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WHO and depression: अवसाद पर क्या कहती है विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट?

November 3, 2020
WHO and depression: What does the World Health Organization report on depression?

WHO and depression: विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों पर भरोसा करें तो देश में नौ करोड़ लोग मानसिक अवसाद से ग्रस्त हैं। और एक लाख मरीजों के लिए मात्र एक डॉक्टर उपलब्ध है।

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WHO and depression: … तो 20 फीसदी आबादी मानसिक बीमारियों की चपेट में आ जाएगी?


सत्य ऋषि

WHO and depression: भारत में अवसाद के मामलों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उसके मुताबिक, देश की 1.30 अरब की आबादी में 9 करोड़ से ज्यादा लोग किसी न किसी किस्म के मानसिक अवसाद से ग्रस्त हैं।

संगठन ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2020 के आखिर तक 20 फीसदी आबादी के मानसिक बीमारियों की चपेट में आने का अंदेशा जताया था। लेकिन देश में नौ हजार से कुछ ही ज्यादा मनोचिकित्सकों की वजह से हर एक लाख मरीज पर महज एक डॉक्टर उपलब्ध है।

परिस्थिति की गंभीरता

इससे परिस्थिति की गंभीरता का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। लांसेट साइकियाट्री में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अवसाद और घबराहट की बीमारियों से ग्रस्त लोगों की तादाद वर्ष 1990 से 2017 के बीच बढ़ कर दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है।

दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री एंड बिहैवियरल साइंस के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव मेहता के मुताबिक, कोविड-19 के बारे में सूचनाओं की ऑनलाइन बाढ़ ने बड़े पैमाने पर आतंक फैलाया है।

संक्रमण का अंदेशा

अब हालत यह हो गई है कि एक बार छींकने व खांसने पर भी लोगों को संक्रमण का अंदेशा होने लगता है। इसी तरह क्वारंटाइन केंद्रों में रहने वालों को यह एक जेल की तरह लगता है। इसके अलावा संक्रमित लोगों को सामाजिक कलंक का डर भी सताता है।

लॉकडाउन की वजह से बढ़ते मानसिक अवसाद ने अब वैज्ञानिकों, सरकारों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। भारत आखिर इस मानसिक स्वास्थ्य संकट से कैसे उबर सकेगा? विशेषज्ञों का कहना है कि हर 5वां भारतीय किसी न किसी तरह के मानसिक अवसाद से ग्रस्त है।

बजट में लगातार कटौती

विडंबना यह है कि नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम (एनएमएचपी) के लिए बजट में लगातार कटौती की जा रही है। वर्ष 2018 में जहां इसके लिए 50 करोड़ का प्रावधान था, वहीं वित्त वर्ष 2019 में इसे घटा कर 40 करोड़ कर दिया गया।

‘इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री’ के एक हालिया अध्ययन में कहा गया था कि मोटे अनुमान के मुताबिक मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 को लागू करने में 95 हजार करोड़ रुपये का खर्च आएगा। लेकिन हकीकत में इसका एक छोटा हिस्सा भी इस पर खर्च नहीं किया जा रहा है। इससे स्थिति और भयावह होने का अंदेशा है।

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