Skip to content
Primary Menu
  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल
Logo300

INFOPOST NEWS

The power of information

July 18, 2026

Connect with Us

  • Home
  • ख़ास ख़बर
  • आलेख
    • सत्ता की सियासत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • दिल्ली एनसीआर
  • राज्यों से …
  • कारोबार
  • साहित्य
  • संस्कार
  • तकनीक
  • मनोरंजन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • खेल

Categories

  • INFOPOST PDF
  • sports
  • Uncategorized
  • अंतरराष्ट्रीय
  • आलेख
  • कारोबार
  • ख़ास ख़बर
  • तकनीक
  • दिल्ली एनसीआर
  • बोलती तस्वीरें
  • मनोरंजन
  • राज्यों से …
  • राष्ट्रीय
  • शिक्षा
  • सत्ता की सियासत
  • संस्कार
  • साहित्य
  • स्वास्थ्य
An error has occurred, which probably means the feed is down. Try again later.

  • ख़ास ख़बर
  • संस्कार

जानें, सर्वपितृ अमावस्या क्या है और पितृ पक्ष में क्या है महत्व

September 15, 2020
Learn, what is omnipotent Amavasya and what is important in Pitru Paksha

सत्य ऋषि

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

सर्वपितृ अमावस्या पितृपक्ष के आखिरी दिन को कहा जाता है। इस साल सर्वपितृ अमावस्या बृहस्पतिवार, 17 सितंबर को है। सर्वपितृ अमावस्या को आश्विन अमावस्या, बड़मावस और दर्श अमावस्या भी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है।

दरअसल, ‘पितृपक्ष’ एक प्रकार से पितरों का मेला होता है। इस पक्ष में सभी पितर पृथ्वीलोक में रहने वाले अपने-अपने सगे-संबंधियों के यहां बिना आह्वान किए भी पहुंचते हैं और अपने सगे-संबंधियों की ओर से अर्पित प्रसाद से तृप्त होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं। फलस्वरूप श्राद्धकर्ता को सुख की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में मनुष्य के तीन ऋण कहे गए हैं-देव ऋण, गुरु ऋण व पितृ ऋण। इनमें से पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारना आवश्यक है।

इसलिए श्राद्ध पक्ष में अपने पितरों की संतुष्टि, तृप्ति और उनका शुभाशीर्वाद पाने के लिए अपने पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जो लोग अपने पूर्वजों यानी पितरों की संपत्ति का उपभोग तो करते हैं, लेकिन उनका श्राद्ध नहीं करते, ऐसे लोग अपने ही पितरों से अभिशप्त होकर अनेक दुख पाते हैं।

जिस मृत पिता के एक से अधिक पुत्र हों और उनमें पिता की धन-संपत्ति का बंटवारा न हुआ हो और सभी संयुक्त रूप से एक जगह ही रहते हों तो ऐसी स्थिति में पिता का श्राद्ध आदि पितृकर्म सबसे बड़े पुत्र को ही करना चाहिए। सब भाइयों को अलग-अलग नहीं करना चाहिए।

यदि मृत पिता की संपत्ति का बंटवारा हो चुका हो और सभी पु‍त्र अलग-अलग रहते हों तो सभी पुत्रों को अलग-अलग श्राद्ध करना चाहिए। प्रत्येक सनातनधर्मी को अपने पूर्व की तीन पीढ़ियों- पिता, पितामही और प्रपितामही के साथ ही अपने नाना और नानी का भी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

इनके अतिरिक्त उपाध्याय, गुरु, ससुर, ताऊ, चाचा, मामा, भाई, बहनोई, भतीजा,‍ शिष्य, जामाता, भानजा, फूफा, मौसा, पुत्र, मित्र, विमाता के पिता और इनकी पत्नियों का भी श्राद्ध करने का शास्त्रों में निर्देश दिया गया है।

