अखबारों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए वेजबोर्ड लागू न होने से श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यही वजह है कि अखबार मालिक पत्रकारों को अनवरत खटा रहे हैं। कोरोना महामारी के नाम पर पत्रकारों का शोषण चरम पर है। क्योंकि अखबारों से तमाम कर्मचारियों को हटा दिया गया है और बचे हुए कर्मचारियों पर काम का सारा बोझ लाद दिया गया है। कर्मचारियों की संख्या पूछने वाला श्रम विभाग भी पंगु हो गया है।
राजस्थान पत्रिका समूह के अखबार पत्रिका के इंदौर संस्करण की बात करें, तो मालवा जोन के मीडियाकर्मी बगैर किसी ब्रेक के कार्य किए जा रहे हैं। मालिकों के इशारे पर रतलाम, मंदसौर, नीमच, उज्जैन, देवास, शाजापुर और आगर जिलों के संपादकीय प्रभारी मनमानी कर रहे हैं। किसी कर्मचारी को 20 मार्च से साप्ताहिक अवकाश तक नहीं मिल सका है। अब कर्मचारियों की हालत खराब होने लगी है।
पिछले आलेख में आप पढ़ चुके होंगे कि किस प्रकार अखबार कर्मचारियों को पहले वेजबोर्ड से वंचित कर दिया गया था। अब आगे। 1955 से सरकार ने श्रमजीवी पत्रकार और गैर-पत्रकार समाचारपत्र कर्मचारियों के लिए जिन 6 वेतन बोर्डों का गठन कर चुकी है, वे इस प्रकार हैं।
केंद्र सरकार कर चुकी है 6 वेतन बोर्डों का गठन
श्रमजीवी पत्रकारों के लिए पहला वेज बोर्ड 2 मई 1956 को गठित हुआ जो लागू नहीं हो सका। दूसरा वेज बोर्ड 12 नवंबर 1963 को गठित हुआ, लेकिन लागू नहीं हो सका। 25 फरवरी 1964 को गठित वेजबोर्ड लागू नहीं हो सका। इसी प्रकार 11 जून 1975 को गठित वेजबोर्ड को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वेजबोर्डों को 9 फरवरी 1979 को एकल व्यक्ति (पालेकर वेतन बोर्ड) ट्रिब्यूनल में परिवर्तित कर दिया गया।
इस प्रकार बछावत वेतन बोर्ड को भी लागू नहीं किया जा सका। मणिसाना वेतन बोर्ड का भी कुछ वैसा ही हाल हुआ। अंतत: 11-11-2011 मजीठिया वेतन बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, लेकिन उसे भी लागू नहीं किया गया।
दरअसल, केंद्र सरकार ने 2007 में श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) विविध प्रावधान अधिनियम, 1955 के प्रावधान के अनुसार छठे वेतन बोर्ड के रूप में न्यायाधीश कुरुप की अध्यक्षता में दो वेतन बोर्डों (मजीठिया) का गठन किया, एक श्रमजीवी पत्रकार और दूसरा गैर-पत्रकार समाचार पत्र कर्मचारियों के लिए। अध्यक्ष, न्यायाधीश के नारायण कुरुप ने 31 जुलाई 2008 को त्यागपत्र दे दिया।
जब जी. आर. मजीठिया ने संभाला अध्यक्ष का पद भार
इसके बाद, न्यायाधीश जी. आर. मजीठिया ने 4 मार्च 2009 को अध्यक्ष के रूप में पदभार संभाला। मजीतिया वेतन बोर्ड ने केंद्र सरकार को 31 दिसम्बर 2010 को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी। सरकार ने मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को स्वीकार किया और इसी के अनुसार इसे प्रकाशित किया गया। इन अनुशंसाओं को मंत्रालय की वेबसाइट और पब्लिक डोमेन में अपलोड कर दिया गया।
यह अधिसूचना एबीपी प्राइवेट लिमिटेड और एएन आर बनाम भारत संघ और अन्य के मामले में 2011 की रिट याचिका (सिविल) संख्या 246 के परिणाम के अधीन है। इसके अतिरिक्त, वेतन बोर्ड की कानूनी वैधता और मजीतिया वेतन बोर्ड की अनुशसाओं को क्रियान्वित न करने के संबंध में विभिन्न समाचार पत्र कर्मचारियों ने सितम्बर 2012 तक 11 अन्य रिट याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर की।
मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन पर सर्वोच्च न्यायालय का कोई स्थगन आदेश नहीं है। सभी रिट याचिकाओं की सुनवाई 5 फरवरी 2013 को शुरू हुई और उक्त मामले समय-समय पर सुनवाई के लिए 09 जनवरी, 2014 तक जब तक कि उच्चतम न्यायालय ने फैसले को सुरक्षित रखा, प्रस्तुत होते रहे।
और 7 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
वर्ष 2011 के डब्ल्यूपी नंबर 246 और अन्य इंगित कोर्ट केसों में उच्चतम न्यायालय ने 7 फरवरी 2014 को इस निर्देश के साथ फैसला सुनाया कि सभी रिट याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं और मजदूरी यथा परिशोधित/निर्धारित रूप से 11.11.2011 से जब केंद्र सरकार ने मजीठिया वेतनबोर्ड की सिफारिशों को अधिसूचित किया है, देय होगा।
सभी बकाये की राशि को मार्च, 2014 तक सभी पात्र व्यक्तियों में चार समान किस्तों में 7 फरवरी 2014 से एक वर्ष के भीतर भुगतान किया जाएगा और अप्रैल, 2014 के बाद से परिशोधित मजदूरी का भुगतान जारी रखा जाएगा। उच्चतम न्यायालय के फैसले से सभी राज्य सरकारों/केन्द्र शासित प्रदेशों को मार्च, 2014 में सूचित कर दिया गया।
अनुशंसाओं के क्रियांवयन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार/केन्द्र शासित प्रदेश की है। अधिसूचना की एक प्रति (हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों में) सभी राज्य सरकारों/केन्द्र शासित प्रदेशों को इस मंत्रालय की चिट्ठी 24/11/2011 को भेज दी गई थी। अधिसूचना के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए प्रधान श्रम एवं रोजगार सलाहकार की अध्यक्षता में एक केंद्रीय स्तर की अनुवीक्षण समिति का गठन किया गया।
त्रिपक्षीय अनुवीक्षण समिति का गठन
इस समिति में संयुक्त सचिव, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एवं प्रधान श्रम आयुक्त (केंद्रीय) सदस्य के तौर पर हैं। उप महानिदेशक सदस्य सचिव हैं। त्रिपक्षीय अनुवीक्षण समिति के गठन से संबंधित श्रम और रोजगार मंत्रालय का 24.04.2012 का आदेश राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के सभी श्रम सचिवों को पृष्ठांकित करते हुए समिति के सभी सदस्यों को भेज दिया गया।
केन्द्रीय स्तर की अनुवीक्षण समिति की प्रथम बैठक प्रधान श्रम एवं रोजगार सलाहकार की अध्यक्षता में 24/09/2012 को हैदराबाद में आयोजित की गई थी। तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश से आए अधिकारी बैठक में उपस्थित हुए। 5 पूर्वी राज्यों नामत: बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड और उड़ीसा के संबंध में वेतन बोर्ड निर्णयों के कार्यान्वयन की संविधियों की समीक्षा करने के लिए भुवनेश्वर में 13/09/2013 को केंद्रीय स्तर की अनुवीक्षण समिति की दूसरी बैठक आयोजित की गई थी।
पश्चिमी क्षेत्र के सात राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों अर्थात् राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गोवा, दादर एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव के लिए 21.04.2014 को इसकी तीसरी बैठक मुंबई (महाराष्ट्र) में आयोजित की गई। उतरी क्षेत्र के आठ राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों अर्थात् जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़ एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के संबंध में सीएलएमसी की चौथी बैठक 10.06.2014 को दिल्ली (श्रम शक्ति भवन) में आयोजित की गई।


