Law Making: इतिहास गवाह है कि केंद्र सरकार को किसान कानूनों को वापस लेना पड़ा था। भूमि अधिग्रहण मामले में भी सरकार को यू टर्न लेना पड़ा था। हिट और रन पर अंकुश के लिए कानून बनाया गया तो ड्राइवरों की हड़ताल से देश भर के लोगों को परेशान होना पड़ा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कानून सोच समझकर नहीं बनाए जाते?
Law Making: फिलहाल ये कानून लागू नहीं होगा
Law Making: हिट एंड रन कानून का क्या हश्र हुआ, यह बताने की जरूरत नहीं है। केंद्र सरकार ने अखिल भारतीय परिवहन कांग्रेस के साथ बैठक के बाद ड्राइवर्स से हड़ताल वापस लेने की अपील की। सरकार ने कहा कि फिलहाल ये कानून लागू नहीं होगा।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!गृह मंत्रालय ने मीटिंग के बाद कहा कि कानून अभी लागू नहीं हुआ है। ऐसे में ड्राइवर की चिंताओं को लेकर सरकार खुले मन से चर्चा के लिए तैयार है। गृह सचिव अजय भल्ला ने कहा, आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 दो में 10 साल की सजा और जुर्माने के प्रावधान के बारे में वाहन चालकों की चिंता का संज्ञान लिया है।
वाहन को मौके पर छोड़कर क्यों भाग जाते हैं ड्राइवर?
समझने की कोशिश करते हैं कि हिट एंड रन कानून में ऐसी क्या खामी थी कि ड्राइवरों को देशव्यापी हड़ताल करनी पड़ी। इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी हो जाता है कि देश के ड्राइवर किन परिस्थितियों में काम करते हैं। दुर्घटना के समय ज्यादातर ड्राइवर घायल हुए व्यक्ति को अस्पताल नहीं पहुंचाते। वे अपने वाहन को मौके पर छोड़कर भाग जाते हैं।
इसके पक्ष में ड्राइवरों का कहना है कि हादसे के समय भीड़ उग्र हो जाती है। उस समय उसे कुछ भी समझ नहीं आता। ऐसा भी हो सकता है कि भीड़ ड्राइवर और वाहन को मौके पर ही जला दे। इसलिए ड्राइवर अपनी जान बचाने के लिए दुर्घटना स्थल से भाग जाते हैं। नए कानून के तहत उनके लिए एक तरफ कूंआ तो दूसरी तरफ खाई है। यदि वे मौके से नहीं भागते तो उन्हें भीड़ मार डालेगी और भाग जाते हैं तो उन्हें हिट एंड रन कानून मार डालेगा। क्योंकि इस कानून में दस साल की सजा और सात लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।
हिट एंड रन कानून बनाए जाने के तरीके पर सवाल
Law Making: भारतीय न्याय संहिता की इस धारा का संबंध जिन लोगों से है, उनसे कोई चर्चा तक नहीं की गई होगी। भारतीय न्याय संहिता का यह विधेयक जिस समय लोकसभा में पास हुआ उस समय लोकसभा के ही 97 सांसद निलंबित किए जा चुके थे। ऐसे में बिना किसी चर्चा के विधेयक को पास करा लिया गया। तभी तो किसी न किसी कानून को बनाने के बाद वापस ले लिया जाता है या बना कर उसे लागू ही नहीं किया जाता।
आंकड़ों की बात करें ता 15वीं लोकसभा में यूपीए सरकार के दौरान 72 प्रतिशत बिल स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजे गए तो 17वीं लोकसभा में मोदी सरकार में यह आंकड़ा गिरकर 16 प्रतिशत पर आ गया है। लोकसभा के शीतकालीन सत्र की बात करें तो एक भी बिल सदन की समिति के पास नहीं भेजा गया। भारतीय न्याय संहिता 20 दिसंबर को लोकसभा में और 21 दिसंबर को राज्यसभा में पास हुई। 25 दिसंबर को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी। इस प्रकार कानून बनाए जाने से पहले उस पर विचार विमर्श की प्रक्रिया लुप्त सी होती जा रही है।
अतिआत्मविश्वास के भंवर में फंसती जा रही है सरकार
Law Making: विपक्षहीन, चर्चाहीन और संवादहीन विधेयकों और कानूनों का वही हश्र होता है, जो तीनों कृषि कानूनों का हुआ था। फिर भी सरकार अतिआत्मविश्वास के भंवर में फंसती जा रही है। वह नागरिकता कानून के नियम तक लागू नहीं करा सकी है। अब कहा जा रहा है कि वे नियम तैयार हैं और शीघ्र ही लागू कर दिए जाएंगे। कानून बनाते समय इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि जिस समस्या के समाधान के लिए कानून बनाए जा रहे हैं, उस समस्या के प्रमुख कारण क्या हो सकते हैं।
ठीक उसी प्रकार हादसों और मौतों को कम करने के लिए जो हिट एंड रन कानून बनाया गया, उसमें शायद सड़क दुर्घटनाओं अन्य प्रमुख कारणों पर विचार नहीं किया गया। हालत यह है कि किसी को भी मोटरड्राइविंग का लाइसेंस मिल जाता है। ड्राइवरों के उचित प्रशिक्षण और उनकी आंखों जांच तक की कोई उपयुक्त व्यवस्था नहीं है। एक सर्वे में पाया गया कि ज्यादातर ड्राइवरों की आंखों में दृष्टि दोष है। लेकिन न तो इसकी जांच का अभियान चलाया गया और न ही उनकी आंखों के उपचार का।
