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Lok Sabha Elections1: मोदी और शाह के दावों के समक्ष इंडिया का  जनसैलाब

infopost February 27, 2024
Lok Sabha Elections

Lok Sabha Elections1: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 370 सीटें मिलेंगी और एनडीए गठबंधन सीटों की संख्या के मामले में 400 पार कर जाएगा। उनकी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। क्योंकि बंगाल के विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसे ही दावे किए जा रहे थे, लेकिन वे सारे के सारे दावे धरे के धरे रह गए। अब जिस तरह से इंडिया गठबंधन दोबारा उठ खड़ा हुआ है, उससे मोदी जी के दावों को हास्यास्पद बताया जाने लगा है। आज चर्चा उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हालात पर।

Lok Sabha Elections1: इंडिया गठबंधन को मिला अभूतपूर्व जन समर्थन

इंफोपोस्ट डेस्क

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Lok Sabha Elections1: राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा और डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में मोदी की राहें आसान नहीं लग रही हैं। जैसा कि आपको पता ही होगा कि अखिलेश यादव और राहुल गांधी को अलीगढ़ से लेकर आगरा तक जन सैलाब का जो रेस्पांस मिला, वह अभूतपूर्व था। भाजपा नेतृत्व भी यह मानता है कि लोकसभा सीटों के मामले में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 30 पर भाजपा को कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।

उत्तर प्रदेश की दो बेल्ट ऐसी हैं, जहां भाजपा अत्यधिक कमजोर स्थिति में है। एक बेल्ट है पश्चिमी उत्तर प्रदेश की, जिसमें सहारनपुर, मुजफ्फर नगर, कैराना, अमरोहा, मुरादाबाद, बदायूं, इटावा और मैनपुरी में मुसलमानों की जनसंख्या 30 से 32 प्रतिशत है। दूसरी और महत्वपूर्ण बेल्ट है पूर्वी उत्तर प्रदेश की, जिसमें आजमगढ़, मउ, गाजीपुर, अंबेडकर नगर, प्रयागराज और रायबरेली आते हैं। यहां भी एनडीए और इंडिया गठबंधन में कड़ा मुकाबला है।

इंडिया के पक्ष में मुसलिम मतदाता एकजुट हो गए तो क्या होगा?

पूरे उत्तर प्रदेश की बात करें, तो कुल 19 से 20 प्रतिशत मुसलिम मतदाता हैं। और कुछ सीटों पर तो इनकी संख्या 30 से 35 प्रतिशत तक है। इसके अलावा यदि यादव और अन्य पिछड़ी जातियों का समर्थन इंडिया गठबंधन को मिलता है तो एनडीए के ​लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी। इंडिया गठबंधन का आकलन है कि इन परिस्थितियों में भाजपा को 25 सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। यहां यह भी सवाल है कि इन 25 सीटों की भरपाई मोदी जी कहां से करेंगे?

इन हालात को शायद भाजपा के चाणक्य अमित शाह अच्छी तरह समझ रहे थे। तभी तो उन्होंने प्रोफेसर राम गोपाल यादव पर दबाव बनाया कि वह अपने भतीजे अखिलेश यादव को समझाएं कि समाजवादी पार्टी किसी भी हालत में इंडिया गठबंधन का हिस्सा न बने। लेकिन हुआ इसका उलटा। अखिलेश यादव अपनी साइकिल चलाते हुए इंडिया गठबंधन के दरवाजे पर पहुंच गए। यही नहीं, अमित शाह ने मायावती पर भी दबाव बनाया कि मायावती न केवल अकेले चुनाव लड़ें, बल्कि वह ओवैसी को भी साथ ले लें। ताकि लगभग पांच प्रतिशत मुसलिम वोटों को इंडिया गठबंधन से काटा जा सके।

जयंत चौधरी को साथ लाने की मुहिम क्यों?

