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EVM: किसके गले की फांस बनेगी ईवीएम?

April 5, 2021
EVM

EVM: मान लेते हैं कि भाजपा ने ईवीएम लूटने की साजिश नहीं रची। लेकिन ईमादारी का तकाजा तो यही है कि भाजपा उम्मीदवार की कार ले जा रहा व्यक्ति बता देता कि यह भाजपा की कार है। इसलिए हम ईवीएम नहीं ले जा सकते। कोई देख लेगा तो बवाल हो जाएगा। कितनी भी सफाई दी जाए, फिर भी घटना ने चुनाव आयोग और भाजपा की छवि को धूमिल कर दिया है।

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EVM: भाजपा उम्मीदवार की कार से ईवीएम बरामद होने से हंगामा

श्रीकांत सिंह


नई दिल्ली। EVM: असम में भाजपा उम्मीदवार की कार से ईवीएम बरामद होने का वीडियो तो वायरल हो चुका है। कुछ कार्रवाइयां भी हुई हैं। लेकिन जो बयानबाजी चल रही है, वह दिलचस्प है। सबसे पहले भाजपा सांसद दिलीप सेकिया का बयान।

जब कांग्रेस जीतती है, तब तो ईवीएम बिल्कुल ठीक होती है। लेकिन जब वे हारते हैं, तो ईवीएम में दोष निकल आता है। यह उनकी आदत है। हमें चुनाव आयोग पर भरोसा है। हमने असम के पहले और दूसरे चरण में मैजिक नंबर को छू लिया है। तीसरा चरण तो बीजेपी के लिए बस बोनस भर है। बीजेपी कम से कम 90 सीटें तो जीत ही रही है।

जमीनी हकीकत कुछ और

लेकिन दिलीप साहब आपका तर्क तो पर्फेक्ट है। जमीनी हकीकत पर जो बयान आ रहे हैं, उनका तो आपने कोई जवाब दिया ही नहीं। क्योंकि मामला ईवीएम के दोष का नहीं, चुनाव आयोग के अधिकारियों की हरकत का है। प्रियंका गांधी की आशंकाओं को आप दूर कर देते तो बात बन जाती। ये रहा प्रियंका का शब्द बाण।

क्या स्क्रिप्ट है? चुनाव आयोग की गाड़ी खराब हुई, तभी वहां एक गाड़ी प्रकट हुई। गाड़ी बीजेपी के प्रत्याशी की निकली। मासूम चुनाव आयोग उसमें बैठ कर सवारी करता रहा। प्रिय चुनाव आयोग, माजरा क्या है? आप देश को इस पर कुछ सफाई दे सकते हैं? या हम सब मिलकर बोलें चुनाव आयोग की निष्पक्षता को वणक्कम?

दरअसल, चुनाव आयोग को इन शिकायतों पर निर्णायक रूप से कार्रवाई करने और सभी राष्ट्रीय दलों की ओर से ईवीएम पर गंभीर पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। क्योंकि राहुल गांधी का ट्वीट कम मारक नहीं है।

EC की गाड़ी ख़राब,
भाजपा की नीयत ख़राब,
लोकतंत्र की हालत ख़राब!#EVMs

— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) April 2, 2021

क्या है ईवीएम पर चुनाव आयोग का प्रोटोकाल?

EVM: चुनाव आयोग के मुताबिक, पोलिंग पार्टी की गाड़ी का एक्‍सीडेंट हो गया था। जिसके बाद वहां से गुजरने वाली एक गाड़ी से मदद ली गई। पोलिंग पार्टी ने वह गाड़ी किसकी है, यह चेक नहीं किया। आगे जाकर भीड़ ने गाड़ी को घेर लिया।

आरोप था कि गाड़ी पथरकंडी से बीजेपी प्रत्‍याशी कृष्‍णेंदु पॉल की है। और EVMs को छेड़छाड़ के लिए ले जाया जा रहा है। आयोग ने पाया कि ईवीएम की सील नहीं टूटी है। इसके बाद सभी आइटम्‍स को स्ट्रॉन्ग रूम तक पहुंचा दिया गया। EVM के चुनाव पूर्व और बाद में हैंडलिंग को लेकर आयोग की स्‍पष्‍ट गाइडलाइंस हैं, जिनका पालन हर चुनाव अधिकारी को करना होता है।

मतदान के समय कैसे मूव करती हैं ईवीएम?