सड़क दुर्घटनाओं के अलग अलग कारणों पर नहीं किया गया विचार
Law Making: सड़क हादसों का एक प्रमुख कारण खस्ताहाल सड़कों को माना जाता है। सड़कों की खराब डिजाइन पर तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता। लेकिन इस वजह से सड़क दुर्घटनाएं कहीं ज्यादा होती हैं। फिर भी इसके लिए किसी की जिम्मेदारी तय नहीं है। एक तरफ तमाम सड़कों पर रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं है तो दूसरी तरफ यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि सड़क पर गड्ढे हैं या गड्ढे में सड़क। सोने पर सुहागा यह है कि सड़कों पर मवेशियों की आमदरफ्त इतनी ज्यादा होती है कि उनके कारण होने वाले सड़क हादसों की खबरों की भरमार होती है। उत्तर प्रदेश में सांड़ों ने सड़क पर कितने लोगों को पटक कर मार दिया, गिनाना कठिन है।
उत्तर प्रदेश सरकार को सांड़ों के कारण होने वाले सड़क हादसों को आपदा की सूची में डालना पड़ा है। तभी तो सरकार इस मद में चार लाख रुपये का मुआवजा देने को बाध्य होती है। सवाल सड़कों से सांड़ को हटाने का है, लेकिन जवाब मुआवजे के रूप में दिया जा रहा है। कुल मिलाकर सांड़ को आपदा घोषित किया जा रहा है तो ड्राइवरों को अपराधी। देश के ज्यादातर लोग अपना वाहन खुद चलाते हैं। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि वे किसी को ड्राइवर की नौकरी पर रख सकें। इसलिए हिट एंड रन कानून का दायरा ड्राइवरों तक सीमित नहीं है। उसके दायरे में हर वह व्यक्ति आता है, जो अपना वाहन खुद चलाता है। इस कानून पर आप क्या सोचते हैं, कमेंट करके जरूर बताएं।
पहले भी बैकफुट पर आ चुकी है सरकार
Law Making: अब बात करते हैं दूसरे ऐसे कानूनों की, जिन्हें बिना पर्याप्त विचार विमर्श के बनाया गया और वापस भी लेना पड़ा। कृषि कानून वापस लिए जाने से पहले भी सरकार बैकफुट पर आ चुकी है। केंद्र सरकार ने संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर चार बार अध्यादेश जारी किए थे। 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को फजीहत झेलनी पड़ी थी। ये मौका था भूमि अधिग्रहण कानून का और उस वक्त अंत में विधेयक वापस लेना पड़ा था।
यह विधेयक भी किसानों से जुड़ा हुआ था और उस वक्त भी किसानों में उबाल था। पूरे देश में विधेयक को लेकर विरोध किया गया था। उस दौरान भी पीएम मोदी को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कहना पड़ा था कि वे भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस ले रहे हैं। केंद्र सरकार ने संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर चार बार अध्यादेश जारी किए थे, लेकिन वह संसद से बिल को मंजूरी नहीं दिला पाई। अंत में यह वापस भी लेना पड़ा।
हुआ क्या था इस कानून के साथ?
Law Making: हुआ यूं था कि 2014 में सरकार में आते ही नरेंद्र मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 में संशोधन को लेकर एक अध्यादेश लेकर आई थी। अध्यादेश के जरिये सरकार ने 2013 के कानून में कई बदलाव किए थे। यह अधिनियम यूपीए सरकार का था जो पहली जनवरी 2014 से प्रभावी हो चुका था। यह अधिनियम भूमि अधिग्रहण कानून, 1994 के बदले में था जो कई वर्षों से चला आ रहा था। यूपीए का कानून लागू होने के लगभग एक साल बाद यानी कि 31 दिसंबर 2014 को एनडीए सरकार ने इस कानून में संशोधन का अध्यादेश पारित कर दिया।
मोदी सरकार से पहले कांग्रेस सरकार भी ऐसा ही कर चुकी है। यूपीए सरकार के पीएम मनमोहन सिंह ने अपराधी ठहराए गए सांसदों और विधायकों को बचाने वाले विवादास्पद अध्यादेश को वापस ले लिया था। यह अध्यादेश जनप्रतिनिधि कानून से जुड़ा था जिसमें एक अध्यादेश और एक विधेयक था। यूपीए सरकार ने ऐलान किया कि विरोध को देखते हुए सरकार अध्यादेश और विधेयक दोनों वापस ले रही है।
यूपीए सरकार के अध्यादेश में साफ था कि दोषी ठहराए जाने के बावजूद सांसद या विधायक कोर्ट में अपील करने तक अपने पदों पर बने रह सकते हैं। विरोध को देखते हुए राहुल गांधी ने इस अध्यादेश को बकवास करार दिया था और सरकार को अंत में इसे वापस लेना पड़ा था।


