Successful treatment: भारत आए इराकी परिवार के तीन बच्चों का सफल इलाज करने का कारनामा किया गया है। तीनों ही बच्चे ‘थैलेसीमिया मेजर’ नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित थे। उनकी उम्र 10, 13 और 19 साल है।
Successful treatment: फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम के डॉक्टरों ने किया कमाल
इंफोपोस्ट न्यूज
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!Successful treatment: फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम के डॉक्टरों ने इराक के एक ही परिवार से आए तीन बच्चों के सफल इलाज का कारनामा किया है। यह तीनों ही बच्चे ‘थैलेसीमिया मेजर’ नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित थे जिनकी उम्र 10, 13 और 19 साल की है।
फोर्टिस अस्पताल के प्रिंसिपल डायरेक्टर और हिमैटोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉक्टर राहुल भार्गव ने बताया कि थैलेसीमिया मेजर एक जैनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है यानी बच्चों में यह समस्या उनके माता-पिता से आती है। इस बीमारी के पीड़ितों के शरीर में सामान्य से कम हिमोग्लोबिन बनता है। ऐसे में इसके पीड़ितों को हर महीनों ब्लड ट्रांस्फ्यूजन करवाना पड़ता है।
हार्ट और लीवर पर प्रतिकूल असर
छोटी उम्र लगातार ब्लड ट्रांस्फ्यूजन की वजह से हार्ट और लीवर पर प्रतिकूल असर पड़ता है साथ ही इसकी वजह से शरीर की अन्य मुख्य इंद्रियां भी प्रभावित हो सकती हैं। डॉक्टर भार्गव ने आगे कहा, ‘इराक से आए इन तीनों बच्चों की जरूरी जांचें करने के बाद हमने बोन मैरो ट्रांस्प्लांट के जरिये उनका इलाज करने का निर्णय किया।
अच्छी बात यह रही कि इन तीनों पीड़ित बच्चों के अन्य दो सगे भाइयों से बोन मैरो ट्रांस्प्लांट के लिए मैचिंग हो गई और उनका 300 मिलीलीटर खून लेकर हमने ट्रांस्प्लांट की सफल प्रक्रिया को अंजाम दिया। इलाज की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान तीनों बच्चों को 14 दिन के लिए अस्पताल में रखा गया और अंत में उन्हें पूरी तरह से स्वस्थ करके उन्हें छुट्टी दे दी गई।’
तीनों बच्चों का इलाज डॉक्टर विकास दुआ के नेतृत्व में
इन तीनों बच्चों का इलाज पीडियेट्रिक हिमैटोलॉजी के प्रमुख डॉक्टर विकास दुआ के नेतृत्व में किया गया। डॉक्टर दुआ ने बताया कि इन मरीजों की उम्र काफी कम थी और लगातार ब्लड ट्रांस्फ्यूजन होने से उनके शरीर में आयरन की मात्रा काफी बढ़ गई थी। कुछ दवाइयों और दूसरी प्रक्रियाओं के जरिये कई समस्याओं को नियंत्रित करने के बाद उन हमने बोन मैरो जिसे स्टेम सेल ट्रांस्प्लांट के नाम से भी जाना जाता है उस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया।
डॉक्टर विकास के दुआ के मुताबिक दुनिया भर में थैलेसीमिया मेजर से ग्रसित बच्चें की सबसे ज्यादा संख्या हमारे देश भारत में है। यहां इसके मरीजों की संख्या डेढ़ लाख है और हर साल करीब 10 से 15 हजार बच्चे थैलेसीमिया की समस्या से ग्रस्त होकर जन्म लेते हैं। लेकिन अब इस बीमारी का इलाज मूमकिन है जरूरत केवल इस बात की है कि समस्या का पता चलते ही पीड़ित विशेषज्ञ डॉक्टरों से संपर्क करें और सही दिशा में उन्हें इलाज उपलब्ध हो सके।