इन सभी दिवंगत व्यक्तियों की पुण्यतिथि के दिन ही इनका श्राद्ध करना चाहिए। मृत्यु तिथि से तात्पर्य उस तिथि से है, जो तिथि अंतिम-श्वास परित्याग के समय विद्यमान हो। उसी तिथि को श्राद्धपक्ष में दोपहर के समय (दोपहर के समय साढ़े बारह से एक बजे तक) श्राद्ध करना चाहिए। अगर तिथि ज्ञात न हो तो सर्व पितृ अमावस्या को श्राद्ध कर सकते हैं।

जिन व्यक्तियों की सामान्य एवं स्वाभाविक मृत्यु चतुर्दशी को हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को कदापि नहीं करना चाहिए। पितृपक्ष की त्रयोदशी अथवा अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध करना चाहिए। जिन व्यक्तियों की अपमृत्यु हुई हो, अर्थात किसी प्रकार की दुर्घटना, सर्पदंश, विष, शस्‍त्र प्रहार, हत्या, आत्महत्या या अन्य किसी प्रकार से अस्वा‍भाविक मृत्यु हुई हो, तो उनका श्राद्ध मृत्यु तिथि वाले दिन कदापि नहीं करना चाहिए।

अपमृत्यु वाले व्यक्तियों को श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी ति‍थि को हुई हो। सौभाग्यवती स्‍त्रियों की अर्थात पति के जीवित रहते हुए ही मरने वाली सुहागिन स्‍त्रियों का श्राद्ध भी पितृपक्ष की नवमी तिथि को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी ति‍थि को हुई हो।

संन्यासियों का श्राद्ध पितृपक्ष की द्वादशी को ही किया जाता है, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि को हुई हो। नाना और नानी का श्राद्ध भी अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि में हुई हो। स्वाभाविक रूप से मरने वालों का श्राद्ध भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा अथवा आश्विन कृष्ण अमावस्या को करना चाहिए।

शास्त्रों में कहा गया है कि जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्य और सुख-सौभाग्य की वृद्धि के लिए अनेक प्रयास किए, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म लेना निरर्थक होता है। इस कर्ज को उतारना आवश्यक होता है। उनकी मृत्यु तिथि को जल, तिल, जौ, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध करना चाहिए। गौग्रास देकर और तीन या पांच ब्राह्मणों को भोजन करा देने मात्र से भी पितृ ऋण उतर जाता है।

इस प्रकार सरलता से साध्य होने वाले इस कार्य की हमें उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। इसके लिए जिस मास की ‍जिस तिथि को माता-पिता आदि का देहावसान हुआ हो, उस तिथि पर श्राद्ध आदि करने के अलावा आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में जब श्राद्ध लगे हों उसी ‍तिथि को श्राद्ध, तर्पण, गौग्रास और ब्राह्मणों को भोजन कराना आवश्यक है।

इससे पितृगण प्रसन्न होते हैं। लेकिन यदि तिथि ज्ञात न हो तो समस्त पितृ गण की उपस्थिति वाले अंतिम दिन उनके लिए प्रार्थना करनी चाहिए और विधिविधान से श्राद्ध करना चाहिए। सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने से किसी भी प्रकार के पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। इस प्रकार थोड़े से प्रयास के जरिये आप सुख समृद्धि हासिल कर जीवन को सुखी बना सकते हैं।

About Author

See author's posts

Post navigation

Previous: हिंदी दिवस: जानें, हिंदी शब्द कहां से आया
Next: परमाणु बम से ज्यादा खतरनाक क्यों है रूस का यह हथियार?

Related Stories

On Akhilesh Yadav's birthday
  • ख़ास ख़बर
  • दिल्ली एनसीआर

On Akhilesh Yadav’s birthday: सात दिवसीय वृक्षारोपण अभियान

infopost July 12, 2026 0
Shaping the future
  • ख़ास ख़बर
  • शिक्षा

Shaping the future: इंग्लैंड से लौटकर किताबों की दुनिया बसाने वाले इंजीनियर

infopost July 7, 2026 0
Trust Treasurer Letter Controversy
  • ख़ास ख़बर
  • राष्ट्रीय

Trust Treasurer Letter Controversy: जवाबदेही का संकट और पारदर्शिता बहस

infopost July 7, 2026 0

Copyright © All rights reserved. | MoreNews by AF themes.