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Painter jitendra sahu: एक चित्रकार की नजर में मथुरा

October 25, 2020
Painter jitendra sahu

Painter jitendra sahu: चित्रकार के जीवन का अनुभव कुछ अलग होता है। वह साहित्य को अपनी तूलिका से मूर्तरूप देता है। चित्रकार जितेंद्र साहू से राजीव कुमार झा ने बातचीत की।

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Painter jitendra sahu: मिलिए चित्रकार जितेंद्र साहू से

Painter jitendra sahu: छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में स्थित नगर बचेली से मथुरा आना मेरे लिए एक नए जीवन अनुभव के समान था। 1990 के दिसंबर में बचेली के केंद्रीय विद्यालय से मथुरा के केंद्रीय विद्यालय में मेरा स्थानांतरण हो गया। मथुरा का परिवेश बिल्कुल नया था।

यहां पहली बार मैं आया था। लेकिन इस नगर की एक अद्भुत पौराणिक छवि मेरी कल्पनाओं में समाई थी। यहां आने के बाद मथुरा को मैंने इसी अनुरूप मैंने देखा और जाना। टेंगनमाड़ा और बचेली इन दोनों ही नगरों की तुलना में मथुरा का सामाजिक परिवेश काफी भिन्न था। यहां जीवन की कई नई बातें मुझे सीखने को मिलीं।

Painter jitendra sahu

तमाम कलाओं के लोग जो मूलत: गांवों, कस्बों, छोटे-बड़े शहरों के रहने वाले हैं। ये सभी लोग सामान्यत: व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर महानगरों का रुख करते हैं। मेरे मन में भी दिल्ली-मुंबई जाकर व्यावसायिक स्तर पर कलाकर्म को आगे बढ़ाने की इच्छा थी।

दिल्ली और फिर मथुरा का नाम सुझाया

Painter jitendra sahu: बचेली में कुछ वर्षों की सेवा के बाद मेरे स्थानांतरण का समय आया तो केंद्रीय विद्यालय संगठन ने दो मनपसंद स्थलों के बारे में पूछा था। और मैंने पहले दिल्ली और फिर मथुरा का नाम सुझाया था। खैर! संयोग देखिए, दिल्ली की जगह मेरा स्थानांतरण मथुरा हो गया।

मथुरा आने के बाद यहां कई साहित्यिक लोगों के संपर्क में आया। इन लोगों में जगदीश व्योम की चर्चा मैं सबसे पहले करना चाहूंगा। ये मथुरा के केन्द्रीय विद्यालय में ही हिंदी शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। साहित्यिक संस्कारों के व्यक्ति थे।

इसके अलावा कमलेश भट्ट कमल से भी मथुरा में ही भेंट हुई। ये आयकर उपायुक्त के पद पर कार्यरत थे। यहां दिनेश पाठक शशि अक्सर साहित्यिक संगोष्ठियां आयोजित करते थे। कमलेश भट्ट कमल की भी संगमन नामक साहित्यिक संस्था थी।

प्रियंवद और कमलेश्वर का आगमन Painter jitendra sahu

संगमन के साहित्यिक आयोजन में एक बार प्रियंवद और कमलेश्वर का आगमन भी हुआ था। मैंने उनके कार्यक्रम का पोस्टर बनाया था। मथुरा के लेखकों में सव्यसाची का नाम भी प्रमुखता से शामिल है। वे राधिका विहार में रहते थे और वहां उनका एक स्कूल भी था। उनसे मेरी भेंट नहीं हो पाई। वे तब तक गुजर गए थे।

सव्यसाची उत्तरार्द्ध नामक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन करते थे। उनके देहांत के बाद उनकी पत्नी इस पत्रिका का संपादन कर रही थीं। और लघु पत्रिकाओं की प्रदर्शनी भी करती थीं। उत्तरार्द्ध के कई अंकों में कला रेखांकन का काम मैंने किया। इसी दौरान लिजेंड न्यूज में मेरे कुछ कार्टून प्रकाशित हुए।

मथुरा में मोहन स्वरूप भाटिया से भी मेरा परिचय हुआ। इनका गोवर्धन के पास ज्ञानोदय नामक स्कूल था। भाटिया साहब उत्तर प्रदेश नाट्य अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष और हरेक साल नाट्य महोत्सव आयोजित करते थे।

हिंदी के आधुनिक नाटकों का प्रदर्शन

मथुरा आने से पहले हिंदी के आधुनिक नाटकों का प्रदर्शन मैंने बिलकुल भी नहीं देखा था। यहां मोहन स्वरूप भाटिया के नाट्य समारोह में मैंने स्वदेश दीपक के प्रसिद्ध नाटक बाल भगवान और कोर्ट मार्शल का मंचन देखा।

इस नाटक से मैं काफी प्रभावित हुआ। और रंगकर्म के प्रति मेरे मन में रुझान पैदा हुआ। भाटिया साहब के नाट्य समारोह के पोस्टर के लिए नाटकों के पात्रों का रेखांकन भी मैंने बनाया। मथुरा में रामचरण अग्रवाल भी ब्रजकला संस्थान के तत्वावधान में साहित्यकारों के सम्मान समारोह का आयोजन करते थे।

Painter jitendra sahu

यह श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर में होता था। इसमें एक साल मैं भी समारोह की सजावट और सज्जा के काम में शरीक हुआ। मेरी रीति काल के प्रसिद्ध कवि देव की बनाई मूर्ति यहां सबको पसंद आई। इस प्रकार मथुरा में मेरे कलाकर्म का दायरा विस्तृत हुआ लेकिन पेंटिंग और इसकी बिक्री से जुड़ी गतिविधियां अभी भी शुरू नहीं हो पाई थीं।

