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एक डॉलर में ढाई लाख से ज्यादा ईरानी रियाल क्यों?

September 21, 2020
Why more than 2.5 lakh Iranian rials in a dollar?

न्यूज डेस्क, तेहरान। ईरान की मुद्रा रियाल में अभूतपूर्व गिरावट आई है। रूस, चीन और सहयोगी देशों के विरोध के बावजूद अमेरिका ने ईरान पर संयुक्तराष्ट्र के प्रतिबंध फिर से लगा दिए हैं। यही नहीं, अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंधों का विरोध करने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी तक दे डाली है। सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका ईरान के मसले पर अपने मित्रों से भी क्यों भिड़ जाता है? आज इसी पर चर्चा करेंगे।

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ईरान पर मंडाराते अमेरिकी प्रतिबंधों के खतरे के बीच देश की मुद्रा रियाल अब अपने सबसे निचले स्‍तर पर पहुंच गई है। ईरान में एक डॉलर के बदले अब 272,500 रियाल मिल रहा है।अमेरिका ने ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को दोबारा बहाल कर दिया है। संयुक्तराष्ट्र के ऐतिहासिक 75वें सत्र के दौरान अमेरिका की घोषणा ने बाकी दुनिया को हैरत में डाल दिया है।

लेकिन, अब अमेरिका अकेला पड़ गया है। चीन और रूस तो उसके खिलाफ हैं ही, मित्र देश ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी भी विरोध में खड़े हो गए हैं। ईरानी हसन रुहानी ने कहा है कि इस मामले में अमेरिका मुंह की खाएगा। अमेरिका ने ईरान पर इन प्रतिबंधों का विरोध करने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी है।

दरअसल, कोरोना काल में कई देशों के बीच केमिस्ट्री बन-बिगड़ रही है। भारत-चीन के तनाव के बीच हाल ही में अमेरिका ईरान पर बौखलाया हुआ है। यहां तक कि वो ईरान पर लंबे-चौड़े व्यापारिक प्रतिबंध लगाने की बात कर रहा है।

बता दें कि ईरान पर पहले से ही कई तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं। अब दूसरे देश उन्हें हटाने के पक्ष में हैं, लेकिन अमेरिका का रुख पहले से भी सख्त हो गया है। मामला ये है कि 2015 में ईरान ने परमाणु समझौते पर हामी भरी थी।

इसके बाद संयुक्तराष्ट्र ने उस पर लगे व्यापारिक प्रतिबंधों में ढील दे दी थी। बाद में ईरान अपने वादे से फिर गया और खुद को परमाणु ताकत बनाने की तैयारी शुरू कर दी। इसी बात पर अमेरिका भड़का हुआ है और उस पर पाबंदी को और सख्त बनाने की बात कर रहा है। मकसद ये है कि ईरान अलग-थलग पड़ जाए और परमाणु शक्ति पर अपना काम रोक दे।

पहले अमेरिका और ईरान के बीच अच्छे संबंध थे। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दोनों के बीच तनाव की शुरुआत तेल को लेकर हुई। ईरान में भारी मात्रा में कच्चे तेल का भंडार मिला। इसे पाने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में अपनी पसंद की सरकार लानी चाही। ईरानी जनता की अपनी पसंद थी। 1953 में अमेरिका ने ब्रिटेन के साथ मिल कर ईरान में तख्ता पलट करा दिया। पीएम को हटा कर अमेरिका ने अपनी पसंद के शाह रजा पहलवी को सत्तासीन करा दिया।

ईरानी जनता के भीतर ही भीतर गुस्सा उबलता रहा। आखिरकार इसे उसकी पसंद के नेताओं का साथ मिला और ईरान में क्रांति हो गई। 1979 में हुई इस क्रांति के बाद ईरान एक इस्लामी गणतंत्र बन गया। इसके बाद से ही वो ज्यादा रूढ़िवादी होता गया और अमेरिका से उसके संबंध खराब ही होते चले गए।

आखिरकार 1980 में ईरान और इराक के बीच हुए युद्ध में अमेरिका ने दोस्त ईरान को छोड़ कर इराक का साथ दिया। नतीजा, युद्ध में ईरान को भारी नुकसान हुआ। इसके बाद से ही वो परमाणु ताकत बनने की सोचने लगा।

साल 2002 में पहली बार ईरान के परमाणु कार्यक्रम की भनक दुनिया को लगी। तब अमेरिका और भड़क गया। उसने दूसरे यूरोपीय देशों से बात करके ईरान पर व्यापारिक पाबंदियां लगा दीं। तब से ईरान अलगाव ही झेल रहा था। इसके तहत ईरान के साथ हथियार का व्यापार नहीं हो सकता है। खासकर हेलीकॉप्टर और फाइटर मिसाइलें नहीं खरीद सकता।

कोई भी देश उसकी मदद करेगा तो उसे भी अमेरिका के प्रतिबंधों का सामना करना होगा। पाबंदी के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम में शामिल सभी वैज्ञानिकों के आने-जाने पर रोक है। यहां तक कि उनकी संपत्ति भी फ्रीज हो चुकी है।

इसमें 2015 में ढील मिली। ओबामा के शासनकाल में अमेरिका समेत ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस, जर्मनी और ईरान के बीच में परमाणु कार्यक्रम पर एक समझौता हुआ। इसके साथ ही उस पर से कई आर्थिक प्रतिबंध हट गए। इस समझौते को ज्वाइंट कम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) कहा गया।

प्रतिबंध अक्टूबर 2018 में खत्म होने वाला था, जिसके बाद ईरान पर लगी पाबंदियां हट जातीं। डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से ईरान और अमेरिका के बीच समीकरण दोबारा गड़बड़ाने लगे। ट्रंप ने ओबामा के दौरान हुए समझौते को एकतरफा कहा और उसे रद्द कर दिया। दोबारा सारे आर्थिक प्रतिबंध लागू हो गए। अमेरिका ने वहां की आर्मी को आतंकी तक कह दिया।

कुल मिला कर अमेरिकी सरकार के मुताबिक ये प्रतिबंध खत्म होने से पहले दोबारा लागू हो जाएंगे। अब प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने की बात पर अमेरिका के सहयोगी देश भी राजी नहीं हैं। संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में 13 ट्रंप की जिद को अमान्य ठहरा रहे हैं।

यूरोपियन यूनियन ने शांति की बात करते हुए ईरान से पाबंदियां हटाने की बात की, लेकिन ट्रंप इस पर राजी नहीं हैं। ईरान भी लगातार परमाणु हथियारों पर काम कर रहा है। ये बात ट्रंप को और भड़का रही है। ईरानी जनरल सुलेमानी की अमेरिकी हमले में मौत पर ईरान भी गुस्से में है और जब-तब अमेरिका के खिलाफ बयान देने लगा है।

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