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Lakhimpur Kheri Violence and journalist: क्या सिर्फ दबाव की भाषा समझती है सरकार ?

October 5, 2021
Lakhimpur Kheri Violence and journalist

Lakhimpur Kheri Violence and journalist: शायद आपको मालूम हो कि किसी बड़े मीडिया संस्थान में काम कर रहे युवा पत्रकार का वेतन कितना होता है। लखीमपुर हिंसा में साधना न्यूज़ चैनल के तहसील रिपोर्टर रमन कश्यप (उम्र 35 वर्ष) की मौत पर क्या हम इतना संवेदनाहीन हो गए हैं कि चर्चा तक नहीं हो रही है। उनके परिजनों को मुआवजा दिए जाने का मुद्दा मीडिया और सरकार के लिए गैरजरूरी क्यों है? शायद इसलिए कि पत्रकारों का कोई प्रेशर ग्रुप नहीं है।

Lakhimpur Kheri Violence and journalist: रमन कश्यप के परिजनों को मुआवजा क्यों नहीं?

अंकित तिवारी

Lakhimpur Kheri Violence and journalist: किसान संगठनों के दबाव में सरकार ने मुआवजा राशि की घोषणा कर दी है। मृतकों के परिजनों को 45-45 लाख रुपये दिए जाने की बात सरकार की ओर से कही गई है। घायलों को 10 लाख रुपये दिए जाएंगे। मृतकाश्रित को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी। लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा का दम भरने वाली सरकार पत्रकार रमन कश्यप की मौत पर संवेदनाहीन कैसे हो सकती है?

यह पत्रकार तो वहां आंदोलन भी नहीं कर रहा था। वह तो आप तक सूचना पहुंचाने के लिए जान हथेली पर रख कर गया था। रमन कश्यप के पिता के हवाले से यह भी बताया गया है कि रमन को कार से रौंदकर मारा गया है। यह भी चर्चा है कि उसे गोली भी लगी थी। लेकिन उसके परिजनों के लिए मुआवजे की कोई घोषणा नहीं की गई है।

क्या इसे ही कल्याणकारी राज्य कहा जाएगा?

क्या इसे ही कल्याणकारी राज्य कहा जाएगा? अगर हमारी संवेदना न जागी तो पत्रकारिता समाप्त हो जाएगी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान समाज को ही होगा। आप सब जानते हैं कि कोरोना महामारी से किस प्रकार पत्रकारों की मौत हुई ​थी। कितने पत्रकारों की मौत हुई, यह हमें नहीं बताया गया।

पत्रकार एक ऐसा तबका है, जो सर्वाधिक जोखिम के बावजूद निहायत कम वेतन में काम करने को मजबूर होता है। कारण? सरकार की नीतियां पत्रकार विरोधी हैं। तभी तो मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतन भत्ते के लिए तमाम पत्रकार लेबरकोर्ट में धक्के खाने को मजबूर हैं। यही नहीं, वेजबोर्ड की हमारे संविधान में व्यवस्था होने के बावजूद मीडिया घरानों ने कोई भी वेजबोर्ड लागू नहीं किया।

सुप्रीमकोर्ट के आदेश का भी मीडिया घरानों के लिए कोई मायने नहीं

अब तो सुप्रीमकोर्ट के आदेश का भी मीडिया घरानों के लिए कोई मायने नहीं है। ऐसा वे इसलिए कर पा रहे हैं, क्योंकि उनकी सरकार से सांठगांठ है। सरकार ने उन्हें पत्रकारों के शोषण की पूरी छूट दे रखी है। बदले में वे सरकार की गलत नीतियों का समर्थन कर रहे हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण दैनिक जागरण ने पेश किया है।

दैनिक जागरण ने अपने 4 अक्टूबर के अंक में लखीमपुर खीरी हिंसा की जो खबर छापी है, उसके शीर्षक से ही पता चल रहा है कि भाजपा सरकार से उसकी कितनी गहरी सांठगांठ है। खबर छापने के इस बेढंगे तरीके की व्यापक आलोचना भी हो रही है, लेकिन इससे दैनिक जागरण प्रबंधन को कोई मतलब नहीं है।

इसे इतना शेयर करें कि रमन के परिजनों को मिल जाए सहायता

यह वही दैनिक जागरण है, जिसके मालिकों ने मजीठिया वेजबोर्ड लागू करने से बचने के लिए देश के प्रधानमंत्री तक का इस्तेमाल कर लिया। पीएम मोदी के साथ कई बार फोटो खिंचवाई और कर्मचारियों को यह संदेश दिया कि जिसके साथ पीएम मोदी हों, वह अपने कर्मचारियों का कितना भी शोषण करे कोई उसका कुछ नहीं कर सकता। सुप्रीमकोर्ट भी नहीं।

इन परिस्थितियों में आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि रमन कश्यप के परिजनों को सरकार की ओर से कोई मदद मिल पाएगी? पत्रकारों के साथ भले ही कोई प्रेशर ग्रुप नहीं है, लेकिन आप उनका साथ दे सकते हैं। और साथ देना भी चाहिए। क्योंकि पत्रकार आपके लिए सारा जोखिम उठाते हैं। जिस दिन पत्रकार नहीं रहेंगे, उस दिन आपका जीवन जोखिम में होगा।

इसलिए यह आपका दायित्व बनता है कि इस पोस्ट को इतना ज्यादा शेयर कर दें कि सरकार रमन कश्यप के परिजनों को सहायता देने के लिए मजबूर हो जाए। आपके शेयर में बहुत ताकत छिपी है। बस जरूरत है उसे पहचानने की। इसलिए अभी शेयर करें।

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