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धर्म दर्शन का स्वरूप और उसका विस्तार

September 5, 2020
Nature of Dharma philosophy and its expansion

आर के तिवारी

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धर्म का सम्यक दर्शन मोक्ष प्रदान करता है। संस्कृत में कहा गया है—सम्यक दर्शन संपन्न: कर्मभि: न निबद्धयते। अर्थात सम्यक दर्शन से संपन्न व्यक्ति को कर्म बांध नहीं पाते। वास्तव में हम अपने कर्मों से बंधे होते हैं। आज कल तो कुछ ज्यादा ही हम अपने कर्मों से बंधे होते हैं। फोन की बेहतर सुविधा होने पर भी किसी प्रियजन को फोन तक नहीं कर पाते।

दरअसल, विश्व में कई धर्म हैं। प्रत्येक धर्म की अपनी मान्यताएं, धार्मिक क्रियाविधियां, विश्वास, धार्मिक स्वरूप, धार्मिक मूल्य और सत्य हैं। धर्म दर्शन के अंतर्गत धर्म के उपरोक्त विभिन्न तत्वों की बौद्धिक व्याख्या प्रस्तुत की जाती है।

प्रत्येक धर्म में परम सत्ता के रूप में किसी परा शक्ति की परिकल्पना की गई है। धर्म दर्शन के अंतर्गत उस परम सत्ता के विषय में भी गूढ़ चिंतन और दार्शनिक सिद्धान्त प्रस्तुत किया जाता है। इस तरह धर्म दर्शन के अंतर्गत विभिन्न धर्मों का संपूर्ण विश्व के संदर्भ में विचार प्रस्तुत किया जाता है। धर्म विशेष में मान्य परम सत्ता का दार्शनिक स्वरूप प्रस्तुत किया जाता है।

धर्म दर्शन का क्षेत्र व्यापक है। धर्म दर्शन के अंतर्गत, धर्म के दार्शनिक और आनुष्ठानिक भागों की तर्कपूर्ण व्याख्या की जाती है। धर्म के दार्शनिक भाग के अंतर्गत, धर्म विशेष के मूल तत्व, उसके उद्देश्य और परम सत्ता की परिकल्पना होती है। धर्म दर्शन के अंतर्गत परमसत्ता अथवा ईश्वर के अस्तित्व का दार्शनिक विवेचन किया जाता है कि क्या कोई परमसत्ता (ईश्वर) है?

परमसत्ता के अस्तित्व के क्या प्रमाण हैं? परमसत्ता निर्गुण है अथवा सगुण है? परमसत्ता ने जगत की सृष्टि क्यों की? धर्म के पौराणिक भाग, जिसके अंतर्गत आत्मा क्या है? अमरता क्या है? क्या अमरत्व मनुष्य के लिए उपलब्ध है?

प्रत्येक धर्म में उनके महापुरुष हुए है, जिनके जीवन के संबंध में अलौकिक कहानियां हैं। उनके अनुभवों और उपदेशों के उदाहरणों के आधार पर उस धर्म के सूक्ष्म दार्शनिक भाग की व्याख्या की जाती है। धर्म के आनुष्ठानिक भाग, जो कि किसी भी धर्म का स्थूल भाग होता है, जिसमें पूजा पद्धतियां, अनुष्ठान, आचारसंहिता, मान्यताएं, आदि होती हैं।

उन्हें तार्किक आधार पर समीक्षा और उपयोगिता प्रस्तुत की जाती है। धर्म दर्शन में धार्मिक मान्यताओं का निरपेक्ष तार्किक विश्लेषण किया जाता है। उसके बाद सत्य के रूप में स्वीकार किया जाता है। धर्म दर्शन धर्म की नैतिक मान्यताओं और आदर्शवाद का तार्किक विश्लेषण करता है। धर्म दर्शन धर्मों के दार्शनिक और आनुष्ठानिक पद्धतियों का तुलनात्मक अध्ययन करता है।

धर्म दर्शन के जरिये धर्म का, कला, मानव शास्त्र, नीति शास्त्र से संबंधों का अध्ययन किया जाता है। धर्म दर्शन के जरिये धर्म के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन किया जाता है। धर्म व्यक्ति और समाज को सर्वाधिक प्रभावित करता है। अतः धर्म दर्शन के अंतर्गत धर्म की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी समीक्षा की जाती है।

धर्म दर्शन विभिन्न धर्मों के बीच सामान्य धार्मिक सिद्धान्तों की स्थापना करने का प्रयास करता है। मानवतावाद, धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक सहिष्णुता के लिए सामान्य सिद्धान्तों पर विचार और विभिन्न धार्मिक विभेदों के बीच धार्मिक एकता की संभावना, धर्म दर्शन के चिंतन की विषय वस्तु है।

धर्म दर्शन विभिन्न धार्मिक मान्यताओं का निरपेक्ष परीक्षण करता है। यह परीक्षण बुद्धि और तर्क पर आधारित होता है। धर्म दर्शन के जरिये धर्म के स्वरूप, मूल्यों और सत्य की दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। यह धर्म और धार्मिक अनुभूतियों का ऐतिहासिक विकास, मनोवैज्ञानिक प्रभाव और सामाजिक दृष्टिकोण से भी चिंतन करता है।

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