जयंत चौधरी 19 जनवरी तक अखिलेश यादव के साथ थे। और उन्होंने सात सीटों पर अखिलेश यादव के साथ समझौता भी कर लिया था। फिर सवाल है कि आखिर जयंत और अखिलेश की दोस्ती क्यों टूटी? जाहिर है कि मोदी और शाह उत्तर प्रदेश में एक एक सीट के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। क्योंकि उत्तर प्रदेश ही वह राज्य है जो मोदी जी की जीत और हार तय करेगा। जैसा कि आप जानते ही हैं कि मोदी जी उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में 70 से 75 सीटें जीत पाए तो 2024 में उन्हें रोक पाना असंभव सा हो जाएगा। लेकिन यदि उत्तर प्रदेश में मोदी जी की सीटें कम होकर 60 पर पहुंच जाती हैं तो उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव बहुत ही दिलचस्प होने जा रहा है।

इस संदर्भ में प्रोफेसर रविकांत कहते हैं, अखिलेश यादव ने अपने राजनीतिक जीवन में बहुत ही उचित कदम उठाया है। उधर, नीतीश ने इंडिया गठबंधन छोड़ा तो यह नरेटिव बनने लगा था कि इंडिया गठबंधन बिखर चुका है और विपक्ष में इतना दम नहीं रह गया है कि वह मोदी जी का मुकाबला कर सके। लेकिन अब अखिलेश यादव के इंडिया गठबंधन में आ जाने से यादव और मुसलिम बहुल 24 सीटों पर इंडिया गठबंधन काफी मजबूत नजर आ रहा है। राहुल गांधी की न्याय यात्रा ने अलग ही समा बांध रखा है। और जब खड़गे अपना कमाल दिखाएंगे तो इंडिया गठबंधन और भी मजबूती के साथ आगे बढ़ेगा।

क्या मुसलमान इस बार किसी भी हालत में नहीं बंटेगा?

Lok Sabha Elections1: मुसलिम समीकरण के एक्सपर्ट हिसाम सिद्दीकी कहते हैं, इस बार मुसलमानों को किसी भी हालत में नहीं बांटा जा सकेगा। इस बार ओबैसी भी कुछ नहीं कर पाएंगे। क्योंकि मुसलमानों ने एकजुट होकर मतदान करने का मन बना लिया है। अगर इंडिया गठबंधन ने संजीदगी से चुनाव लड़ लिया तो 20 सीटें समाजवादी पार्टी ले जाएगी और छह सीटें जीतने में कांग्रेस कामयाब रहेगी। क्योंकि हाल ही में मुजफ्फरनगर के एक उपचुनाव में भाजपा हार चुकी है। किसान आंदोलन और जाटों के अपमान असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखेगा ही। अगर उत्तर प्रदेश में मतदान प्रतिशत अधिक रहा तो भाजपा को लोहे के चने चबाने पड़ेंगे।

पूर्वी उत्तर प्रदेश की बात करें तो आजमगढ़ की सीट अब भाजपा के लिए आसान नहीं होगी। सबसे बड़ी बात यह है कि बेरोजगारों की फौज पर जिस तरह लाठियां भांजी गईं, उसे क्या उत्तर प्रदेश का युवा भूल पाएगा? राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के दौरान जिस तरह तमाम हिंदू साधु महात्माओं की उपेक्षा की गई, उससे हिंदुओं के एक वर्ग का वोट भाजपा से छिटक गया लगता है। मर्यादा पुरुषोत्म राम के लिए मोदी जी ने जिस तरह मर्यादाओं को तोड़ा और उनका चुनावी इस्तेमाल किया, यह हिंदुओं के एक बहुत बड़े वर्ग को अच्छा नहीं लगा था। साथ में यह भी प्रचार जोर पकड़ रहा है कि यह अंतिम चुनाव है। इस बार मतदाता चूके तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। चंडीगढ़ ने इसका प्रमाण भी दे दिया है। इसलिए कुछ मतदाता एक अनजाने से भय को दूर करने के लिए भाजपा के खिलाफ मतदान करेंगे।

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