949 में लिखा था कि समाज में पुरुष को मूल विषय और महिला को ‘अन्य’ के रूप में देखा जाता है। उनके विचार आज भी भारतीय समाज की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हैं। महिलाओं की पहचान अक्सर किसी पुरुष, परिवार या सामाजिक संबंध के आधार पर तय की जाती है, जबकि उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व, विचारों और निर्णय लेने के अधिकार को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
देवी के रूप में सम्मान, इंसान के रूप में बराबरी से परहेज
महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर चर्चा के बीच राज्यसभा में जावेद अख्तर के लगभग 12 वर्ष पुराने भाषण का वीडियो इन दिनों इंस्टाग्राम पर चर्चा में है। अपने भाषण में उन्होंने भारतीय समाज की उस प्रवृत्ति पर सवाल उठाया था, जिसमें महिलाओं को देवी का दर्जा देना तो पसंद किया जाता है, लेकिन उन्हें समान अधिकारों वाला इंसान मानने में कठिनाई होती है। देवी के रूप में प्रतिष्ठित करने से महिला और पुरुष के बीच बराबरी का सवाल पीछे छूट सकता है।
किसी महिला को स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार करने का अर्थ है कि उसकी इच्छाओं, विचारों और फैसलों का सम्मान किया जाए। उसे अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने, अपनी पसंद के संबंध बनाने और अपनी स्वायत्तता के साथ जीने का अधिकार मिले। यही समानता पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए चुनौती बनती है, क्योंकि इसमें महिलाओं को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें स्वतंत्र नागरिक के रूप में स्वीकार करना पड़ता है।
नैतिक पहरेदारी के नाम पर निजी जीवन में हस्तक्षेप
महिलाओं की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए समाज में कई तरह की नैतिक निगरानी की व्यवस्थाएं दिखाई देती हैं। बजरंग दल जैसे समूहों और विभिन्न राज्यों में सक्रिय तथाकथित एंटी-रोमियो दस्तों की भूमिका को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। छेड़छाड़ और उत्पीड़न रोकने के उद्देश्य से बनाई गई व्यवस्थाओं के तहत कार्रवाई की अपेक्षा रहती है, लेकिन जब हस्तक्षेप सहमति से संबंध बनाने वाले वयस्कों तक पहुंचता है, तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों का सवाल खड़ा होता है।
अंतरधार्मिक वयस्क जोड़ों को धमकाने या उनके संबंधों पर सवाल उठाने जैसी गतिविधियां नैतिक पहरेदारी की सीमाओं पर बहस को जन्म देती हैं। ‘लव जिहाद’ जैसे आरोपों के नाम पर सहमति से बने रिश्तों को निशाना बनाए जाने की आशंकाएं भी इसी बहस का हिस्सा हैं। महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि छेड़छाड़ और हिंसा के खिलाफ कार्रवाई हो, लेकिन सुरक्षा के नाम पर वयस्कों की निजी पसंद और स्वतंत्रता का उल्लंघन न किया जाए।
हिंसा के आरोपी का महिमामंडन और रेप कल्चर
जमुई की घटना के संदर्भ में मुख्य आरोपी के इंस्टाग्राम पर सैकड़ों फॉलोअर्स बढ़ने की बात सामने आई है। इस तरह की प्रतिक्रिया चिंता पैदा करती है, क्योंकि गंभीर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्ति को संस्कृति का रक्षक बताकर उसका महिमामंडन करना सामाजिक मूल्यों पर सवाल खड़े करता है। ऐसे मामलों में आरोपों की निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान जरूरी है, साथ ही हिंसा को किसी भी परिस्थिति में गौरव का विषय बनाने वाली सोच की आलोचना भी आवश्यक है।
रेप कल्चर यानी बलात्कार की संस्कृति का अर्थ यह नहीं है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति बलात्कार का समर्थन करता है। इसका आशय उन सामाजिक धारणाओं और व्यवहारों से है, जो यौन हिंसा को कम गंभीर बताने, आरोपियों के लिए बहाने तलाशने और पीड़ित महिलाओं को ही दोषी ठहराने का काम करते हैं। जब हिंसा के प्रति संवेदनशीलता कमजोर होती है और आरोपी के आचरण का महिमामंडन किया जाता है, तो ऐसी मानसिकता को चुनौती देना और अधिक जरूरी हो जाता है।
पीड़िता के व्यवहार पर सवाल, अपराधी की जिम्मेदारी पीछे
Women Safety: महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं के बाद अक्सर चर्चा उनके कपड़ों, घर से बाहर निकलने के समय, उनके मित्रों और उनकी जीवनशैली पर केंद्रित हो जाती है। सवाल उठाए जाते हैं कि महिला ने क्या पहना था, वह देर रात बाहर क्यों थी या उसका कोई पुरुष मित्र क्यों था। इस तरह की सोच में हिंसा करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी और उसके निर्णय पर होने वाली चर्चा पीछे छूट जाती है।
वास्तविक सवाल यह होना चाहिए कि किसी व्यक्ति ने दूसरे की इच्छा और सहमति का उल्लंघन करने का अधिकार अपने पास क्यों समझ लिया। किसी महिला के कपड़े, दोस्ती या बाहर निकलने का समय उसकी सहमति का प्रमाण नहीं हो सकते। जब समाज पीड़ित के व्यवहार को अपराध का कारण बताने लगता है, तो वह अनजाने में हिंसा को उचित ठहराने वाली धारणाओं को मजबूत कर सकता है।
राजनीतिक बयान और सुरक्षा की सीमित समझ
महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर सार्वजनिक बहस में राजनीतिक नेताओं के बयानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कई बार गंभीर घटनाओं को लड़कों की छोटी-मोटी गलती बताकर हल्का करने की कोशिश की जाती है। कुछ प्रतिक्रियाओं में पश्चिमी संस्कृति को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जबकि कहीं महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर बाल विवाह जैसे सुझाव सामने आते हैं। ऐसी प्रतिक्रियाएं हिंसा के मूल कारणों और अपराध करने वाले व्यक्ति की जवाबदेही पर पर्याप्त ध्यान नहीं देतीं।
महिलाओं को घरों के भीतर सीमित रखना या उनकी आवाजाही पर रोक लगाना सुरक्षा का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। ऐसी सोच महिलाओं की स्वतंत्रता को समस्या मानती है, जबकि असल जरूरत हिंसा रोकने, अपराधियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने और समानता का सम्मान करने वाले सामाजिक वातावरण के निर्माण की है। सुरक्षा का दायित्व महिलाओं पर प्रतिबंध लगाने के बजाय समाज और संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़ा होना चाहिए।
कानूनी अधिकार और सामाजिक वास्तविकता के बीच अंतर
Women Safety: भारत में यौन हिंसा से निपटने के लिए कानून और संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं। महिलाओं को अपनी पसंद से जीवन जीने, आने-जाने, मोबाइल फोन इस्तेमाल करने, दोस्ती चुनने और विवाह से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है। लेकिन कानूनी अधिकारों की मौजूदगी अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करती कि महिलाएं रोजमर्रा के जीवन में इनका इस्तेमाल बिना किसी दबाव के कर सकें।
परिवार की इज्जत, सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपराओं के नाम पर महिलाओं के फैसलों पर शर्तें लगाई जा सकती हैं। उनकी पसंद को परिवार या समुदाय की स्वीकृति से जोड़ दिया जाता है। इससे कानून में प्राप्त अधिकार और वास्तविक जीवन के अनुभवों के बीच अंतर दिखाई देता है। महिला सुरक्षा का मूल्यांकन केवल कानूनों और व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि महिलाएं अपने अधिकारों का इस्तेमाल कितनी स्वतंत्रता और निर्भयता से कर पाती हैं।
बचपन से सहमति और लैंगिक समानता की शिक्षा
Women Safety: सामाजिक मानसिकता में बदलाव लाने के लिए शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसके लिए स्कूलों के पाठ्यक्रम में शारीरिक स्वायत्तता, सहमति और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों को व्यवस्थित रूप से शामिल करने की जरूरत है। बच्चों को शुरुआती उम्र से यह समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी इच्छा, सीमाएं और निर्णय लेने का अधिकार होता है। किसी भी संबंध में दूसरे व्यक्ति की सहमति का सम्मान करना आवश्यक है।
स्कूलों और कॉलेजों में लड़के-लड़कियों को अलग रखने की प्रवृत्ति भी उनके बीच स्वाभाविक संवाद और आपसी समझ विकसित करने में बाधा बन सकती है। स्वस्थ मित्रता और सामान्य बातचीत के अवसर सीमित होने पर एक-दूसरे को समान इंसान के रूप में समझने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल शैक्षणिक ज्ञान देना नहीं, बल्कि सम्मान, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मूल्यों को भी मजबूत करना होना चाहिए।
पिंजरे में बंद करके नहीं, आजादी देकर मिलेगी सुरक्षा
Women Safety: सहमति को सामाजिक व्यवहार का सामान्य हिस्सा बनाना जरूरी है। दोस्ती का अर्थ सहमति नहीं है। कपड़ों का अर्थ सहमति नहीं है। चुप्पी का अर्थ सहमति नहीं है। किसी भी व्यक्ति की इच्छा और स्पष्ट सहमति के बिना उसके साथ संबंध या व्यवहार थोपना स्वीकार्य नहीं हो सकता। इन बुनियादी बातों को परिवार, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक जीवन में महत्व दिए बिना महिलाओं की सुरक्षा को पूरी तरह सुनिश्चित करना कठिन होगा।
महिला सुरक्षा का वास्तविक अर्थ ऐसा समाज बनाना है, जहां महिलाओं को हिंसा और उत्पीड़न से बचाने के साथ-साथ उनकी स्वतंत्रता, पसंद और स्वायत्तता का सम्मान भी मिले। यदि सुरक्षित रखने के नाम पर उनकी आवाजाही सीमित करनी पड़े, उनकी दोस्ती पर सवाल उठाने पड़ें और उनके फैसलों पर पहरा बैठाना पड़े, तो यह सुरक्षा की अधूरी अवधारणा है। महिलाओं को पिंजरे में बंद करके नहीं, बल्कि उनके लिए भयमुक्त और समान अवसरों वाला वातावरण तैयार करके ही वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
देवांशी मंटा नई दिल्ली स्थित भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) में सीनियर रिसर्च इंटर्न हैं, जबकि वंशिका सिंह रिसर्च असिस्टेंट हैं। महिला सुरक्षा पर यह विमर्श समाज के सामने एक बुनियादी सवाल रखता है कि क्या महिलाओं की आजादी को सीमित करके सुरक्षा का दावा किया जा सकता है, या फिर वास्तविक बदलाव के लिए पुरुषवादी सोच, नैतिक पहरेदारी और हिंसा को सामान्य मानने वाली मानसिकता को बदलना होगा।