किसी जिले में मौजूद सभी EVMs आमतौर पर ट्रेजरी या वेयरहाउस में सीधे जिला निर्वाचन अधिकारी के नियंत्रण में रखी जाती हैं। अपवाद हैं लेकिन वह जगह तहसील स्‍तर से नीचे नहीं होनी चाहिए। वेयरहाउस में डबल लॉक रहता है और चौबीसों घंटे पहरेदारी होती है। सीसीटीवी सर्विलांस भी होता है। जब चुनाव न चल रहे हों तो भी बिना चुनाव आयोग की अनुमति के EVMs को इधर-उधर नहीं किया जा सकता।

जब चुनाव करीब होते हैं तो ईवीएम को रैंडमली अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों के लिए अलॉट कर दिया जाता है। एक सॉफ्टवेयर के जरिये यह कवायद राजनी‍तिक दलों के लोगों की मौजूदगी में होती है। अगर प्रतिनिधि मौजूद न हों तो अलॉटेड ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की लिस्‍ट पार्टी कार्यालय से साझा की जाती है। इसके बाद ईवीएम का जिम्‍मा उस क्षेत्र के रिटर्निंग अधिकारी का होता है जो इन्‍हें स्‍ट्रॉन्‍ग रूम्‍स में रखवाते हैं।

स्‍ट्रॉन्‍ग रूम की निगरानी

एक बार फिर से पार्टी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ईवीएम को पोलिंग सेंटर भेजा जाता है। सभी मशीनों में उम्‍मीदवारों के नाम और चुनाव चिन्‍ह डालने के बाद स्‍ट्रॉन्‍ग रूम को फिर सील कर दिया जाता है।

अगर पार्टी प्रतिनिधि चाहें तो सील पर अपनी मुहर भी लगा सकते हैं। स्‍ट्रॉन्‍ग रूम की निगरानी एक सीनियर पुलिस अधिकारी (डीएसपी या उससे ऊपर रैंक) के नेतृत्‍व में होती है। कई जगह केंद्रीय बल भी स्‍ट्रॉन्‍ग रूम की सुरक्षा में तैनात होते हैं।

एक बार सील होने के बाद, स्‍ट्रॉन्‍ग रूम को केवल उसी दिन खोला जाता है जब पोलिंग पार्टियों को ईवीएम देनी होती हैं। सभी उम्‍मीदवारों और उनके इलेक्‍शन एजेंट्स को इसकी सूचना पहले ही दी जाती है। पोलिंग स्‍टेशनों तक भेजी गईं ईवीएम के अलावा कुछ रिजर्व ईवीएम भी रखी जाती हैं ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्‍तेमाल किया जा सके।

वोटिंग के बाद कैसे लौटती हैं ईवीएम?

मतदान खत्‍म हो जाने के बाद ईवीएम को फौरन स्‍ट्रॉन्‍ग रूम नहीं भेज दिया जाता। पीठासीन अधिकारी एक दस्‍तावेज तैयार करते हैं। जिसमें ईवीएम में दर्ज वोटों की संख्‍या होती है। इसकी एक प्रमाणित कॉपी हर उम्‍मीदवार के पोलिंग एजेंट को दी जाती है।

इसके बाद ईवीएम सील कर दी जाती हैं। इस सील पर उम्‍मीदवार और उनके एजेंट अपनी मुहर लगा सकते हैं, जिसको बाद में किसी छेड़छाड़ के सबूत की तरह दिखाया जा सकता है।

बूथ से ईवीएम को लेकर निकली चुनाव आयोग की गाड़ी के पीछे-पीछे उम्‍मीदवार या उनके प्रतिनिधि चलते हैं। आमतौर पर स्‍ट्रॉन्‍ग रूम मतगणना केंद्र के आसपास ही होता है। रिजर्व ईवीएम को भी उसी वक्‍त लौटाया जाता है जिस वक्‍त बाकी ईवीएम आती हैं।

एक बार सभी ईवीएम पहुंच जाएं तो स्‍ट्रॉन्‍ग रूम को सील कर दिया जाता है। हर उम्‍मीदवार को अपनी मुहर या ताला लगाने की इजाजत होती है। वे चाहें तो स्‍ट्रॉन्‍ग रूम की चौबीसों घंटे निगरानी भी कर सकते हैं।

निष्कर्ष

EVM: दरअसल, ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन लंबे समय से विवाद का विषय रही है। सबसे पहले भाजपा नेताओं ने उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। उसके बाद उसमें कुछ सुधार भी किए गए। फिर भी सवाल उठते ही रहे। लेकिन अब असम में एक भाजपा उम्मीदवार की कार से ईवीएम बरामद होने से हंगामा खड़ा हो गया है।

भाजपा का कहना है कि यह महज एक संयोग था। कार्रवाई की गई है। जबकि विपक्ष का कहना है कि यह संयोग नहीं दुर्योग था, जिसे सोची समझी चाल के तहत रचा गया। असम में चुनाव आयोग के प्रोटोकाल के उल्लंघन के दस और मामले सामने आए हैं। इतने ज्यादा संयोग नहीं हो सकते।

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