Assembly elections: विधानसभा चुनावों में मतदाताओं के मूड को कई बातें प्रभावित करती रही हैं। लेकिन सुशासन के प्रतीक के रूप में नीतीश कुमार का जादू बरकरार है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!Assembly elections: दोनों ही गठबंधन के नेता बिहार में आमने सामने
राजीव कुमार झा
पटना, बिहार। Assembly elections: बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान की तिथि निकट आ रही है। चुनावी सरगर्मियां बढ़ती जा रही हैं। राज्य में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने की आकांक्षा लिए दोनों ही गठबंधन के नेता आमने सामने हैं।
राज्य के विधानसभा चुनावों में मतदाताओं के मूड को कई बातें प्रभावित करती रही हैं। लेकिन इस बात को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा कि विकास और सुशासन के प्रतीक के रूप में नीतीश कुमार का जादू अब भी बरकरार है।
सभी वर्गों का समर्थन जुटा रहे हैं तेजस्वी यादव
तेजस्वी यादव युवा नेता हैं। और इस बार टिकट बंटवारे में पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों के प्रति अपनी प्राथमिकताओं में काफी हेरफेर कर रहे हैं। वह समाज के सभी वर्गों के लोगों के समर्थन से राज्य में नई सरकार के गठन की कोशिशों में लगे हैं।
लॉकडाउन में जिस तरह से प्रवासी मजदूर परेशान हुए और उनके प्रति नीतीश कुमार का रवैया बड़ा खराब रहा। जिस तरह से बाढ़ में लोग परेशान रहे। और जिस तरह से गैर संघवाद का नारा देकर नीतीश कुमार भाजपा की गोद में जा बैठे।
ऐसे में लोगों की नाराजगी नीतीश कुमार से बहुत है। उसका फायदा तेजस्वी यादव को मिल सकता है। वैसे, मोदी सरकार में दलितों और मुस्लिमों की उपेक्षा का दंश भी नीतीश कुमार को झेलना पड़ेगा। तेजस्वी यादव की बिहार की जनता के लिए सक्रियता उनका प्लस प्वाइंट बन सकती है।
फिलहाल ऊँट किस करवट बैठेगा, यह कहना कठिन होगा। लेकिन यह चुनाव इसी दृष्टि से निर्णायक भी है। इस बार विभिन्न दलों के काफी प्रभावशाली नेता भी टिकट से वंचित होकर चुनाव मैदान में हैं। उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक उपलब्धियों की क्या भूमिका नई सरकार के गठन में होगी, यह चुनाव परिणाम के आने के बाद ही पता चलेगा।


