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Electoral system: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और ईसी से मांगा जवाब

infopost January 17, 2026
Electoral system

Electoral system: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा नोटिस। चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर SC सख्त। केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब तलब। क्या नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे सवाल? निष्पक्ष चुनाव और लोकतंत्र का सवाल। अगली सुनवाई पर टिकी देश की नजर।

Electoral system: चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा अहम मामला

इंफोपोस्ट न्यूजडेस्क/नई दिल्ली/Electoral system

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सुप्रीम कोर्ट ने देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर दायर एक याचिका पर जारी किया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मौजूदा नियुक्ति प्रणाली संविधान की भावना, निष्पक्षता और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है।

सर्वोच्च अदालत की पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे गंभीर संवैधानिक महत्व के हैं और इन पर विस्तृत विचार की आवश्यकता है। इसी आधार पर अदालत ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से इस मामले में अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है।

याचिका में क्या है मुख्य आपत्ति

याचिका में कहा गया है कि वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इससे चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता प्रभावित होती है और निष्पक्ष चुनाव कराने की उसकी क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लगता है।

Electoral system: याचिका में यह भी दलील दी गई है कि संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का स्पष्ट उल्लेख है, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कोई पारदर्शी और संतुलित तंत्र न होने के कारण यह स्वतंत्रता व्यवहार में कमजोर पड़ती है।

मुख्य न्यायाधीश को नियुक्ति में शामिल किया जाए

याचिका में मांग की गई है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र चयन समिति बनाई जाए, जिसमें प्रधानमंत्री के साथ-साथ विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके प्रतिनिधि को शामिल किया जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था से नियुक्तियों में निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकती है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि अन्य संवैधानिक संस्थाओं, जैसे सीबीआई या लोकपाल की नियुक्ति में बहु-सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान है, लेकिन चुनाव आयोग जैसी अहम संस्था के लिए ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग लोकतंत्र का प्रहरी है और उसकी स्वतंत्रता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर ही संदेह हो, तो यह पूरे चुनावी तंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत किसी संस्था की मंशा पर सवाल नहीं उठा रही है, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहती है कि संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप एक मजबूत और निष्पक्ष व्यवस्था कायम रहे।

केंद्र सरकार से मांगा गया जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित मौजूदा कानूनी ढांचे, परंपराओं और मानकों पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करे। अदालत यह जानना चाहती है कि क्या वर्तमान व्यवस्था संविधान की भावना के अनुरूप है और क्या इसमें सुधार की आवश्यकता है।

केंद्र सरकार की ओर से अदालत को यह भी बताने को कहा गया है कि क्या भविष्य में नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए किसी विधायी या प्रशासनिक कदम पर विचार किया जा रहा है।

चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल

याचिका में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर भी कुछ सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया में आयोग की कोई भूमिका न होना उसकी संस्थागत स्वतंत्रता को कमजोर करता है।

हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से यह रुख अपनाया गया है कि वह एक संवैधानिक संस्था के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्पक्षता के साथ करता है और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे मुख्य रूप से सरकार और संसद के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट के इस नोटिस के बाद राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि लंबे समय से चुनाव आयोग की नियुक्तियों को लेकर पारदर्शिता की मांग की जा रही थी।

वहीं, सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने कहा है कि मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया संविधान सम्मत है और इस पर सवाल उठाना संस्थाओं को कमजोर करने जैसा है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सरकार अपना पक्ष मजबूती से रखेगी।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

संवैधानिक कानून के जानकारों का मानना है कि यह मामला भारतीय लोकतंत्र के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सुप्रीम कोर्ट नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर दिशा-निर्देश जारी करता है, तो इससे चुनाव आयोग की संरचना और कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव संभव हैं।

कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अदालत इस मामले में संसद को कानून बनाने का सुझाव दे सकती है, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया को स्पष्ट और संस्थागत रूप दिया जा सके।

लोकतंत्र पर संभावित असर

भारत में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ माने जाते हैं। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का सवाल न केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की लोकतांत्रिक छवि को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि न्यायपालिका संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और निष्पक्षता को लेकर सजग है।

आगे की सुनवाई पर टिकी निगाहें

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को तय समय सीमा के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद मामले की विस्तृत सुनवाई होगी, जिसमें यह तय किया जाएगा कि नियुक्ति प्रक्रिया में किसी तरह के सुधार या दिशा-निर्देश की आवश्यकता है या नहीं।

Electoral system: फिलहाल, यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष विचाराधीन है और आने वाले दिनों में इस पर होने वाले फैसले का असर देश की चुनावी और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर दूरगामी हो सकता है।

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