कविताओं का संकलन

अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी भी मैं करना चाहता था। इसी दौरान सहस्राब्दी के घाट पर इस नाम से मेरी कविताओं का संकलन भी प्रकाशित हुआ। और मथुरा के ही मेरे लेखक मित्र विवेक निधि ने इसकी भूमिका लिखी।

मथुरा के अपने साहित्यिक मित्रों में चन्द्रभाल सुकुमार का नाम भी मैं याद करना चाहूंगा। यहां जनवादी लेखक संघ के साहित्यिक आयोजनों में भी मैं नियमित रूप से शरीक होता था। और इसमें अलीगढ़ के कुँअरपाल सिंह और नमिता सिंह भी आया करते थे।

मथुरा में ब्रजभाषा में कविताएं लिखने वाले लेखकों से भी परिचय हुआ। यहां का संग्रहालय भी दर्शनीय है। और मैं अक्सर इसकी गैलरियों में संग्रहीत कलाकृतियों को देखने जाता था। प्राचीन मथुरा शैली की मूर्तियां इस संग्रहालय में काफी हैं।

मथुरा चित्रशैली का भी विकास

मथुरा मूर्तिशिल्प के प्रभाव से कालांतर में मथुरा चित्रशैली का भी विकास हुआ। और इस चित्रशैली के महान कलाकार के रूप में कन्हाई चित्रकार का नाम प्रसिद्ध है। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री का सम्मान प्रदान किया है। वृंदावन में इनकी आर्ट गैलरी थी।

कन्हाई चित्रकार सोने के रंगों का प्रयोग भी अपनी पेंटिंग में किया करते थे। इनकी आर्ट गैलरी भी मैं देखने गया और इनसे मुलाकात हुई। कन्हाई चित्रकार पारंपरिक चित्रशैली के कलाकार थे और इनके कलाकर्म पर आधुनिक शैली का कोई प्रभाव नहीं था।

इसी दौरान मथुरा के एक व्यक्ति मनु हांडा के सौजन्य से मैंने यहां इमेज टुडे नामक अपनी आर्ट गैलरी को भी स्थापित किया। लेकिन गैलरी ठीक ठाक ढंग से चल नहीं पाई। इसमें मैंने आधुनिक शैली में अपने चित्रों को प्रदर्शित किया था।

मथुरा में श्रीकृष्ण की जीवनकथा Painter jitendra sahu

मथुरा में श्रीकृष्ण की जीवनकथा को मैंने बीस मीटर लंबे कपड़े पर चित्रित किया। वृंदावन के इस्कान मंदिर को भी मैंने अपनी कुछ पेंटिंग भित्ति अलंकरण के लिए दिया। यहां कलाकृतियों के स्टाल पर भी मैंने अपनी पेंटिंग बिक्री के लिए रखी।

दीपावली के आसपास वृंदावन में मेला लगता था। यहां एक रूसी कृष्णभक्त चित्रकार भी रहते थे।उनके स्टूडियो में भी मैं गया और उनसे बातचीत हुई। मथुरा के इन जीवन अनुभवों ने मेरे कलाकर्म को विस्तार दिया। और मेरे वर्तमान कलाकर्म की नींव यहां कायम हुई।

मथुरा की यह कहानी 20—22 साल पुरानी है। और यहां इस दरम्यान काफी कुछ बदलता भी गया। यहां के तत्कालीन परिवेश की स्मृतियां अपनी पुरानी पेंटिंग्स में आज भी मुझे सजीव प्रतीत होती हैं। मथुरा में यमुना के घाट, होली गेट, द्वारिकाधीश मंदिर के अलावा वृंदावन में रहने वाली विधवाओं के जीवन यथार्थ को अपनी पेंटिंग में मैंने उकेरा।

मथुरा के बेहद पुराने मकानों ने भी मेरे मन को आकृष्ट किया

मथुरा के बेहद पुराने मकानों ने भी मेरे मन को आकृष्ट किया। इनकी बनावट, भाव भंगिमा को सहजता से मैंने कैनवास पर उकेरा। और मेरे सिटी इस्केप चित्र श्रृंखला में मथुरा की ये सारी पेंटिग्स संग्रहीत हैं।

मथुरा देश का एक प्राचीन नगर है। और इसके पुराने हिस्सों में खासकर यहां के मकान, मंदिर और घाट हमारे धर्म और संस्कृति की पुरातनता को अपनी भाव भंगिमा में प्रकट करते हैं। लेकिन इस शहर का नया आधुनिक हिस्सा इससे काफी दूर दिखाई देता है।

वृंदावन के अलावा मथुरा के आसपास के अन्य दर्शनीय स्थल गोकुल, नंदग्राम और बरसाने भी मैं गया। यहां सुंदर अनुभूति होती है। वृंदावन में प्रेम मंदिर के अलावा यहां सात मंजिल ऊँचे पागल बाबा के मंदिर में भी मैं गया। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के आसपास काफी मुस्लिम आबादी है। लेकिन यहां सारे लोग मेलजोल से रहते हैं। यहां के लोगों में प्रेम और शिष्टता का भाव समाया है। और रिक्शेवाला भी राधे राधे कह कर संबोधन करता है। सचमुच यह कृष्ण की नगरी है।


जितेन साहू। जन्म : 15 सितम्बर 1969। जन्मस्थान-बिलासपुर छत्तीसगढ़। कला शिक्षा-B. F. A painting। देश के कई प्रतिष्ठित आर्ट गैलरी मे कला प्रदर्शनी हुई। कला साहित्य पर लेखन। केंद्रीय विद्यालय में कला शिक्षक के रूप में कार्यरत।


 

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